हिंदी के साहित्य मंडल में मैंने जिन लोगों को देखा, जाना, पढ़ा और सीखा, उनमें एक नाम सबसे महत्वपूर्ण है-नामवर सिंह। एक सजीव पुस्तकालय, एक संदर्भ ग्रंथ, एक आलोचक, एक साहित्य प्रवर, एक छह फीट का आदमी, जिसकी देह से लेकर वाणी और आचरण तक भाषा और संस्कृति समाई हुई थी। आलोचना के तो वह शिखर पुरुष थे ही, मेरे गुरु भी थे। मैं उनका स्नेह पात्र। यह स्नेह चार दशक की लंबी यात्रा तक मुसलसल बना रहा। इन चार दशकों की यह पूंजी मेरे जीवन की सबसे बहुमूल्य उपलब्धियों में से एक है।
एक बार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से किसी ने पूछा कि गुरुवर आपकी सर्वश्रेष्ठ कृति कौन-सी है। आचार्य हजारीप्रसाद जी के मुंह से निकला-नामवर सिंह। नामवर सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी उनकी समग्रता थी। इसी खूबी ने उन्हें बड़ी-से-बड़ी परंपरा को खारिज करने, अपना झंडा गाड़ने और हिंदी आलोचना में सबसे ऊंचा, और अलहदा स्थान बनाने में मदद की। हर खूबी के कुछ फायदे होते हैं, तो कुछ नुकसान भी। नामवर जी को अपनी इसी खूबी के लिए बनारस में काफी विरोध झेलना पड़ा।

नामवर सिंह तीन दशकों तक हिंदी साहित्य के केंद्र में थे। उन्होंने आलोचना को गंभीरता से मुक्त कर आसान, सरस और पठनीय बनाया, इसलिए वह रचना का आनंद देने लगी। लिखने से ज्यादा महत्व बोले जाने को दिया जाने लगा।
किताबों की तुलना में संगोष्ठियों का महत्व बढ़ा और इसके अलमबरदार बने नामवर जी, क्योंकि वह बातों के जादूगर भी थे। लेकिन इसके पीछे एक गंभीर अध्येता था। वह मिर्जा गालिब से लेकर वर्तमान तक, कहीं से भी शुरू कर, कहीं भी खत्म कर सकते थे। जितना अधिकार उनका कालिदास और भवभूति पर था, उतनी ही सहजता से वह ब्रेख्त और लुशुन को भी समझाते थे। वह भाषा के बेजोड़ खिलाड़ी थे।
उनकी भाषा मुहावरे भी गढ़ती है और यही मुहावरे साहित्य की चौहद्दी बनाते हैं। आलोचना ही नहीं, कविता की परंपरा से भी उनका उतना ही गहरा संबंध था। नामवर सिंह ‘पुनीत’ को बहुत कम लोग जानते हैं। वह इस नाम से शुरुआत में कविताएं लिखते थे।

नामवर सिंह हिंदी आलोचना की तीसरी परंपरा थे। पहली परंपरा आचार्य रामचंद्र शुक्ल, दूसरी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और तीसरी खुद उनसे निकली है। शुक्ल जी हिंदी आलोचना के जनक हैं। आचार्य द्विवेदी उसे विस्तार देते हैं। नामवर सिंह उसे धार देते हैं। नामवर सिंह का कर्मक्षेत्र भले ही दिल्ली रहा हो, पर उनका भाव क्षेत्र हमेशा बनारस रहा।
जिस बनारसी मिट्टी ने नामवर को बनाया, वह सृजन के अक्षुण्ण प्राणतत्व से भरी-पूरी थी। उसमें कबीर का साहस, तुलसी का लोकतत्त्व, प्रेमचंद का समाजशास्त्र और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का पांडित्य था। जब ये सारे तत्व एक साथ मिलते हैं, तब एक नामवर सिंह बनते हैं। उनकी यही पहचान जीवन भर उनके साथ रही। बनारस और पान, दोनों उनकी कमजोरी थे।

नामवर सिंह के नाम में वर जुड़ा है। यह यश का, जिजीविषा का और लोकप्रियता का वर है। उनके जाने से हिंदी आलोचना की सबसे सजग, सतर्क, बहुपठित और संवादी परंपरा का अवसान हुआ। हम सब नामवर जी के जन्म शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। इस समय-द्वार पर नामवर सिंह की उपलब्धियों, व्यक्तित्व और कृतित्व का तोरण बंधा है। उनकी विद्वता का मंगलाचार हो रहा है। उनके ज्ञान का स्वस्तिवाचन हो रहा है। लेकिन इस सारे शामियाने के ऊपर रिक्तता का घटाटोप है। मैं हिंदी के इस अभाव को धूप में दौड़ते एक अनाथ बालक की तरह देखता हूं। सचमुच, बड़ी मुद्दत में होता है, कहीं कोई नामवर पैदा।
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