खो गई वो सुर्खी…:  भोपाल के नवाब जहां से मंगवाते थे बांग्ला पान, वह पान वाली देवरी अब संकट में, 100 से घटकर सिर्फ 15 परिवारों में सिमटी खेती – deori News

खो गई वो सुर्खी…: भोपाल के नवाब जहां से मंगवाते थे बांग्ला पान, वह पान वाली देवरी अब संकट में, 100 से घटकर सिर्फ 15 परिवारों में सिमटी खेती – deori News

खो गई वो सुर्खी…:  भोपाल के नवाब जहां से मंगवाते थे बांग्ला पान, वह पान वाली देवरी अब संकट में, 100 से घटकर सिर्फ 15 परिवारों में सिमटी खेती – deori News


भोपाल रियासत के नवाबी दौर में जिस बांग्ला पान के स्वाद के नवाब भी मुरीद हुआ करते थे, आज उसी पान वाली देवरी का ऐतिहासिक वजूद संकट में है। कभी 100 से अधिक परिवारों की आजीविका का साधन रही यह पारंपरिक खेती आज बढ़ते तापमान, सिंचाई के अभाव और प्रदूषित पानी के कारण सिमटकर महज 15 से 20 परिवारों तक रह गई है। सदियों पुरानी इस लुप्त होती धरोहर को बचाने के लिए अब प्रशासन आगे आया है। हाल ही में एसडीएम अंकित जैन ने खुद बराजों का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया और किसानों को इसे पुनर्जीवित करने का भरोसा दिलाया। उन्होंने पान की पत्तियां तोड़कर स्वाद भी चखा। देवरी की पहचान पान उत्पादन से रही है। किसानों ने बताया कि अत्यधिक तापमान से नुकसान हो रहा है। सिंचाई की दिक्कत है। तालाब का पानी प्रदूषित है। इससे पान की गुणवत्ता गिर रही है। पैदावार भी लगातार घट रही है। किसानों के मुताबिक पहले 100 से ज्यादा परिवार पान की खेती से जुड़े थे। अब 15 से 20 परिवार ही इस परंपरा को बचाए हुए हैं। भोपाल के नवाबों के दस्तरख्वान की कभी शान था यह पान भोपाल रियासत के नवाबी दौर में शाही दस्तरखान पर सजे लजीज पकवानों के बाद महफिल की असली रंगत देवरी के खास बांग्ला पान से जमती थी। नवाबों के शौकीन मिजाज का आलम यह था कि देवरी के बराजों से चुनिंदा, बेहद मुलायम और खुशबूदार पत्तियों को विशेष दूतों के जरिए रोजाना ताजी हालत में भोपाल के शाही महलों तक पहुंचाया जाता था। चांदी के खास खासदानों (पान रखने का डिब्बा) में सजने वाला यह पान सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि नवाबी में हमाननवाजी और रसूख का प्रतीक हुआ करता था। बुजुर्ग बताते हैं कि देवरी के इस पान का जायका इतना अनूठा था कि इसके बिना भोपाल के नवाबों का शाही दस्तरखान अधूरा माना जाता था। पान के बराजों में आग के बाद उबर नहीं पाए किसान किसान राधेलाल चौरसिया, संजय चौरसिया, परम चौरसिया, भागवत चौरसिया ने बताया कि शासन स्तर से पर्याप्त मदद नहीं मिल रही। आधुनिक सुविधाएं नहीं मिल रहीं। खेती कमजोर पड़ती जा रही है। किसानों पर आर्थिक संकट बढ़ रहा है। किसानों ने बताया कि 1975 में पान के बराजों में आग लगी थी। खेती को बड़ा नुकसान हुआ था। इसके बाद से उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है। देवरी के बांग्ला पान को जीआई टैग क्यों नहीं?: महोबा के देशावरी पान और बनारसी पान को जीआई टैग मिल चुका है। महोबा का देशावरी पान मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के महोबा जिले में उगाया जाता है। इसका कुछ उत्पादन मप्र की सीमा से लगे छतरपुर जिले में भी होता है। इसे मखमली बनावट, कुरकुरे स्वाद और खुशबू के लिए जाना जाता है। इसे 2021 में जीआई टैग मिला था। इसी तरह बनारसी पान वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में तैयार किया जाता है। इसे 2023 में जीआई टैग दिया गया। सवाल यह है कि अगर महोबा के देशावरी पान और बनारसी पान को जीआई टैग मिल सकता है, तो भोपाल के नवाबों की पसंद रहे देवरी के बांग्ला पान को क्यों नहीं? सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को बचाया जाएगा भोपाल के नवाब यहां से खास तौर पर बांग्ला पान मंगवाते थे। क्षेत्र आज भी पान वाली देवरी के नाम से पहचाना जाता है। संकट के चलते यह परंपरा कमजोर पड़ रही है। सैकड़ों साल पुरानी पारंपरिक पान की खेती बचाने के लिए कदम उठाए जाएंगे। किसानों की समस्याओं का समाधान किया जाएगा। खेती को नष्ट होने से रोका जाएगा। इसे फिर से जीवित किया जाएगा। -अंकित जैन, एसडीएम, देवरी

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