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तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण आने वाले समय में देश के लिए सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बन सकता है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो श्वसन संबंधी बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ेगा। यह चिंता इंदौर में आयोजित चौथी ब्रोंकोपल्मोनरी वर्ल्ड कांग्रेस-2026 के दौरान देश-विदेश के एक्सपर्टस ने व्यक्त की। तीन दिनी इंटर नेशनल का रविवार को समापन हुआ। ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित इस कॉन्फ्रेंस में भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव के विशेषज्ञों ने भाग लिया। कॉन्फ्रेंस में 750 से अधिक चिकित्सकों, पल्मोनोलॉजिस्ट, थोरासिक सर्जनों, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों, उनके उपचार और रोकथाम पर अपने अनुभव साझा किए। इलाज में क्रांति, लेकिन बचाव सबसे जरूरी कांग्रेस के ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी प्रो. डॉ. रवि डोसी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में फेफड़ों की कई जटिल और कभी लगभग लाइलाज मानी जाने वाली बीमारियों के उपचार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। अत्याधुनिक जांच तकनीकों, इंटरवेंशनल प्रक्रियाओं और नई दवा पद्धतियों ने मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में बड़ा सुधार किया है। हालांकि उन्होंने आगाह किया कि यदि प्रदूषण की रफ्तार नहीं थमी तो इलाज से अधिक आवश्यकता रोकथाम की होगी। प्रदूषित हवा फेफड़ों को पहुंचा रही गंभीर नुकसान एक्सपर्टस ने बताया कि हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक कण धीरे-धीरे फेफड़ों में जमा होकर उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं। इससे अस्थमा, सीओपीडी, पल्मोनरी फाइब्रोसिस और अन्य गंभीर श्वसन रोगों का खतरा बढ़ जाता है। चिंताजनक बात यह है कि अब कम उम्र के बच्चे भी प्रदूषणजनित बीमारियों की चपेट में आने लगे हैं। एक्सपर्टस के अनुसार शहरों की व्यस्त सड़कों पर लोगों का मास्क या कपड़े से चेहरा ढंककर चलना और वाहनों के बंद शीशों में सफर करना इस बढ़ते खतरे का प्रत्यक्ष संकेत है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इसे जनभागीदारी से चलाए जाने वाले सामाजिक अभियान का रूप देना होगा। नई तकनीकों और शोधों पर मंथन रविवार को 30 से अधिक वैज्ञानिक सेशन्स आयोजित किए गए, जिनमें अस्थमा, बच्चों में श्वसन नलियों के संकुचन, दवा-प्रतिरोधी टीबी, पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन और क्रिटिकल केयर के नवीनतम शोधों पर चर्चा हुई। लंग ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट डॉ. अतुल मेहता ने लंग ट्रांसप्लांट की आधुनिक तकनीकों और मरीजों के लिए बढ़ी संभावनाओं पर प्रकाश डाला। वहीं डॉ. सरबोन तहुरा ने बच्चों में ब्रोंकोस्कोपी की सुरक्षित और प्रभावी भूमिका बताई। डॉ. अनंत मोहन ने इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (ILD) में रेडियोलॉजी और प्रारंभिक पहचान के महत्व को रेखांकित किया। समय पर पहचान से बच सकती है जान एक्सपर्ट्स का मत था कि फेफड़ों की अधिकांश बीमारियों की शुरुआती अवस्था में पहचान हो जाए तो उनका सफल उपचार संभव है और मरीज गंभीर स्थिति तक पहुंचने से बच सकता है। कॉन्फ्रेंस में पल्मोनरी मेडिसिन, इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी, स्लीप मेडिसिन, क्रिटिकल केयर, थोरासिक सर्जरी और रेस्पिरेटरी रिसर्च जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। देशभर से आए 100 से अधिक पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए, जिन्हें एक्सपर्टस ने भविष्य की चिकित्सा दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
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