MP High Court का बड़ा फैसला… पहली शादी छुपाकर की दूसरी शादी, फिर भी महिला को मिलेगा भरण-पोषण

MP High Court का बड़ा फैसला… पहली शादी छुपाकर की दूसरी शादी, फिर भी महिला को मिलेगा भरण-पोषण

न्यायमूर्ति गजेंद्रसिंह ने दूसरी शादी और भरण-पोषण से संबंधित एक मामले में फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि अंतरिम भरण-पोषण तय करते समय कोर्ट पक्षकारों क …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 02 Jun 2026 10:47:19 PM (IST)Updated Date: Tue, 02 Jun 2026 10:47:19 PM (IST)

MP High Court का बड़ा फैसला… पहली शादी छुपाकर की दूसरी शादी, फिर भी महिला को मिलेगा भरण-पोषण
MP High Court

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। पहला विवाह छुपाकर दूसरी शादी करने के मामले में हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति गजेंद्रसिंह ने दूसरी शादी और भरण-पोषण से संबंधित एक मामले में फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि अंतरिम भरण-पोषण तय करते समय कोर्ट पक्षकारों के आचरण और संबंधों की वास्तविकता को ध्यान में रखती हैं। केवल यह कहकर कि संबंध अवैध विवाह की श्रेणी में आता है, महिला को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता। विशेषकर जब रिकार्ड पर उपलब्ध साक्ष्य विवाह संबंध की पुष्टि कर रहे हों।

पहले पति की मौत के बाद रोहित से किया था मंदिर में विवाह

उज्जैन जिला निवासी महिला ने वर्ष 2015 में कुटंब न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया था। महिला का कहना था कि लगभग बीस वर्ष पूर्व उसका विवाह मंदसौर में हुआ था। इससे उसे दो बच्चे भी हैं। पहले पति कि बारह वर्ष पहले मृत्यु हो गई थी। इसके बाद वह उज्जैन आ गई। यहां वह रोहित नामक व्यक्ति के संपर्क में आई और दोनों ने मंदिर में विवाह कर लिया। इसके बाद से वह रोहित के साथ पत्नी की तरह रह रही थी।

रोहित के शादीशुदा होने का पता चला

कुछ समय से रोहित ने उससे संबंध खत्म कर लिए और पैसे भी देना बंद कर दिया। इस दौरान महिला को पता चला कि रोहित पहले से ही शादीशुदा है और उसके दो बच्चे भी हैं। इसके बाद उसने उज्जैन कुटुंब न्यायालय में भरण पोषण के लिए परिवाद प्रस्तुत किया था, लेकिन कुटंब न्यायालय से उसे राहत नहीं मिली। कुटुंब न्यायालय ने कहा कि पहले से ही विवाह होने की दशा में दूसरा विवाह शून्य है। ऐसी स्थिति में उसे भरण पोषण नहीं दिलवाया जा सकता।

हाई कोर्ट ने कुटुंब न्यायालय के फैसले को पलटा

इस फैसले को चुनौती देते हुए महिला ने हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। उसने रोहित से विवाह की तस्वीरें प्रस्तुत कीं जो उसका समर्थन करती थीं। कोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकारते हुए माना कि कुटुंब न्यायालय ने केवल विवाह शून्य है कहकर महिला का दावा खारिज कर गलती की। कोर्ट ने कहा कि अंतरिम राहत देने का अधिकार न्यायालय का विवेक अधिकार है। इसमें पक्षकारों के व्यवहार व परिस्थितियों को देखा जाता है। कोर्ट ने महिला की पांच हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग को उचित माना।

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