ईरान ने कुवैत को इस तरह से टारगेट क्यों किया, जानिए क्या होगा इसका असर

ईरान ने कुवैत को इस तरह से टारगेट क्यों किया, जानिए क्या होगा इसका असर

8 मार्च को ईरान ने ड्रोन से कुवैत की हाई राइज बिल्डिंग पर हमला किया

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इमेज कैप्शन, 8 मार्च को ईरान ने ड्रोन से कुवैत की हाई राइज बिल्डिंग पर हमला किया

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कुवैत गल्फ़ में प्रतिद्वंद्विता की लड़ाई में ख़ुद को बहुत सतर्क रखने की कोशिश करता रहा है.

सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव के दौरान भी कुवैत ने सामान्यतः जीसीसी देशों का साथ दिया है, लेकिन साथ ही वह क्षेत्रीय अस्थिरता को देखते हुए सावधानी से क़दम बढ़ाता रहा है.

कुवैत ने जीसीसी (गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल) के अन्य पाँच सदस्य देशों के साथ मिलकर हिज़्बुल्लाह को आधिकारिक रूप से एक आतंकवादी संगठन घोषित किया था.

जीसीसी में कुवैत के अलावा बहरीन, ओमान, क़तर, सऊदी अरब और यूएई हैं.

कुवैत की एक लाइन स्पष्ट थी कि वह जीसीसी के साथ खड़ा है, भले ईरान से प्रतिद्वंद्विता की लड़ाई में खुलकर सामने नहीं आता था.

जीसीसी के सदस्य देशों के बीच सामूहिक रक्षा व्यवस्था का विचार दशकों से मौजूद है, लेकिन उनकी सेनाओं का वास्तविक एकीकरण अब भी सीमित है.

2017 से 2021 के बीच क़तर पर लगाए गए प्रतिबंधों ने दिखा दिया था कि खाड़ी एकता की अवधारणा कभी भी नाज़ुक हो सकती है.

2025-26 के युद्धों ने सामूहिक रक्षा की बहस को फिर से जीवित कर दिया है. जीसीसी के अहम देश सऊदी अरब पाकिस्तान से डिफेंस पैक्ट कर चुका है. इसमें तुर्की के शामिल होने की भी बात चल रही है.

ऐसे में कुवैत के लिए भी बड़ी चुनौती है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किस पर ज़्यादा भरोसा करे.

अमेरिका और इसराइल ने जब 28 फ़रवरी को ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान शुरू किया, तो तेहरान ने जवाबी कार्रवाई में कई देशों पर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए. इनमें जीसीसी के सदस्य देशों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया.

खाड़ी देशों में यूएई के बाद कुवैत ईरानी हमलों से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल रहा.

ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों के अलावा कई नागरिक प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया, जिनमें कुवैत का मुख्य हवाई अड्डा, ऊर्जा ठिकाने और एक डिसैलिनेशन संयंत्र शामिल थे.

पिछले एक दशक से कुवैत और ईरान के संबंध स्थिर रहे थे. ऐसे में कुवैत के ख़िलाफ़ ईरान की आक्रामकता को लेकर काफ़ी बहस हो रही है.

फिर सवाल उठता है कि ईरान ने कुवैत को इतनी अधिक तीव्रता से निशाना क्यों बनाया?

ईरान के कुवैत को निशाना बनाने की दो वजह

ईरान ने कुवैत के एयरपोर्ट पर भी हमले किए थे

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विश्लेषकों के अनुसार इसका मुख्य कारण दो बातें थीं- भौगोलिक स्थिति और अमेरिकी सैन्य अड्डे.

कुवैत में लगभग 13 हज़ार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. फारस की खाड़ी के रणनीतिक क्षेत्र के निकट स्थित ये सैन्य अड्डे ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी अमेरिकी हवाई, समुद्री या ज़मीनी अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे.

इसी वजह से युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने कुवैत पर दबाव बनाने की कोशिश की ताकि वह अपने यहां से अमेरिकी सेना को हटाए या कम से कम अमेरिका की सैन्य पहुँच, हवाई क्षेत्र के उपयोग और सैन्य सुविधाओं के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए.

जीसीसी के अन्य सदस्य देशों की तरह कुवैत ने भी यह दावा ख़ारिज किया है कि 28 फ़रवरी को ईरान के ख़िलाफ़ शुरू किए गए अमेरिकी अभियान “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के लिए उसकी ज़मीन या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल किया गया था.

लेकिन फ़्रांस24 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई सप्ताह तक ईरानी हमलों का सामना करने के बाद कुवैत ने 24 और 31 मार्च को अमेरिकी सेना को अपनी सैन्य सुविधाओं का उपयोग मिसाइल हमलों के लिए करने की अनुमति दी.

विश्लेषकों का मानना है कि अगर युद्ध दोबारा शुरू होता है, तो यह फ़ैसला कुवैत को ईरान के लिए और बड़ा लक्ष्य बनाने की वजह बना सकता है.

टेम्पल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफ़ेसर सीन योम ने रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट से कहा, “ईरान ने शुरुआत से ही कुवैत को एक लक्ष्य माना था क्योंकि वहाँ अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और वे युद्ध प्रयासों का हिस्सा हैं, भले ही उन ठिकानों का सीधे ईरान पर हमला करने के लिए उपयोग न किया गया हो.”

ईरान ने हालिया हमलों में कुवैत के तेल ठिकानों को निशाना बनाया है

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सीम योम ने कहा, “ईरानी सैन्य योजनाकारों के लिए मिसाइल हमलों ने इस तर्क को और मज़बूत किया कि कुवैत और व्यापक रूप से पूरा खाड़ी तटीय क्षेत्र एक सक्रिय युद्ध मोर्चा बन चुका है. ईरान की नज़र में इन अमेरिकी सहयोगी देशों से किसी भी समय उसके ख़िलाफ़ हवाई हमला शुरू किया जा सकता है, इसलिए वे जवाबी ड्रोन और मिसाइल हमलों के वैध लक्ष्य हैं.”

“ईरान केवल वास्तविक हमलों को नहीं देख रहा था, बल्कि उन संभावित सैन्य मंचों को भी निशाना बनाने की रणनीति अपना रहा था, जिनका इस्तेमाल भविष्य में उसके ख़िलाफ़ किया जा सकता था.”

कुवैत में सुन्नी बनाम शिया वाली स्थिति नहीं रही है.

मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन माना जाता है कि कुवैत की कुल आबादी में शियाओं की हिस्सेदारी लगभग 25 से 30 प्रतिशत है.

मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट ने लिखा है, “आधुनिक कुवैत के इतिहास के बड़े हिस्से में सुन्नी-शिया संबंध कोई बड़ा विवादास्पद मुद्दा नहीं रहे. हालांकि 1979 की ईरानी क्रांति के बाद कुछ समय के लिए सांप्रदायिक तनाव देखने को मिला था.”

“उस दौर में कुछ सुन्नी समुदाय के लोगों को आशंका थी कि क्रांतिकारी ईरान कुवैत के शियाओं का इस्तेमाल देश की स्वतंत्रता और स्थिरता को प्रभावित करने के लिए कर सकता है.”

“लेकिन 1990 में इराक़ के कुवैत पर हमले ने देश की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बदल दिया. दिलचस्प बात यह है कि इस संकट ने सुन्नी और शिया समुदायों के बीच विश्वास और एकता को और मज़बूत किया. आज कुवैत की राजनीति और अर्थव्यवस्था में शिया समुदाय पूरी तरह से एकीकृत माना जाता है.”

कुवैत

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इमेज कैप्शन, दो मार्च के ईरान ने कुवैत में अमेरिकी दूतावास के इलाक़े में ड्रोन से हमला किया था

सैन्य अड्डे काम नहीं आए?

खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को उनकी सुरक्षा से जोड़ा जाता था लेकिन ईरान ने इसे भी भेद दिया है.

मध्य-पूर्व की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखने वाली न्यूज़ विश्लेषण वेबसाइट अमवाज मीडिया ने लिखा है, ”क़रीब तीन दशकों से जीसीसी के सदस्य देश अमेरिकी सैन्य ठिकानों और डिफेंस स्ट्रक्चर के विस्तार पर भारी निवेश करते रहे हैं.”

”इन सैन्य अड्डों को लंबे समय तक अमेरिका और खाड़ी देशों की सुरक्षा साझेदारी के सबसे ठोस प्रतीक के रूप में देखा गया. इसके पीछे तर्क सरल था. अगर खाड़ी के देश अपने यहाँ बड़े अमेरिकी सैन्य अड्डों की मेज़बानी करेंगे, तो अमेरिका उनकी सुरक्षा के प्रति स्थायी रूप से प्रतिबद्ध रहेगा.”

अमवाज मीडिया ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ”यह माना जाता था कि अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी ईरान जैसे संभावित ख़तरों को रोकने का काम करेगी और 2003 से पहले इराक़ से आने वाले जोखिमों के ख़िलाफ़ भी सुरक्षा प्रदान करेगी.”

”लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल साबित हुई. पिछले एक दशक के दौरान, विशेषकर 2017-21 में क़तर की नाकेबंदी, 2019 में खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका-ईरान तनाव और बाद में ग़ज़ा के साथ ईरान से जुड़े युद्धों के दौरान, जीसीसी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे वह सुरक्षा नहीं दे पाए, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती थी.”

अमवाज मीडिया ने लिखा है, ”वे न तो हमलों को रोक सके और न ही उन्होंने हर स्थिति में तत्काल अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की गारंटी दी. दूसरे शब्दों में, जिन सैन्य अड्डों का मक़सद मेज़बान देशों की रक्षा करना था, कई बार ऐसा लगा कि उन्हें ख़ुद सुरक्षा की ज़रूरत पड़ रही है. इसी कारण ईरान-इसराइल-अमेरिका युद्ध के बाद खाड़ी के देशों में इस मॉडल की उपयोगिता पर गंभीर चर्चा होने की संभावना है.

अब बहस केवल इस बात पर नहीं है कि अमेरिकी सैन्य अड्डे सुरक्षा में योगदान देते हैं या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या इन अड्डों से मिलने वाले संभावित लाभ उन जोखिमों से अधिक हैं, जो उनकी मौजूदगी के कारण पैदा होते हैं.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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