इंदौर में कई ऐसी ऐतिहासिक और दुर्लभ पांडुलिपियां सुरक्षित रखी गई हैं, जो शहर की समृद्ध संस्कृति और इतिहास की जानकारी देती हैं। इन पांडुलिपियों में धार…और पढ़ें

HighLights
- इंदौर में कई ऐतिहासिक और दुर्लभ पांडुलिपियां सुरक्षित रखी गई हैं
- ये शहर की समृद्ध संस्कृति और इतिहास की जानकारी देती हैं
- इनमें से कई पांडुलिपियां सैकड़ों वर्ष पुरानी हैं
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : इंदौर में कई ऐसी ऐतिहासिक और दुर्लभ पांडुलिपियां सुरक्षित रखी गई हैं, जो शहर की समृद्ध संस्कृति और इतिहास की जानकारी देती हैं। इन पांडुलिपियों में धार्मिक, साहित्यिक, चिकित्सा और वास्तु से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां लिखी हुई हैं। इनमें से कई पांडुलिपियां सैकड़ों वर्ष पुरानी हैं।
समय बीतने के साथ कागज, स्याही और ताड़पत्र जैसी सामग्री के खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए इन पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। राजवाड़ा स्थित संग्रहालय में भी इन दिनों दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए संरक्षण की नई तकनीकों पर प्रयोग किए जा रहे हैं। हालांकि, इंदौर में केवल राजवाड़ा ही ऐसा स्थान नहीं है, जहां पुरानी पांडुलिपियां मौजूद हैं। शहर के कई मंदिरों, संस्थानों और निजी संग्रहों में भी ऐसी धरोहरें सुरक्षित हैं।
कुंद-कुंद ज्ञानपीठ में 1200 पांडुलिपियां
छप्पन दुकान स्थित कुंद-कुंद ज्ञानपीठ में करीब 1200 पांडुलिपियां सुरक्षित रखी गई हैं। कुंद-कुंद ज्ञानपीठ के पूर्व मानद सचिव डा. अनुपम जैन के अनुसार, इन पांडुलिपियों को उत्तरकाशी, सतना, इंदौर और दूसरे क्षेत्रों से एकत्र किया गया है। कुछ पांडुलिपियां ऐसे लोगों ने भी ज्ञानपीठ को दी हैं, जिनके पुश्तैनी मकान पुराने थे। मकान तोड़कर नया निर्माण कराने के दौरान उन्हें वहां रखी पुरानी पांडुलिपियां मिलीं। लोगों ने इन्हें सुरक्षित रखने के लिए ज्ञानपीठ को सौंप दिया। खास बात यह है कि इनमें से किसी भी पांडुलिपि को खरीदा नहीं गया है। इनमें जैन धर्म के अलावा रेवा महात्म, ग्रहसूत्र, वास्तु और क्षेत्र-समाज से संबंधित विषयों की पांडुलिपियां शामिल हैं। ये पांडुलिपियां पुराने समय की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था को समझने में भी मदद करती हैं।
लश्करी मंदिर में जैन धर्म की पांडुलिपियां
गोराकुंड स्थित श्री दिगंबर जैन लश्करी मंदिर में भी प्राचीन पांडुलिपियों का महत्वपूर्ण संग्रह है। मंदिर करीब 250 वर्ष पुराना बताया जाता है। यहां जैन धर्म से संबंधित करीब 70 पांडुलिपियां सुरक्षित रखी गई हैं। श्री दिगंबर जैन लश्करी मंदिर गोठ ट्रस्ट के महामंत्री वीरेंद्र बड़जात्या के अनुसार, मंदिर में रखी पांडुलिपियों में भक्तामर की हस्तलिखित पांडुलिपि भी शामिल है। यह पांडुलिपि ताड़पत्र पर लिखी गई है। इसके अलावा जैन धर्म से जुड़ी कई अन्य पुरानी पांडुलिपियां भी यहां सुरक्षित हैं।
400 साल पुरानी पांडुलिपि
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर पीएन मिश्रा के पास भी कई महत्वपूर्ण पांडुलिपियां हैं। उनके पास पहले करीब 63 पांडुलिपियां थीं, जिन्हें उन्होंने कुंद-कुंद ज्ञानपीठ को दे दिया। वर्तमान में उनके पास तीन पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। इनमें सबसे पुरानी पांडुलिपि दुर्गासप्तशती है, जो करीब 400 साल पुरानी है। यह बांग्ला भाषा में लिखी गई है। इसके अलावा राजा विक्रमादित्य के मंत्री और वैद्य वीर सिंह द्वारा लिखी गई वैद्यक से संबंधित पांडुलिपि भी उनके पास है। एक अन्य पांडुलिपि वास्तुशास्त्र से संबंधित है।
इंदौर में इन स्थानों पर भी सुरक्षित हैं पांडुलिपियां
- श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम
- कुंद-कुंद ज्ञानपीठ
- श्री अनंतनाथ जिनालय, दिगंबर जैन सरस्वती भवन
- सरस्वती भवन, दिगंबर जैन मारवाड़ी मंदिर
- श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर
- मालवीय भारती मंदिर, राजवाड़ा
- शासकीय संस्कृत महाविद्यालय, रामबाग
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