नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। लोकमाता देवी अहिल्याबाई की 231वीं पुण्यतिथि पर गुरुवार को इंदौर की सड़कों पर श्रद्धा, संस्कृति और शौर्य का भव्य रंग दिखाई दिया। गांधी हॉल से निकली पालकी यात्रा में शंखनाद गूंजा तो अखाड़ों के करतबों ने उत्साह बढ़ाया, गटका और शस्त्र प्रदर्शन ने शौर्य का परिचय दिया और लोकनृत्य-भजनों ने वातावरण को भक्तिमय कर दिया।

गांधी हॉल पहुंची पालकी। (नईदुनिया)
राजसी वेशभूषा में घोड़ों पर सवार 13 होलकर राजाओं के प्रतिरूप और बग्गी में सवार अहिल्याबाई की प्रतिरूप बालिका ने होलकरकालीन वैभव को जीवंत कर दिया। 111 वर्षों से पुण्यतिथि समारोह आयोजित कर रही देवी अहिल्या उत्सव समिति की पालकी यात्रा में 30 से अधिक समाजों की सहभागिता रही। मार्ग में 29 मंचों से हुए स्वागत और अलग-अलग समाजों की प्रस्तुतियों ने गांधी हाल से गोपाल मंदिर तक के पूरे मार्ग को लोकमाता की स्मृति के उत्सव में बदल दिया।

पालकी उठाते जनप्रतिनिधि। (नईदुनिया)
समिति की अध्यक्ष एवं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के निर्देशन और सांसद शंकर लालवानी के संयोजन में निकली यात्रा में वेदमूर्ति धनंजय शास्त्री, मंत्री प्रह्लाद पटेल, मंत्री तुलसी सिलावट, सुमित्रा महाजन और सांसद लालवानी ने पूजन के बाद माता की प्रतिमा को पालकी में विराजित किया। पुलिस बैंड ने सलामी दी और इसके बाद पालकी यात्रा राजसी ठाठ के साथ आगे बढ़ी।

देवी अहिल्या को नमन करते मंत्री सिलावट। (नईदुनिया)
100 से ज्यादा महिलाओं का शंखनाद
पालकी की अगवानी में 100 से अधिक बंगाली महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में शंखनाद किया। सिख समाज की गटका पार्टी ने युद्धकला के प्रदर्शन से आकर्षित किया, वहीं बोहरा समाज के 75 सदस्यीय बैंड ने राष्ट्रीय गीतों की धुनें बिखेरीं। बंजारा समाज के 100 से अधिक कलाकारों ने लोकनृत्य प्रस्तुत किया। मराठी समाज की 20 भजन मंडलियों ने पारंपरिक पाऊल भजनों की प्रस्तुति दी।
13 घोड़ों पर दिखा होलकर वैभव
होलकर राजवंश के 13 शासकों के प्रतीक रूप में 13 युवतियां राजसी वेशभूषा में घोड़ों पर सवार होकर शामिल हुईं। एक युवती मां अहिल्या के रूप में बग्गी में सवार थी। झंडासिंह और मल्हारी मार्तंड व्यायामशाला के अखाड़ों ने करतब दिखाए। दुर्गा वाहिनी की युवतियों ने शस्त्र प्रदर्शन किया। विद्याधाम और आर्य समाज के 60 बटुकों ने मंत्रोच्चार किया।
मराठी, वाल्मीकि, सिंधी, सिख, बंगाली और बंजारा समाज सहित विभिन्न संगठनों ने झांकियों के माध्यम से लोकमाता को श्रद्धांजलि दी। पहली बार मां अहिल्या भक्ति संगीत संगठन के 100 सदस्य भी भजनों के साथ यात्रा में शामिल हुए।
कहार समाज की सातवीं पीढ़ी ने उठाई पालकी
माता की पालकी को 111 वर्षों से कहार समाज उठाता आ रहा है। इस वर्ष समाज की सातवीं पीढ़ी ने यह परंपरा निभाई। पालकी यात्रा के दौरान 29 मंचों से स्वागत किया गया। यात्रा इतनी विस्तृत रही कि गांधी हाल से निकलते समय उसका पहला सिरा कोठारी मार्केट तक पहुंच चुका था।
गोपाल मंदिर में आरती के साथ समापन
रात्रि में पालकी यात्रा गोपाल मंदिर पहुंची, जहां स्वागत के बाद पूजन और आरती हुई। प्रसाद वितरण के साथ आयोजन का समापन हुआ। राजवाड़ा स्थित अहिल्या उद्यान में देवी अहिल्या की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। गोपाल मंदिर और इंद्रेश्वर मंदिर में भी पूजन, रुद्राभिषेक सहित धार्मिक आयोजन हुए।
ये रहा विशेष
- 30 से अधिक समाज आयोजन से जुड़े
- 450 से अधिक भक्त समिति से जुड़े
- 29 मंचों से पालकी का स्वागत
- 13 युवतियां होलकर राजाओं के प्रतिरूप में घोड़ों पर
- 100 से अधिक बंगाली महिलाएं शंखनाद में शामिल
- 100 बंजारा कलाकार लोकनृत्य में शामिल
- 60 बटुक मंत्रोच्चार करते हुए यात्रा में शामिल
- 75 सदस्य बोहरा समाज के बैंड में
- 20 भजन मंडलियां मराठी समाज की शामिल
यात्रा के प्रमुख रंग
- श्रद्धा: पूजन, माल्यार्पण, रुद्राभिषेक और आरती
- शौर्य: अखाड़े, गटका और शस्त्र प्रदर्शन
- संस्कृति: लोकनृत्य, झांकियां और पारंपरिक वेशभूषा
- संगीत: भजन मंडलियां, पुलिस और बोहरा समाज का बैंड
- परंपरा: कहार समाज की 111 वर्ष पुरानी पालकी सेवा
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