Who Is Asmita Dey?:पिता करते थे साइकिल की मरम्मत, बेटी ने ग्लास्गो में रचा इतिहास; किस तरह जूडो में बना करियर – Commonwealth Games 2026: Who Is Asmita Dey? Indian Judoka Profile And Career Struggle And Story

Who Is Asmita Dey?:पिता करते थे साइकिल की मरम्मत, बेटी ने ग्लास्गो में रचा इतिहास; किस तरह जूडो में बना करियर – Commonwealth Games 2026: Who Is Asmita Dey? Indian Judoka Profile And Career Struggle And Story

दक्षिण त्रिपुरा के छोटे से शहर बेलोनिया से ग्लासगो तक का अस्मिता डे का सफर संघर्ष, मेहनत और जिद की कहानी है। साइकिल की मरम्मत करने वाले पिता की बेटी अस्मिता ने शुक्रवार को राष्ट्रमंडल खेलों में महिलाओं के 48 किलोग्राम जूडो वर्ग का स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो में भारत के लिए स्वर्ण जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बन गईं। फाइनल में उन्होंने कनाडा की हाइडी क्वाक को गोल्डन स्कोर में हराया।




Commonwealth Games 2026: Who is Asmita Dey? Indian Judoka Profile and Career Struggle and story

अस्मिता डे
– फोटो : PTI


800 मीटर दौड़ से शुरू हुआ सफर

अस्मिता ने खेल की शुरुआत जूडो से नहीं, बल्कि 800 मीटर दौड़ से की थी। वर्ष 2015 में त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में दाखिला लेने के बाद प्रशिक्षकों की सलाह पर उन्होंने जूडो अपनाया। शुरुआत में बेलोनिया विद्यापीठ कोचिंग सेंटर की बीना देबनाथ ने उनकी प्रतिभा को निखारा। इसके बाद त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल के जूडो प्रशिक्षक माणिक लाल देब ने उन्हें प्रशिक्षण दिया। राष्ट्रीय स्कूल खेलों और खेलो इंडिया प्रतियोगिताओं में अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्हें भोपाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण के क्षेत्रीय केंद्र में प्रशिक्षण का मौका मिला। वह अभी भी भोपाल में ही अभ्यास करती हैं। वह भारतीय टीम में जगह बनाने वाली त्रिपुरा की पहली जूडो खिलाड़ी भी हैं।


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अस्मिता डे
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आर्थिक मुश्किलों के बीच बढ़ती रहीं आगे

अस्मिता के पिता बेलोनिया में साइकिल मरम्मत की दुकान चलाते थे और मां गृहिणी हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद परिवार ने बेटी के खेल के सपने को आगे बढ़ाया। वर्ष 2023 में जब वह ताशकंद ग्रैंड स्लैम में हिस्सा लेना चाहती थीं, तब उन्होंने राज्य सरकार से आर्थिक मदद की अपील की थी। पैसे की कमी के कारण वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकीं। इसके बावजूद अस्मिता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उन्होंने 2022 में एशियन कैडेट एवं जूनियर जूडो चैंपियनशिप में कांस्य, 2023 में कुवैत एशियन ओपन में रजत और जूनियर एशियन कप में स्वर्ण पदक जीता। 2025 में कासाब्लांका अफ्रीकन ओपन में भी उन्होंने स्वर्ण हासिल किया। 


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अस्मिता डे
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उनके प्रशिक्षक यशपाल सोलंकी का मानना है कि अस्मिता में दुनिया की शीर्ष खिलाड़ियों को चुनौती देने की क्षमता है। उन्होंने कहा था कि चोटों से बची रहीं तो अस्मिता कम से कम तीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं। बेलोनिया की गलियों से शुरू हुआ यह सफर अब राष्ट्रमंडल के स्वर्ण तक पहुंच चुका है और अस्मिता डे त्रिपुरा की खेल प्रतिभा की नई पहचान बन गई हैं।


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अस्मिता डे
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कोच और पिता को समर्पित किया पदक

स्वर्ण पदक जीतने के बाद अस्मिता ने कहा, यह पदक जीतकर मैं सच में बहुत खुश हूं। यह पदक मेरे खुद के लिए, मेरे राज्य और मेरे देश के लिए बहुत जरूरी था। मैं इसे अपने कोच और पिता को समर्पित करती हूं। मेरे पिता का दिसंबर 2025 में निधन हो गया था, उन्होंने मुझे बहुत सपोर्ट किया था, लेकिन उनकी मौत के बाद मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है। हालांकि, दो महीने बाद एशियन गेम्स के ट्रायल्स हुए, जिसमें मैं नेशनल लेवल पर पहले स्थान पर रही।


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