मां का दूसरा दिमाग बन रहा AI:बच्चे पढ़ाने में मददगार; डिजिटल एजेंट से हो रही सुविधा, डेटा की सुरक्षा पर भी सवाल

मां का दूसरा दिमाग बन रहा AI:बच्चे पढ़ाने में मददगार; डिजिटल एजेंट से हो रही सुविधा, डेटा की सुरक्षा पर भी सवाल



मां का दूसरा दिमाग बन रहा AI:बच्चे पढ़ाने में मददगार; डिजिटल एजेंट से हो रही सुविधा, डेटा की सुरक्षा पर भी सवाल


बच्चे की लाइब्रेरी की किताब कब लौटानी है, फुटबॉल मैच के लिए कब पहुंचना है, स्कूल के कार्यक्रम में क्या लेकर जाना है या बेटी के बैंड प्रदर्शन के लिए काले मोजे खरीदने हैं… आधुनिक अमेरिकी परिवारों में ऐसे छोटे-छोटे कामों की सूची इतनी लंबी हो गई है कि इन्हें याद रखना भी एक बड़ी जिम्मेदारी बन गया है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के एप इस मानसिक बोझ को कम करने के लिए मां-बाप के दूसरे दिमाग की तरह काम कर रहे हैं। अमेरिका में माता-पिता ओली, फैम्बॉट और ओहाई जैसे एआई एप की मदद ले रहे हैं। ये डिजिटल एजेंट ईमेल, कैलेंडर और स्कूल की सूचनाओं को जोड़कर जरूरी कामों की सूची बनाते हैं, समय पर रिमाइंडर भेजते हैं और बताते हैं कि किस सदस्य को कौन-सा काम करना है। कंसास सिटी की बाल रोग विशेषज्ञ लीसा ग्रीन ने अपने पांच वर्षीय बेटे फिट्ज की स्कूल लाइब्रेरी का शेड्यूल एप पर अपलोड किया। अब एप उन्हें किताब लौटाने की तारीख याद दिलाता है। वहीं, न्यू जर्सी के जोश सोबिन ने फैम्बॉट बनाया, जो परिवार के ईमेल से जरूरी काम निकालकर साझा सूची तैयार करता है। इससे पति-पत्नी के बीच यह बहस कम हो सकती है कि बच्चे का काम किसे पूरा करना था। टेक्सास की तारा युकावा चैटजीपीटी और क्लाउड का इस्तेमाल बच्चों को पढ़ाने में करती हैं। वह स्पेलिंग के शब्दों की सूची अपलोड कराती हैं और एआई से उन्हें बोलकर सुनाने को कहती हैं, ताकि बच्चा खुद अभ्यास कर सके। निजता पर खतरा: राहत के साथ जिम्मेदारी भी विशेषज्ञों ने चेताया है कि बच्चों की उम्र, एलर्जी, दिनचर्या और स्कूल की जानकारी एप पर डालने से निजता का खतरा बढ़ सकता है। गलत सूचना या तकनीकी चूक से जरूरी काम छूट भी सकता है। सवाल यह है कि क्या तकनीक मां का बोझ सचमुच घटाएगी या उसके काम करने की अपेक्षाएं और बढ़ा देगी?



Source link

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *