हमारे मनीषियों ने पूर्व में ही कहा है कि ‘संघे शक्ति कलियुगे’। अर्थात वर्तमान युग में सबसे बड़ी शक्ति संगठन और सामूहिकता की है। हमारी सनातन सांस्कृतिक चेतना का यही मूल स्वर रहा है कि आस्था केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला सेतु है। कांवड़ यात्रा इसी सूत्र वाक्य का जीवंत प्रमाण बनकर प्रतिवर्ष श्रावण मास में साकार होती है, जब लाखों-करोड़ों शिवभक्त कंधे पर गंगाजल लेकर मीलों की पदयात्रा करते हैं और सामाजिक भेदभाव की समस्त दीवारें ढहा देते हैं। कांवड़ यात्रा से उठने वाली गूंज वस्तुतः हमारी सनातन एकता का उद्घोष है, जो पूरे समाज को शक्ति प्रदान करता है।
सनातन का वास्तविक रूप
जब कोई श्रद्धालु कंधे पर कांवड़ लेकर चलता है, तो न तो उससे यह पूछा जाता है कि वह किस जाति का है, न ही यह देखा जाता है कि वह किस आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है। रास्ते में जो शिविर लगते हैं, वहां सभी वर्गों के लोग समान भाव से सेवा में जुटते हैं, साथ ही प्रसाद ग्रहण करते हैं। यही सनातन धर्म का वास्तविक रूप है।
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