मिजल्स-रूबेला बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित अडोरी, मछुरदा और लालपुर ग्राम पंचायतें हैं।
बालाघाट के बिरसा ब्लॉक में मिजल्स-रूबेला से विशेष संरक्षित बैगा आदिवासी परिवारों के 20 बच्चों की मौत हो चुकी है। प्रशासन को बच्चों में बीमारी की जानकारी जनवरी 2026 में ही मिल गई थी, लेकिन प्रभावी कार्रवाई में देरी हुई।
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बिरसा ब्लॉक के आदिवासी गांवों में बीमारी फैलने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी। 22 जुलाई को अडोरी के सरपंच परशुराम धुर्वे ने एसडीएम को फोन कर स्थिति बताई। इसके बाद उसी दिन स्वास्थ्य विभाग की टीम गांव पहुंची और 23 जुलाई से इलाज शुरू हुआ।
स्वास्थ्य टीम के पहुंचने तक 9 बच्चों की मौत हो चुकी थी। बीमारी आसपास के गांवों तक फैल चुकी थी और कई परिवारों में बच्चे बीमार थे। कुछ बच्चों की हालत इतनी गंभीर थी कि अस्पताल पहुंचने के बाद भी उनकी जान नहीं बच सकी।
भास्कर की इस रिपोर्ट में जानिए कि बीमारी की जानकारी मिलने के बावजूद कार्रवाई में कहां चूक हुई? स्वास्थ्य, टीकाकरण और पोषण की योजनाएं जमीन पर क्यों असर नहीं दिखा सकीं?

बच्चों की मौत के पीछे 5 बड़ी वजहें
1. अस्पताल दूर, झोलाछाप डॉक्टर पर निर्भरता
बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित अडोरी, मछुरदा और लालपुर ग्राम पंचायतें हैं। यहां से प्राथमिक उप स्वास्थ्य केंद्र 15 से 20 किमी और कम्युनिटी अस्पताल 35 से 40 किमी दूर है। इतनी दूरी के कारण कई परिवार झोलाछाप डॉक्टरों या पारंपरिक इलाज पर निर्भर थे।
सरकारी टीम के पहुंचने के बाद भी कई परिवार इलाज के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें समझाने में समय लगा, जिससे गंभीर मरीजों के अस्पताल पहुंचने में देरी हुई।
2. समय पर नहीं मिली मिजल्स-रूबेला की जानकारी
ICMR यानी भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों की मौत मिजल्स-रूबेला (खसरा) से हुई। बच्चों में त्वचा पर इसके लक्षण भी मिले। गांवों में आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं का नेटवर्क होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग को प्रकोप की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी।

3. जागरूकता की कमी, टीकाकरण में चूक
मिजल्स-रूबेला से बचाव के लिए बच्चों को 9 महीने और 2 साल की उम्र में टीके लगाए जाते हैं। लेकिन पड़ताल में कई ऐसे गांव सामने आए, जहां बच्चों का टीकाकरण नहीं हुआ था। कई क्षेत्रों में ANM की तैनाती भी नहीं है। इसके अलावा परिवारों का पलायन, जागरूकता की कमी और टीकाकरण को लेकर हिचकिचाहट भी वैक्सीनेशन कवरेज कम रहने की वजह रही।
4. कुपोषण से प्रतिरोधक क्षमता कम हुई
इस क्षेत्र के कई बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे थे। कुपोषित बच्चों को मिलने वाला सरकारी पोषण आहार भी कई महीनों से नहीं मिला था। कुपोषण के कारण बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हुई, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ा।

5. बिरसा ब्लॉक को नहीं मिली जनमन एम्बुलेंस
PVTG यानी विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह के लिए प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत मोबाइल एम्बुलेंस की व्यवस्था है। इसमें एमबीबीएस डॉक्टर समेत स्वास्थ्यकर्मी तैनात होते हैं। बालाघाट में ऐसी 4 एम्बुलेंस हैं, लेकिन बैगा आबादी वाले बिरसा ब्लॉक को इनमें से एक भी नहीं मिली।

किस स्तर पर क्या चूक हुई?
तत्कालीन कलेक्टर: हेल्थ कैंप की मॉनिटरिंग पर सवाल
जनवरी 2026 में मीडिया के जरिए तत्कालीन कलेक्टर मृणाल मीणा को बच्चों में त्वचा संबंधी बीमारी की जानकारी मिली थी। जनवरी-फरवरी में हेल्थ कैंप लगाए गए, लेकिन फरवरी के बाद कैंप बंद हो गए। सवाल यह है कि कैंप के बाद बीमारी की निगरानी क्यों जारी नहीं रही? यदि उसी समय मिजल्स के प्रकोप की पहचान हो जाती, तो समय पर उपचार की संभावना बन सकती थी।
सीएमएचओ, जिला टीकाकरण अधिकारी: वैक्सीनेशन पर ध्यान नहीं
विशेष संरक्षित जनजाति क्षेत्र होने के बावजूद टीकाकरण की जमीनी स्थिति पर सवाल हैं। सीएमएचओ परेश उपलव के मुताबिक, क्षेत्र में 80% टीकाकरण हुआ जबकि पड़ताल में दर्जनों ऐसे परिवार मिले, जिनके बच्चों को एक भी टीका नहीं लगा था। सरकार के टीकाकरण अभियान के बावजूद कई बच्चों तक मिजल्स-रूबेला का टीका क्यों नहीं पहुंचा, इस पर सीएमएचओ से स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका।
बीएमओ: बीमारी की जानकारी ही नहीं मिली
रिपोर्ट के मुताबिक, त्रासदी से पहले बीएमओ निमिष गौतम ने इन सुदूर क्षेत्रों का दौरा नहीं किया था। उन्हें क्षेत्र में बीमारी की जानकारी सरपंच के एसडीएम को फोन करने के बाद मिली।
जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी: आंकड़ों पर नजर नहीं रखी
बैगा परिवारों को पोषण आहार नहीं मिलने और बच्चों की मौत के आंकड़ों की निगरानी को लेकर विभाग की भूमिका पर सवाल उठते हैं। स्थानीय आशा और ANM कार्यकर्ताओं के जन्म-मृत्यु रजिस्टर में बच्चों की मौत दर्ज थी, लेकिन इस डेटा पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, यह भी जांच का विषय है।

जब स्थिति ज्यादा खराब हुई तो बच्चों और महिलाओं को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
प्रशासन बोला- इलाका चुनौतीपूर्ण है, बीमारी पर नियंत्रण किया
बालाघाट के वर्तमान कलेक्टर कुमार सत्यम ने कहा कि यह स्वास्थ्य के लिहाज से चुनौतीपूर्ण इलाका है। यह मलेरिया प्रभावित क्षेत्र है, जहां हर साल सितंबर, अक्टूबर और नवंबर में मेडिकल कैंप लगाए जाते हैं। इस साल भी इसकी तैयारी थी। नई बीमारी की जानकारी मिलते ही स्वास्थ्य टीम को सक्रिय किया गया और स्थिति को नियंत्रित किया गया।
उन्होंने ब्लॉक में बच्चों के कुपोषित होने की बात भी स्वीकार की और कहा- कुपोषण से निपटने के लिए मध्यम और दीर्घकालीन योजना बनाई जा रही है। स्वास्थ्य टीमें घर-घर जाकर कुपोषित बच्चों की पहचान और उपचार कर रही हैं। जिन तीन गांवों में बच्चों की मौत हुई, वहां स्थिति नियंत्रण में है।
पीने के पानी के स्रोतों की पहचान कर क्लोरीनेशन किया जा रहा है और मच्छरों की रोकथाम के लिए फॉगिंग कराई जा रही है।

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बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में रहस्यमयी बीमारी के चलते 26 जून से अब तक 8 बच्चों की जान चली गई है। जबलपुर मेडिकल कॉलेज और बालाघाट के डॉक्टरों की टीम ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया। टीम के मुताबिक, बीमार बच्चों में न्युमोनिया, एनीमिया यानी खून की कमी, डिहाइड्रेशन, बुखार, खुजली, मलेरिया और किडनी पर असर जैसे लक्षण मिले हैं। पढे़ं पूरी खबर…
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