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अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म ‘सतलुज’ को तीन जुलाई 2026 को बिना किसी प्रचार या बड़े एलान के सीधे ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ज़ी5 पर रिलीज़ किया गया था.
लेकिन महज दो दिन बाद, 5 जुलाई को इस फ़िल्म को भारत में ज़ी5 प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया गया. इस ओटीटी प्लेटफॉर्म ने अभी तक फ़िल्म हटाने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है.
ज़ी5 ने कहा है, “मौजूदा घटनाक्रम के कारण फ़िल्म को हटाना पड़ा और वे ‘सतलुज’ को दोबारा दर्शकों के लिए उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं.”
हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी यह फ़िल्म पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है.
फ़िल्म में 1980 और 1990 के दशक के दौरान पंजाब में चरमपंथ के दौर में हुए कथित गैर-क़ानूनी मुठभेड़ों और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार की जांच करने वाले जसवंत सिंह खालड़ा के प्रयासों को दिखाया गया है.
यह फ़िल्म पिछले लगभग तीन वर्षों से केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफ़सी), यानी सेंसर बोर्ड में अटकी हुई थी. फ़िल्म को पहले ‘घल्लूघारा’ और बाद में ‘पंजाब 95’ नाम से सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया था.
निर्देशक के अनुसार, सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म को सिनेमाघरों में रिलीज के लिए प्रमाणपत्र देने से पहले 120 से अधिक कट और बदलाव करने को कहा था.
फ़िल्म के निर्देशक हनी त्रेहान के मुताबिक़, सेंसर बोर्ड द्वारा मांगे गए बदलावों में मुख्य शर्तें ये थीं:
- फ़िल्म के मुख्य किरदार जसवंत सिंह खालड़ा का नाम बदला जाए
- फ़िल्म में पंजाब पुलिस के सभी संदर्भों को हटा दिया जाए
- पंजाब के वास्तविक नाम की जगह किसी काल्पनिक नाम का इस्तेमाल किया जाए
निर्माता इन बदलावों के पक्ष में नहीं थे, जिसके कारण फ़िल्म सिनेमाघरों में रिलीज़ नहीं हो सकी. इसी विवाद के चलते निर्माताओं ने इसे बिना कट के सीधे ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर ‘सतलुज’ नाम से रिलीज़ किया.
ओटीटी पर रिलीज़ करने का क़ानूनी आधार क्या था?
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भारत में ‘सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट’ के तहत सेंसर बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (सीबीएफ़सी) फ़िल्मों को रिलीज़ करने के लिए प्रमाणपत्र जारी करता है, लेकिन यह क़ानूनी मुख्य रूप से सार्वजनिक सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फ़िल्मों पर लागू होता है.
ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर फ़िल्म रिलीज़ करने के लिए सेंसर बोर्ड के प्रमाणपत्र की कोई क़ानूनी अनिवार्यता नहीं होती.
ओटीटी यानी डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म ‘इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) रूल्स, 2021’ के तहत आते हैं, जहां उम्र के आधार पर वर्गीकरण, सेल्फ रेगुलेशन और आचार संहिता (कोड ऑफ एथिक्स) जैसी व्यवस्थाएं लागू होती हैं.
फ़िल्म को ओटीटी से हटाए जाने के बाद अब कई महत्वपूर्ण क़ानूनी सवाल उठ रहे हैं. इस रिपोर्ट में हम भारत में सेंसर बोर्ड के कामकाज और फ़िल्मों के रिलीज़ होने की प्रक्रिया को समझेंगे.
सेंसर बोर्ड का ओटीटी प्लेटफ़ॉर्मों पर कोई नियंत्रण है?

फ़िल्म स्कॉलर और सेंसर बोर्ड की पूर्व सदस्य इरा भास्कर कहती हैं, “ओटीटी प्लेटफ़ॉर्मों पर रिलीज़ होने वाले कंटेंट में सीबीएफ़सी की कोई भूमिका या दख़लअंदाज़ी नहीं होती.”
इरा भास्कर बीबीसी से बातचीत करते हुए बताती हैं, “सीबीएफ़सी एक वैधानिक संस्था है, जिसकी स्थापना ‘सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट, 1952’ के तहत की गई थी.”
“यह विशेष क़ानूनी बोर्ड को केवल ‘सार्वजनिक प्रदर्शन’ यानी पारंपरिक कमर्शियल सिनेमाघरों जैसी जगहों पर दिखाई जाने वाली फ़िल्मों की जांच और प्रमाणपत्र देने का अधिकार देता है.”
“क्योंकि किसी फ़िल्म को निजी मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप या घर के प्राइवेट टीवी पर स्ट्रीम करना ‘सार्वजनिक प्रदर्शन’ के दायरे में नहीं आता, इसलिए सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट डिज़िटल कंटेंट पर लागू नहीं होता.”
सेंसर बोर्ड कासर्टिफिकेशन सिस्टम कैसे काम करता है?
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दरअसल किसी फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से पास कराने के लिए निर्माता को फ़िल्म के फ़ाइनल कट, वीडियो ट्रांसक्रिप्ट और निर्धारित शुल्क के साथ सीबीएफ़सी के पास आवेदन करना होता है.
वहां एक एग़्जामिनेशन कमेटी होती है. फ़िल्म देखने के बाद इसके प्रत्येक सदस्य कट, बदलाव या प्रमाणपत्र की श्रेणी के संबंध में अपनी लिखित रिपोर्ट जमा करते हैं.
प्रमाणपत्र की चार मुख्य श्रेणियां:
- यू (अनरिस्ट्रिक्टेड पब्लिक एग्ज़ीबिशन): सभी उम्र के लोगों के लिए उपयुक्त फ़िल्म.
- यूए (अनरिस्ट्रिक्टेड पब्लिक एग्ज़ीबिशन विद पेरेंटल गाइडेंस): 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए माता-पिता की सलाह ज़रूरी
- ए (एडल्ट्स ओनली): कठोर भाषा, हिंसा या यौन सामग्री के कारण केवल 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के दर्शकों के लिए
- एस (स्पेशलाइज्ड ऑडियंस): विशेष वर्गों (जैसे डॉक्टरों, वैज्ञानिकों आदि) के लिए सीमित.
वहीं, अगर फ़िल्म निर्माता सीबीएफ़सी के फैसले से संतुष्ट नहीं है, तो उसके पास दो रास्ते होते हैं: एक रिवाइजिंग कमेटी और दूसरी अदालत.
रिवाइजिंग कमेटी के विकल्प में निर्माता दोबारा जांच के लिए आवेदन कर सकता है. इस बड़ी समिति की अध्यक्षता सीबीएफ़सी के चेयरपर्सन करते हैं और पहली समिति के सदस्य इसमें शामिल नहीं हो सकते.
और अगर वहां भी इसका हल नहीं निकला तो निर्माता इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अदालत जा सकते हैं.
इरा भास्कर बताती हैं, “फ़िल्म निर्माताओं को आमतौर पर प्रमाणपत्र जारी होने से पहले अपनी फ़िल्मों को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में भेजने की स्वतंत्रता होती है. लेकिन ‘सतलुज’ के मामले में ऐसा नहीं हुआ.”
‘सतलुज’ को ‘पंजाब 95’ नाम से 2023 में टोरंटो फ़िल्म फेस्टिवल के लिए भेजा गया था, लेकिन फ़िल्म की स्क्रीनिंग नहीं हो सकी.
फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने का आधार क्या हो सकता है?
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सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट, 1952 के अनुसार, अगर फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को लगता है कि कोई फ़िल्म आम लोगों को दिखाने के योग्य नहीं है, तो वह उसे प्रमाणपत्र देने से साफ इनकार कर सकता है.
ये सभी नियम भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेज ‘द सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट, 1952’ (भाग-2) के आधार पर हैं.
क़ानून के अनुसार, किसी फ़िल्म को रोकने या प्रतिबंधित करने के मुख्य आधार- देश की सुरक्षा और अखंडता, सामाजिक शांति और अपराध, अश्लीलता और अदालत की अवमानना.
ओटीटी कंटेंट को कौन मॉनिटर करता है?
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ओटीटी प्लेटफॉर्मों के रेगुलेशन को समझने के लिए बीबीसी ने भारत में स्थित एक इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी लॉ फ़र्म ‘फाइड्स लॉ चैंबर्स’ की आईपी अटॉर्नी और मैनेजिंग पार्टनर श्वेताश्री मजूमदार से बातचीत की.
श्वेताश्री ने बताया, “ओटीटी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन आता है, जो आईटी रूल्स, 2021 के भाग तीन के अंतर्गत है. ओटीटी के लिए कोई अलग ‘सेंसर बोर्ड’ नहीं है. यह एक लेयर्ड (चरणबद्ध) सिस्टम है: पहले प्लेटफ़ॉर्म का स्व-नियमन, फिर इंडस्ट्री की सेल्फ-रेगुलेटरी बॉडीज़, और अंत में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की निगरानी होती है.”
“इसके साथ ही सरकार के पास आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत किसी भी कंटेंट को सीधे ब्लॉक करने की सर्वोच्च शक्ति होती है.”
श्वेताश्री मजूमदार बताती हैं कि अगर किसी व्यक्ति को ओटीटी की किसी सामग्री से शिकायत है, तो वो अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं.
इस शिकायत का समाधान 15 दिनों के भीतर करना होता है.
सेल्फ़-रेगुलेटरी बॉडी
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सेल्फ़-रेगुलेटरी बॉडी की अध्यक्षता किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा की जाती है. यह अपीलों की सुनवाई करती है और इसके फ़ैसले को प्लेटफ़ॉर्म को मानना होता है.
इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय: यह आगे भेजी गई शिकायतों या स्वतः संज्ञान वाले मामलों की समीक्षा करती है और सलाह या चेतावनियां जारी कर सकती है.
क्या सरकार इस सिस्टम को बायपास कर सकती है?
श्वेताश्री मजूमदार कहती हैं, “हां, इस पूरी प्रक्रिया को बायपास किया जा सकता है. सरकार धारा 69ए के तहत आपातकालीन ब्लॉकिंग का इस्तेमाल करके पहले और दूसरे स्तर को छोड़कर सीधे कार्रवाई कर सकती है.”
जहां तक फ़िल्म ‘सतलुज’ का संबंध है, श्वेताश्री के मुताबिक़, “सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस बात की कोई पुष्टि नहीं हुई है कि धारा 69ए के तहत कोई औपचारिक आदेश जारी किया गया था. ज़ी5 ने फ़िल्म को केवल ‘मौजूदा घटनाक्रम’ का हवाला देते हुए हटाया. यह क़ानूनी प्रक्रिया के बजाय अनौपचारिक दबाव का एक उदाहरण हो सकता है.”
ओटीटी पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की क़ानूनी परिभाषा क्या है?
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श्वेताश्री मजूमदार बताती हैं कि आईटी रूल्स में “राष्ट्रीय सुरक्षा” को अलग से परिभाषित नहीं किया गया है. इसे संविधान के अनुच्छेद 19(2) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाई जाने वाली उचित पाबंदियां) और धारा 69A में दी गई श्रेणियों से लिया जाता है, जिनमें शामिल हैं:
- भारत की संप्रभुता और अखंडता
- देश की सुरक्षा
- विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध
- सार्वजनिक व्यवस्था
- किसी अपराध को भड़काने से रोकना
क्या कंटेंट हटाने के लिए पुलिस शिकायत, एफ़आईआर या कारण बताना जरूरी है?
श्वेताश्री मजूमदार कहती हैं, “नहीं, किसी एफ़आईआर या सार्वजनिक शिकायत की कोई आवश्यकता नहीं होती. रूल 9 (आपातकालीन ब्लॉकिंग) के तहत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव तत्काल आवश्यकता का हवाला देकर, बिना किसी पूर्व सुनवाई के कंटेंट को ब्लॉक करने का आदेश दे सकते हैं. ‘सतलुज’ के मामले में भी यही पैटर्न दिखाई देता है.
क्या सरकार के लिए कारण सार्वजनिक करना जरूरी है?
श्वेताश्री मजूमदार बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने श्रेय सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में तय किया था कि कंटेंट हटाने के कारण लिखित रूप में दर्ज होने चाहिए, ताकि आदेशों को रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी जा सके, और प्लेटफॉर्म तथा कंटेंट बनाने वाले को अपना पक्ष रखने का अधिकार मिलना चाहिए.
लेकिन वास्तविक व्यवहार में स्थिति अलग है.
“व्यवहार में, रूल 16 ‘सख्त गोपनीयता’ लागू करता है और अदालतों ने भी इसे सही माना है. कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्वीकार किया था कि गोपनीयता के आधार पर विस्तृत कारणों को छिपाया जा सकता है, और केवल प्लेटफॉर्म को नोटिस देना ही पर्याप्त है (यूजर्स या क्रिएटर्स को सूचित करना जरूरी नहीं है).”
इसका नतीजा यह निकलता है कि प्रभावित क्रिएटर्स को अपने ही कंटेंट के ख़िलाफ़ जारी किए गए आदेश को देखने के लिए आरटीआई का सहारा लेना पड़ता है, जो अक्सर असफल रहता है.
श्वेताश्री मजूमदार कहती हैं, “इस पूरे क़ानूनी ढांचे को एक नरम स्व-नियमन के रूप में तैयार किया गया था. लेकिन वास्तव में, इसे तीन-स्तरीय सिस्टम के बजाय आपातकालीन, गोपनीय और स्वतः संज्ञान लेने वाले चैनलों के माध्यम से लागू किया जा रहा है.”
“यही कारण है कि यह प्रक्रिया कई बार काफी मनमानी, गैर-पारदर्शी और चुनौती देने में मुश्किल नजर आती है.”
फ़िल्म ‘सतलुज’ का हवाला देते हुए इरा भास्कर कहती हैं, “लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यही बोर्ड है जिसने ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरल स्टोरी’ जैसी फ़िल्मों को मंजूरी दी थी, जो ऐसे ही संवेदनशील मुद्दों पर आधारित थीं और उनमें भी इसी तरह का प्रभाव पैदा करने की क्षमता थी. फ़िल्मों के साथ यह चयनात्मक व्यवहार आपको इस संस्था की स्वतंत्रता के बारे में बहुत कुछ बताता है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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