याचिकाकर्ता ने कहा कि नगर निगम के अधिकार सीमित हो जाएंगे। मेट्रोपालिटन क्षेत्र में शामिल इलाकों में विकास और उसकी निगरानी, रख-रखाव के काम अथारिटी के पास चले जाएंगे, निगम के पास केवल साफ-सफाई और छोटे-मोटे काम ही रहेंगे।
हाई कोर्ट में यह जनहित याचिका एडवोकेट अक्षत पहाडिया ने प्रस्तुत की है। याचिका में इस पूरी परियोजना, एक्ट की धारा तीन जिसमें मेट्रोपालिटन का क्षेत्र तय किया गया है को चुनौती दी गई है।
कहा है कि नियमों के हिसाब से पहले धारा-3 में जनता और इसमें शामिल होने वाले क्षेत्रों के नगर निगम, नगरीय निकायों और ग्राम पंचायतों, जिला पंचायत आदि से सहमति लेना जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
इन बिंदुओं पर दायर की गई है याचिका
– सरकार की अधिसूचना संविधान के 74 वे संशोधन की मंशा के खिलाफ है। संविधान के मुताबिक स्थानीय निकायों की अनदेखी करते हुए मेट्रोपालिटन क्षेत्र को लेकर जारी अधिसूचना में ऐसा नहीं किया गया।
– मेट्रोपालिटन क्षेत्र में जिन स्थानीय निकायों को शामिल किया गया है उससे चर्चा भी नहीं की गई न ही उनके सुझाव लिए गए।
– इस अधिसूचना के मेट्रोपालिटन क्षेत्र में उज्जैन और इंदौर को शामिल किया गया है, लेकिन इन दोनों शहरों की प्रकृति अलग-अलग है, इस पर भी विचार नहीं किया गया है।
– कानून के अनुसार जो भी मेट्रोपालिटन क्षेत्र होगा उसके लिए कमेटी बनेगी। इस कमेटी के सदस्यों में दो तिहाई संख्या उन क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों की रहेगी जो मेट्रोपालिटन क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं। जबकि इस अधिसूचना में ऐसा नहीं किया गया है। सरकार ने इसके लिए अलग से अथॉरिटी बनाई है। इसके मुखिया मुख्यमंत्री, सदस्य मंत्री और प्रशासन के अधिकारी रहेंगे। शासन की इस मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र कमेटी में इसमें आने वाले क्षेत्रों के दो सदस्यों अथॉरिटी में शामिल किया जा रहा है।
– अधिसूचना के मुताबिक इस अथॉरिटी को पूरी शक्तियां दे दी गई हैं। एक मेट्रोपॉलिटन कमेटी बनाने की बात कही गई है, लेकिन इसे कोई शक्ति नहीं दी गई।
– नियमानुसार पहले मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल क्षेत्र को परिभाषित किया जाना था फिर अधिसूचना जारी की जाना थी, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।
– मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में इलाकों को शामिल करने से पहले वहां के जनप्रतिनिधियों का पक्ष नहीं लिया गया। स्थानीय निकाय जैसे पंचायत, नगर निगम से सहमति, सुझाव और आपत्तियां नहीं ली गई। इस तरह से जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक शक्तियां कम हो जाएगी। यह संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है।
– नियमानुसार मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल क्षेत्रों की प्रकृति एक जैसी होना चाहिए, लेकिन इंदौर प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी है तो उज्जैन धार्मिक नगरी। इन दोनों नगर की प्रकृति विपरीत है।
– अधिसूचना के तहत मेट्रोपॉलिटन में इंदौर और उज्जैन का 16 हजार वर्ग किमी का क्षेत्र निर्धारित किया है। इसमें आधा दर्जन जिले शामिल हैं। इंदौर, देवास, उज्जैन, धार, शाजापुर और रतलाम की 38 तहसीलें इसमें शामिल की गई हैं। इनमें 2781 गांव जुड़े हैं। 75 लाख से अधिक की जनसंख्या का अनुमान लगाते हुए मेट्रोपॉलिटन की तैयारी की जा रही है। अंतिम रूप से 16000.87 वर्ग किमी का क्षेत्र लिया गया है। 75.34 लाख आबादी का अनुमान लगाया गया है। इसमें इंदौर का शत प्रतिशत क्षेत्र जो कि 3901.63 वर्ग किमी है उसे शामिल किया गया है। इसी तरह उज्जैन के 6097.99 वर्ग किमी क्षेत्र में से 3595.24 वर्ग किमी क्षेत्र को इसमें शामिल किया गया है। यह लगभग 59 प्रतिशत होता है। शामिल क्षेत्र के अनुपात में भी अंतर है। उसके बावजूद इसका मुख्यालय उज्जैन बनाया जा रहा है।
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