सुप्रीम कोर्ट:निजी विश्वविद्यालयों की वित्तीय रिपोर्ट तलब; गिरफ्तारी का आधार नहीं बताने पर कार्रवाई अवैध – Supreme Court Update Reason Of Arrest Must For Accused Pvt Universities Financial Report Cji Other Judges News

सुप्रीम कोर्ट:निजी विश्वविद्यालयों की वित्तीय रिपोर्ट तलब; गिरफ्तारी का आधार नहीं बताने पर कार्रवाई अवैध – Supreme Court Update Reason Of Arrest Must For Accused Pvt Universities Financial Report Cji Other Judges News

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजी विश्वविद्यालयों को मुनाफा कमाने वाली संस्थाओं के रूप में चलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। शीर्ष अदालत ने देशभर के निजी विश्वविद्यालयों से पांच वर्षों के ऑडिट किए गए वित्तीय रिकॉर्ड, फीस संरचना, फंड के इस्तेमाल, अतिरिक्त धन के निवेश और शिक्षा से सीधे जुड़े नहीं लोगों को किए गए भुगतान समेत विस्तृत जानकारी मांगी है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह व जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 17 सितंबर के आदेश में कहा, निजी विश्वविद्यालयों के पास संस्थान के सुचारू संचालन और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए उचित वित्तीय गुंजाइश हो सकती है। लेकिन उनके संसाधनों का इस्तेमाल शिक्षा के इतर किसी अन्य उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सकता। यह मामला नोएडा स्थित एमिटी विश्वविद्यालय से जुड़ी एक छात्र की शिकायत से शुरू हुआ था। लेकिन बाद में पीठ ने कहा, व्यापक जनहित में पूरे भारत में प्राइवेट यूनिवर्सिटी की स्थापना, उनके नियमन और उनसे मिलने वाले फायदों की जांच करना जरूरी है। पीठ ने केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश की तारीख, यानी 17 सितंबर, 2026 से छह हफ्ते के अंदर संबंधित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से जानकारी लेकर अपने मुख्य सचिवों के जरिये हलफनामा दाखिल करने को कहा। इसकी अग्रिम प्रति स्कूल मॉनिटरिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ. आरएम शर्मा को देनी होगी।


ये विवरण भी तलब


  1. सुप्रीम कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों से फीस वसूली, दाखिले की प्रक्रिया, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति एवं वेतन, कक्षाओं के आवंटन, शिकायत निवारण व्यवस्था और पिछले तीन वर्षों में मिली शिकायतों के निपटारे का विवरण भी मांगा है। यह भी बताना होगा कि केंद्र या राज्य सरकारों से जमीन आवंटन, कानूनों में छूट या अन्य विशेष सुविधाओं के रूप में उन्हें क्या लाभ मिले।

  2. विश्वविद्यालय के प्रत्येक पाठ्यक्रम में छात्रों के दाखिले की पूरी प्रक्रिया और दाखिले की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों का विवरण। प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा कराने और उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन की जिम्मेदारी किन लोगों की है, इसकी जानकारी। इन मामलों में विश्वविद्यालय प्रबंधन की भूमिका भी बतानी होगी।

  3. दाखिले के समय और पाठ्यक्रम के दौरान छात्रों से ली जाने वाली पूरी फीस का विवरण। विकास शुल्क, विशेष कार्यक्रमों के लिए शुल्क या किसी अन्य नाम से होने वाली वसूली की जानकारी भी देनी होगी। फीस आदि से प्राप्त अतिरिक्त धन का इस्तेमाल किस तरह किया गया और उसका कहां-कहां निवेश किया गया, इसका विस्तृत ब्योरा देना होगा।

  4. शिक्षक एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति में भर्ती की प्रक्रिया, वेतन, अन्य पारिश्रमिक और भुगतान के तरीके की जानकारी देनी होगी। इनके लिए सेवा शर्तें अधिसूचित हैं या नहीं, और यदि हैं तो उनका पूरा विवरण देना होगा।

  5. शिक्षकों को कक्षाएं आवंटित करने वाले सक्षम प्राधिकारी का विवरण, प्रत्येक शिक्षक को आवंटित कक्षाओं की संख्या और वास्तव में उनकी ओर से ली गई कक्षाओं का ब्योरा देना होगा। यदि किसी शिक्षक ने आवंटित कक्षाएं नहीं लीं तो छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए की गई वैकल्पिक व्यवस्था की जानकारी भी देनी होगी। कक्षाओं के आवंटन से संबंधित जानकारी जनवरी 2025 से देनी होगी।

  6. शिकायत निवारण समितियों की संरचना, उनके अधिकार क्षेत्र और पिछले तीन वर्षों में मिली शिकायतों की संख्या, शिकायतों का विवरण, उनके नतीजे और निपटारे में लगा समय बताना होगा।

  7. जिन कॉलेजों से अस्पताल जुड़े हैं, उन अस्पतालों का विवरण और कॉलेज तथा अस्पताल के बीच संबंध की जानकारी देनी होगी।

  8. मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग, कानून, फार्मेसी और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों से जुड़े संस्थानों के मामले में संबद्ध या मान्यता देने वाले निकायों से पिछले पांच वर्षों में किए गए निरीक्षण और मान्यता के आधार की जानकारी भी मांगी गई है। संबंधित निकायों को संकाय और सहायक कर्मचारियों के साथ डॉक्टरों के पदों का विवरण भी देना होगा।

गिरफ्तारी का आधार नहीं बताया तो कार्रवाई गैर-कानूनी : शीर्ष अदालत


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि अगर किसी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार के बारे में नहीं बताया जाता है तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन होगा और गिरफ्तारी गैर-कानूनी मानी जाएगी।

आरोपी की समझ में आने वाली भाषा में कारण बताना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) के प्रावधानों को सीमित तरीके से नहीं पढ़ा जा सकता, वरना व्यक्तिगत आजादी की सुरक्षा का जो मकसद है वह पूरा नहीं हो पाएगा। बल्कि यह सीमित और बेकार हो जाएगा। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि आरोपी को अपनी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में लिखित रूप में जानने का मौलिक और कानूनी अधिकार है। गिरफ्तारी के ऐसे लिखित कारणों की एक कॉपी गिरफ्तार व्यक्ति को बिना किसी अपवाद के जल्द से जल्द दी जानी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण न बताए जाने या 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखे जाने की वजह से कोर्ट ने किसी मामले में रिहा किया था तो उसे दोबारा गिरफ्तार करने के लिए जांच एजेंसी को मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा। किसी भी नियम के उल्लंघन या पालन न करने पर गिरफ्तार व्यक्ति को तुरंत रिहा करना होगा, क्योंकि ऐसी गिरफ्तारी असांविधानिक है। अगर अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन होता है तो व्यक्ति मुआवजे के लिए हाईकोर्ट जा सकता है।

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