पहले विश्व युद्ध के हज़ारों भूले-बिसरे पंजाबी सैनिकों को पहली बार मिल रही है पहचान

पहले विश्व युद्ध के हज़ारों भूले-बिसरे पंजाबी सैनिकों को पहली बार मिल रही है पहचान

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अविभाजित भारत (वर्तमान भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) से लगभग 14 लाख लोग ब्रिटिश भारतीय सेना में थे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अविभाजित भारत (वर्तमान भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) से लगभग 14 लाख लोग ब्रिटिश भारतीय सेना में थे (फ़ाइल फ़ोटो)

भारत की आज़ादी और बंटवारे के पहले यहां के हज़ारों सैनिकों ने पहले विश्व युद्ध में ब्रिटेन के लिए लड़ते हुए अपनी जांन गंवाई थी. अब इन सैनिकों को आधिकारिक तौर पर पहली बार मान्यता दी जा रही है और रिकॉर्ड में उनका नाम शामिल किया जा रहा है.

शोधकर्ताओं ने ब्रिटिश भारतीय सेना के ऐसे 9,909 सैनिकों के नाम तलाशे हैं, जिन्हें अब कॉमनवेल्थ वार ग्रेव्स कमीशन यानी राष्ट्रमंडल युद्ध क़ब्र आयोग (सीडब्ल्यूजीसी) के मृतकों के डेटाबेस में जोड़ा जा रहा है.

ब्रिटेन के स्वयंसेवकों ने प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद बनाए गए विशिष्ट रजिस्टरों में नाम खोजने के लिए पंजाब में कई वर्षों तक काम किया.

अब उन ब्रिटिश सैनिकों के वंशजों को खोजने का काम चल रहा है जिनके पूर्वजों ने सेना में सेवाएं दीं और अपनी जान गंवाई.

ब्रिटेन के लेस्टर में दांतों के डॉक्टर सनी पलाही कहते हैं, “यह साइकिल पूरा हो गया है. अब मैं पहले से कहीं अधिक संतुष्ट महसूस कर रहा हूँ,.”

पलाही कई वर्षों से अपने परदादा के बारे में जानकारी की तलाश कर रहे थे. उन्हें सिर्फ़ इतना पता की उनके परदादा फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर में गए थे और कभी वापस नहीं लौटे.

लेकिन शोधकर्ताओं ने उनसे संपर्क किया और उन्हें बताया कि उनके परदादा केसर सिंह का नाम हाल ही में जांचे गए रजिस्टरों में पाया गया है और अब इसे आधिकारिक सूची में शामिल किया जाएगा.

सनी पलाही कहते हैं, “इसे एक आधिकारिक संस्था ने मान्यता दी है, जो पहले कभी नहीं हुआ था. अब इन्हें सीडब्ल्यूजीसी में दर्ज किया गया है. अब सभी बलिदान दिखाई देते हैं.”

उनका कहना है कि यह सम्मान उन्हें प्रथम विश्व युद्ध से जुड़े वैश्विक समुदाय का हिस्सा होने पर गर्व महसूस कराता है.

सनी पलाही
इमेज कैप्शन, सनी पलाही भूला दिए गए पंजाबी सैनिकों में से एक के वंशज हैं

भारतीय उपमहाद्वीप (जो अब भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश है) से लगभग 14 लाख लोगों ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सेवाएं दी थीं.

युद्ध के बाद के वर्षों में, अधिकारियों ने पंजाब के हर क़स्बे और गांव का दौरा किया ताकि अकेले उस राज्य से आए तीन लाख बीस हज़ार सैनिकों के नाम दर्ज कर सकें.

1947 में भारत के विभाजन के बाद, पंजाब को भारत और पाकिस्तान के बीच बांट दिया गया था.

पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय की अलमारियों पर दर्जनों फटे-पुराने, नाजुक चमड़े की जिल्द वाले रजिस्टर रखे हैं , जिनमें हाथ से लिखे हुए अभिलेख भरे हुए हैं और हरेक पर एक गांव का नाम खुदा हुआ है.

पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय में संरक्षित रजिस्टरों में दर्ज विवरण
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय में संरक्षित रजिस्टरों में दर्ज विवरण

यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन के सदस्यों ने इन अभिलेखों को डिजिटाइज़ करने और उनका विश्लेषण करने के लिए एक परियोजना शुरू की, जो कई वर्षों तक जारी रही.

ग्रीनिच विश्वविद्यालय में पीएचडी की छात्रा और इस महत्वपूर्ण शोध में भाग लेने वाली जैस्मीन बसरा ने कहा, “एक पंजाबी होने के नाते, मुझे बहुत गर्व महसूस होता है कि मैं समुदाय के लिए यह काम कर सकती हूं.”

इस प्रक्रिया के दौरान, बसरा को अप्रत्याशित रूप से अपने दो रिश्तेदारों चला. ये दो रिश्तेदार थे बसरा के परदादा और उनके भाई. इन दोनों ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना के लिए लड़ाई लड़ी थी.

वह कहती हैं, “यह जुड़ाव बहुत भावनात्मक था. दूसरी पीढ़ी की ब्रिटिश पंजाबी होने के नाते, पंजाब मुझे काफ़ी दूर का और ब्रिटिश इतिहास से पूरी तरह जुड़ा हुआ नहीं लगता, लेकिन मुझे लगता है कि यह दोनों को जोड़ने वाली एक स्पष्ट कड़ी है.”

स्वयंसेवकों के किए इस काम को राष्ट्रमंडल युद्ध क़ब्र आयोग की ओर से पूरा समर्थन और प्रोत्साहन मिला है, जिसने अब दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अपने रिकॉर्ड में सबसे बड़ा अपडेट किया है.

पंजाब रजिस्टर की पुस्तकें पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय में संरक्षित हैं
इमेज कैप्शन, पंजाब के रजिस्टर पाकिस्तान के लाहौर संग्रहालय में संरक्षित हैं

आयोग के इतिहासकारों के अनुसार जिन 9,909 सैनिकों के नाम पहले स्मारक अभिलेखों में नहीं थे उनमें से अधिकांश वे थे जिनकी मृत्यु घावों की वजह से युद्धक्षेत्र के बाहर हुई थी.

उस समय की ब्रिटिश भारतीय सरकार के नियमों के कारण, उन्हें युद्ध के शहीदों का दर्जा नहीं दिया गया था, लेकिन अब वह निर्णय बदल दिया गया है.

हाल ही में पहचाने गए हज़ारों मृत सैनिकों में से क़रीब 25% सिख, 25% हिंदू और क़रीब 40% मुस्लिम हैं.

सीडब्ल्यूजीसी का कहना है कि यह नई भागीदारी केवल उनके नाम को संरक्षित करने के लिए नहीं है, बल्कि प्रथम विश्व युद्ध के यूरोप-केंद्रित नज़रिए को सुधारने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है.

उनका कहना है कि स्मारक निर्माण कार्य में उस युद्ध की संपूर्ण वैश्विक वास्तविकता दिखनी चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

Source link
#पहल #वशव #यदध #क #हजर #भलबसर #पजब #सनक #क #पहल #बर #मल #रह #ह #पहचन

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *