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खंडवा जिले के पंधाना थाना क्षेत्र के एक मारपीट मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए आरोपी कलीम उर्फ कल्लू को अग्रिम जमानत दे दी है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आरोपी पर लगाई गई अधिकांश धाराएं जमानती हैं और जिस गैर-जमानती धारा के आधार पर गिरफ्तारी की जा रही है, उसके आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया ही नहीं बनते। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामले में आरोपी की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित करना आश्चर्यजनक है। 20 जुलाई को आया आदेश मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे की एकलपीठ ने की। यह मामला पंधाना थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और पुलिस की कार्रवाई की समीक्षा के बाद आरोपी को अग्रिम जमानत देने का फैसला सुनाया। सीसीटीवी फुटेज बना बचाव का आधार आवेदक की ओर से अदालत को बताया गया कि पहली अग्रिम जमानत याचिका वापस लेने के बाद घटना स्थल का सीसीटीवी फुटेज प्राप्त हुआ। इस फुटेज में घटना के समय आरोपी कलीम मौके पर दिखाई नहीं देता। बचाव पक्ष ने इसे अपने पक्ष का महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया। शिकायतकर्ता ने भी दिया शपथपत्र मामले में दर्ज दूसरे प्रकरण की फरियादी सुल्ताना बी ने भी पुलिस अधीक्षक को शपथपत्र देकर कहा कि कलीम घटना स्थल पर मौजूद नहीं था और उसका नाम गलती से एफआईआर में शामिल हो गया। इस तथ्य को भी अदालत के समक्ष रखा गया। पुलिस नहीं दे सकी संतोषजनक जवाब सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को केस डायरी और घटना का सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। हालांकि पुलिस न तो मूल सीसीटीवी फुटेज अदालत में पेश कर सकी और न ही आरोपी की ओर से प्रस्तुत फुटेज का प्रभावी खंडन कर सकी। इस पर अदालत ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। कोर्ट की सख्त टिप्पणी हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ दर्ज अधिकांश धाराएं जमानती हैं। केवल बीएनएस की धारा 331(5) गैर-जमानती दिखाई गई है, लेकिन एफआईआर में दर्ज तथ्यों से भी इस धारा के आवश्यक तत्व स्पष्ट नहीं होते। ऐसे में आरोपी की गिरफ्तारी पर नकद इनाम घोषित करना पुलिस की “ओवररीचिंग” जैसा प्रतीत होता है, जो हैरान करने वाला है। 50 हजार के निजी मुचलके पर मिली राहत अदालत ने आदेश दिया कि यदि कलीम उर्फ कल्लू को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा किया जाए। साथ ही उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 482(2) के तहत निर्धारित सभी शर्तों का पालन करना होगा। अब पुलिस की जांच पर उठे सवाल हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद मामले में पुलिस की जांच और कार्रवाई पर सवाल खड़े हो गए हैं। अदालत के आदेश ने स्पष्ट संकेत दिया है कि गिरफ्तारी और गंभीर धाराएं लगाने से पहले पर्याप्त साक्ष्य और कानूनी आधार होना आवश्यक है।
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