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मध्य प्रदेश के दतिया में बीजेपी कार्यालय के बाहर शुक्रवार शाम पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को बीजेपी उम्मीदवार बनाए जाने के बाद विरोध शुरू हुआ. यह विवाद शनिवार सुबह तक हिंसात्मक हो गया.
नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने सड़क जाम की और शनिवार सुबह पथराव की घटनाएं सामने आईं. प्रशासन के मुताबिक़, कई उच्च अधिकारियों समेत आठ पुलिसकर्मी घायल हुए.
कुछ प्रदर्शनकारियों के भी घायल होने की सूचना मिली. हालात बिगड़ते देख अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया. पूरे ज़िले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर दी गई.
बीजेपी ने शुक्रवार की शाम दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था. नरोत्तम मिश्रा दतिया से तीन बार विधायक रह चुके हैं लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में वो हार गए थे.
वहीं टिकट न मिलने के बाद पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “मुझे सोशल मीडिया पर पेट्रोल और मिट्टी का तेल डालते हुए वीडियो दिखाए गए. ऐसा कोई काम नहीं करना है. कल भी मैंने कहा था रोड बाधित नहीं करना है. पार्टी फोरम में अपनी बात कहें.”
लेकिन सवाल दतिया में हो रहे विरोध प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं है.
सवाल यह भी है कि जिस नेता को कभी मध्य प्रदेश बीजेपी का सबसे प्रभावशाली चेहरा माना जाता था, जिनकी पहचान केवल दतिया तक सीमित नहीं थी, उनकी राजनीतिक वापसी को पार्टी ने आख़िर क्यों रोक दिया?
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों से बातचीत में इसके पीछे संगठन, सत्ता और चुनावी रणनीति की कई परतें सामने आती हैं.
कई महीने की तैयारी, लेकिन मंज़िल नहीं
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दतिया उपचुनाव नरोत्तम मिश्रा के लिए महज़ एक चुनाव नहीं था.
2023 विधानसभा चुनाव में हार के बाद यह उनकी सक्रिय राजनीति में वापसी का सबसे बड़ा अवसर माना जा रहा था.
पार्टी नेताओं के मुताबिक़ पिछले कई महीनों में मिश्रा ने दतिया में अपनी सक्रियता काफ़ी बढ़ा दी थी.
उन्होंने अलग-अलग समुदायों के साथ बैठकें कीं. स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संवाद किया और अपने पारंपरिक समर्थकों को फिर से संगठित करने की कोशिश की.
एक स्थानीय बीजेपी नेता के मुताबिक़, “दादा (नरोत्तम मिश्रा) इस बार सामाजिक समीकरणों पर विशेष ध्यान दे रहे थे. वो अलग-अलग समाज के बीच बैठकों के ज़रिए अपने पुराने जनाधार को फिर से मज़बूत करने की कोशिश कर रहे थे.”
नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद उन्होंने कथित तौर पर नामांकन पत्र भी ख़रीद लिया था. दतिया में इसे इस संकेत के रूप में देखा गया कि उनकी उम्मीदवारी लगभग तय है.
लेकिन आख़िरी समय में पूरी तस्वीर बदल गई और पार्टी ने पहली बार चुनाव लड़ रहे संगठन के नेता अशुतोष तिवारी को उम्मीदवार घोषित कर दिया.
नरोत्तम मिश्रा को बीजेपी ने टिकट क्यों नहीं दिया?
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बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह फ़ैसला केवल दतिया जीतने का नहीं था.
उनके मुताबिक़, पार्टी नेतृत्व नरोत्तम मिश्रा की संभावित वापसी के राजनीतिक असर का भी आकलन कर रहा था.
एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, “अगर नरोत्तम मिश्रा चुनाव जीतकर विधानसभा लौटते तो राज्य में एक और बड़ा पावर सेंटर बन जाता.”
उनके मुताबिक़, मुख्यमंत्री मोहन यादव अभी अपनी राजनीतिक पकड़ मज़बूत करने की प्रक्रिया में हैं.
उन्होंने आगे कहा, “ऐसे समय में पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता था कि एक और प्रभावशाली शक्ति केंद्र उभरे.”
राज्य के वरिष्ठ पत्रकार नितेंद्र शर्मा ने भी नए पावर सेंटर की बात को दोहराया और साथ ही कहा कि सरकार पहले से कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है.
उन्होंने कहा, “हाल ही में मुख्यमंत्री मोहन यादव पर कुर्सी के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं. इसके अलावा लगातार कई महीनों से स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं. कई घटनाएं सामने आई हैं. ऐसे समय में पार्टी नहीं चाहती थी कि सरकार के साथ-साथ संगठन के भीतर भी नए पावर सेंटर्स बन जाएं और आपसी खींचतान को बढ़ावा मिले.”
संगठन बनाम राजनीतिक कद
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दतिया से अशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया है, जिनकी पहचान एक संगठनात्मक नेता की रही है.
वो एबीवीपी से बीजेपी संगठन तक विभिन्न ज़िम्मेदारियां निभा चुके हैं. उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा चुनावी राजनीति से ज़्यादा संगठन के भीतर रही है.
पार्टी के एक अन्य नेता कहते हैं कि उम्मीदवार का चयन भी अपने आप में एक संदेश है.
उनके मुताबिक़, “संगठन ने व्यक्तिगत कद से ज़्यादा संगठनात्मक निष्ठा को प्राथमिकता दी. यही वजह है कि जिस सीट से छह बार विधायक रहे नेता टिकट की दौड़ में थे, वहां पहली बार चुनाव लड़ने वाले नेता को आगे किया गया.”
क्या नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता भी वजह बनी?
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पिछले कुछ महीनों में नरोत्तम मिश्रा जिस तरह लगातार दतिया में सक्रिय रहे, उससे स्थानीय स्तर पर लगभग यह धारणा बन गई थी कि टिकट उन्हें ही मिलेगा.
उन्होंने विभिन्न समुदायों की बैठकें कीं. पारंपरिक वोट बैंक को फिर से संगठित करने की कोशिश की. कार्यकर्ताओं से लगातार संवाद बनाए रखा.
लेकिन बीजेपी ने पहले भी कई बार ऐसे नेताओं को टिकट नहीं दिया जिन्हें लेकर राजनीतिक हलकों में उम्मीदवारी लगभग तय मानी जा रही थी.
पार्टी के भीतर इसे इस बात के संकेत के तौर पर देखा जाता है कि अंतिम फैसला केवल शीर्ष नेतृत्व करता है.
क्या चुनावी गणित बदलेगा?
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पार्टी नेताओं का मानना है कि दतिया का चुनाव केवल उम्मीदवारों के नाम से तय नहीं होगा.
यहां जातीय समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.
अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक ब्राह्मण मतदाता 33 से 35 हज़ार के बीच हैं और इन्हें बीजेपी का पारंपरिक आधार माना जाता है.
अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग 58 से 60 हज़ार बताई जाती है. इनमें जाटव और अहिरवार समाज के मतदाता बड़ी संख्या में हैं.
कुशवाह समाज के क़रीब 28 से 30 हज़ार मतदाता हैं. यादव समाज के मतदाताओं की संख्या 14 से 18 हज़ार के बीच मानी जाती है.
इसके अलावा ठाकुर, वैश्य, मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता भी चुनावी नतीजे को प्रभावित करते हैं.
कांग्रेस और बीजेपी के अलावा इस बार आज़ाद समाज पार्टी ने दामोदर यादव को उम्मीदवार बनाया है. माना जा रहा है कि उनकी उम्मीदवारी यादव समाज के साथ-साथ अनुसूचित जाति के कुछ वोटों में भी सेंध लगाने की कोशिश करेगी.
अगर ऐसा होता है तो इसका असर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है.
उधर बीजेपी ने कुशवाह समाज की नाराज़गी दूर करने के लिए संगठनात्मक बदलाव भी किए हैं.
रघुवीर कुशवाह को ज़िला अध्यक्ष बनाया गया, जिसे पार्टी की इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. यानी बीजेपी को भरोसा है कि सामाजिक समीकरण उसके पक्ष में बनाए जा सकते हैं, भले ही उम्मीदवार नरोत्तम मिश्रा न हों.
मध्य प्रदेश में बीजेपी से ज़्यादा आरएसएस का दख़ल?

मध्य प्रदेश की राजनीति को लंबे समय से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार देशदीप सक्सेना इस फ़ैसले को व्यापक राजनीतिक बदलाव के रूप में देखते हैं.
वो कहते हैं, “नरोत्तम मिश्रा का गुणा-गणित मोहन यादव से भी बहुत बढ़िया नहीं था और अभी जो पार्टी लीडरशिप है उससे भी बेहतर संबंध नहीं थे. उनका एक रौब था.”
देशदीप सक्सेना के मुताबिक़, बीजेपी के भीतर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका पहले की तुलना में बढ़ी है.
वो कहते हैं, “आप देख लीजिए पिछले कुछ समय में गोपाल भार्गव, प्रह्लाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय, शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता जो पहले बहुत बड़े माने जाते थे उनके सामने प्रासंगिक बने रहने की चुनौती अलग-अलग स्तर पर खड़ी है. जो पिछले सरकारों में प्रभावी लोग थे वो आरएसएस की मौजूदा शैली की राजनीति में उतने शक्तिशाली नहीं हैं. नई नेतृत्व की टोली आरएसएस और बीजेपी के मौजूदा लक्ष्यों के अनुरूप ज़्यादा काम करती है.”
वो हाल के राजनीतिक फ़ैसलों का हवाला देते हुए कहते हैं, “राज्यसभा की सीट पर भी यही हुआ. आरएसएस का रोल बढ़ा है. इसलिए रजनीश अग्रवाल को सीट मिली थी. अब नरोत्तम की जगह अशुतोष तिवारी को टिकट दिया गया है.”
आरएसएस की भूमिका

राज्य के एक और वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राजेश बादल ने भी आरएसएस के बढ़ते हस्तक्षेप को नरोत्तम मिश्रा की टिकट कटने का कारण बताया.
राजेश बादल ने कहा, “आरएसएस का दख़ल तो बढ़ा है. फिर चाहे वो राज्यसभा का हालिया चुनाव हो या अब नरोत्तम मिश्रा को हाशिये पर धकेलने का फ़ैसला. आरएसएस ने बीजेपी राज्य के पार्टी स्तर के फैसलों पर भी पैठ बढ़ा दी है. पार्टी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी इसी कवायद की कड़ी हैं.”
सक्सेना का यह भी मानना है कि “बीजेपी के संगठन की जो पावर है, उसको भी थोड़ा बाँधा जा रहा है.”
उनके मुताबिक़ यह बदलाव केवल नेतृत्व का नहीं बल्कि राजनीतिक शैली का भी है.
वो कहते हैं, “इसी बहाने एक तरह से क्लीनिंग भी की जा रही है. नरोत्तम मिश्रा की राजनीति का जो रौब और तरीक़ा था, वह सबको पता है. बीजेपी अब यह संदेश देना चाहती है कि वह सुचिता की पार्टी है.”
दतिया उपचुनाव के लिए मतदान 30 जुलाई को होगा और नतीजे 3 अगस्त को घोषित होंगे.
लेकिन टिकट की घोषणा के साथ जो घटनाक्रम सामने आया, उसने यह संकेत ज़रूर दिया कि बीजेपी के भीतर अब केवल चुनाव जिताने की क्षमता ही किसी नेता का सबसे बड़ा राजनीतिक आधार नहीं है.
एक तरफ़ महीनों से तैयारी कर रहे, छह बार के विधायक और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा थे. दूसरी तरफ संगठन से निकले एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था. बीजेपी ने दूसरा विकल्प चुना.
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मानें तो यह फैसला सिर्फ दतिया की एक सीट का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश बीजेपी के भीतर सत्ता, संगठन और नेतृत्व के नए संतुलन का संकेत भी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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