आकड़ों के मुताबिक शहर में रोजाना 180 से अधिक लोगों को श्वान जख्मी कर रहे हैं। लेकिन जिम्मेदार कोई कार्रवाई करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। …और पढ़ें

HighLights
- हर माह एक हजार से अधिक बच्चे भी हो रहे शिकार
- शहर में रोजाना 180 से अधिक लोगों को श्वान जख्मी कर रहे हैं
- जिम्मेदार कोई कार्रवाई करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। श्वानों के आतंक के कारण पुरा शहर परेशान हो रहा है। छोटी बस्तियों से लेकर पाश कालोनियों में इनका आतंक बढ़ते जा रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को यह अपना शिकार बना रहे हैं। शहर में श्वानों द्वारा हर माह पांच हजार से अधिक लोगों को जख्मी किया जा रहा है।
चिंताजनक है कि इनमें एक हजार बच्चे शामिल है। इनमें से कई लोगों को तो यह इतना जख्मी कर देते हैं कि उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पतालों में भर्ती करवाना पड़ता है। आकड़ों के मुताबिक शहर में रोजाना 180 से अधिक लोगों को श्वान जख्मी कर रहे हैं। लेकिन जिम्मेदार कोई कार्रवाई करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।
कुछ समय तक नगर निगम द्वारा श्वानों की नसबंदी तेजी से की थी, लेकिन इसके बाद उन्होंने भी ध्यान देना बंद कर दिया। इसके कारण शहरवासियों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हुकुमचंद अस्पताल में जनवरी से अप्रैल माह तक 18 हजार से अधिक लोग श्वान द्वारा जख्मी करने के बाद इलाज करवाने पहुंचे हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में निजी अस्पताल में भी मरीज इलाज के लिए जाते हैं।
दोपहिया वाहन चालक भी परेशान
श्वानों के आतंक से पैदल चलने वाले लोगों के साथ ही दोपहिया वाहन चालक भी परेशान हैं। श्वान दोपहिया वाहन के पीछे भी भागते हैं, जिसके कारण कई बार चालक डरकर नीचे गिरकर जख्मी हो जाते हैं। रात के समय श्वान का आतंक ज्यादा देखने को मिलता है, क्योंकि इस समय सड़कों पर वाहनों की संख्या कम हो जाती है। लोगों ने बताया कि श्वानों के कारण रात के समय हमें घरों से बाहर निकलने में भी डर लगने लगा है। हम सामान लेकर घर जाते हैं तो यह थैलियां छिन लेते हैं। बच्चों को भी इनके डर से घर से बाहर अकेले नहीं भेज पाते हैं।
2014 से चल रहा नसबंदी कार्यक्रम
वर्ष 2014 से श्वानों की नसबंदी करने के कार्यक्रम के सहारे ही अब तक निगम बैठा है। ये प्रयास कारगर नहीं होने के बाद भी न तो नए तरीके अपनाए गए, न अन्य शहरों में इस्तेमाल किए जा रहे तरीकों का अध्ययन तक किया। जिस गति से श्वानों का नसबंदी कार्यक्रम चल रहा है, उससे आने वाले दस वर्ष में भी संख्या कम होती नजर नहीं आ रही है।

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