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जब किसी इलाके में युद्ध, भूकंप या दूसरी आपदा आती है तो मदद की जरूरत लाखों लोगों को होती है। लेकिन मदद में जुटे हर व्यक्ति की भी एक कहानी होती है।
संयुक्त राष्ट्र महिला (यूएन विमेन) की मानवीय कार्यकर्ता भी इन कहानियों का हिस्सा हैं। वे संकट ग्रस्त इलाकों में महिलाओं तक पहुंचकर उनकी जरूरतें समझती हैं और राहत कार्यों में मदद करती हैं।
मानवीय सहायता में लगीं संयुक्त राष्ट्र महिला कर्मचारियों के सबसे कठिन कामों में से एक यह देखना है कि लोगों को क्या चाहिए और जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं या नहीं।
ऐसी ही कुछ महिलाओं की कहानियां बताती हैं कि दूसरों की मदद करने वालों को भी कई बार संकट से गुजरना पड़ता है। बमबारी के बीच भतीजे को बचाया, सुबह फिर ड्यूटी पर लेबनान की नूर अब्दुल रेडा के लिए मानवीय संकट कोई अनूठी घटना नहीं है।
मार्च 2026 की शुरुआत में आधी रात पास में हो रही बमबारी की आवाज से उनकी नींद खुल गई। उन्होंने तुरंत एक छोटा बैग पैक किया और अपने एक महीने के भतीजे को सुरक्षित जगह पहुंचाया।
उनकी बहन दूसरे बच्चों को लेकर निकल गईं। कुछ घंटे बाद रेडा फिर काम पर थीं और उन परिवारों के लिए राहत कार्यों के समन्वय में जुटी थीं।
मलबे और भूकंप के झटकों के बीच पहुंचीं महिलाओं तक अफगानिस्तान में सितंबर 2025 के 6.0 तीव्रता के भूकंप के बाद यूएन विमेन की अराया अरायावुथ प्रभावित महिलाओं से मिलने निकलीं। रास्ता मलबे से बंद था, इसलिए कार छोड़कर पैदल चलना पड़ा।
रास्ते में नदियां पार कीं और खेतों से गुजरीं। हर 20 मिनट में भूकंप के झटके महसूस हो रहे थे। घंटों बाद टीम उन महिलाओं तक पहुंची। अरायावुथ के मुताबिक, उनकी ताकत और उम्मीद उन्हें बेहतर काम करने की प्रेरणा देती है।
भूकंप में घर टूटा फिर भी लोगों की मदद से पीछे नहीं हटीं म्यांमार में यूएन विमेन के साथ काम करने वाली रेबेका ने खुद संकट का सामना करते हुए दूसरों की मदद की। मार्च 2025 में उनके गृहनगर मांडले में आए विनाशकारी भूकंप में उनका घर टूट गया।
उनका परिवार बेघर हो गया। इसके बावजूद रेबेका ने प्रभावित महिलाओं की मदद करने से खुद को नहीं रोका।

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