
बताया जा रहा है कि, पीड़ित शख्स बीत करीब ढाई साल पहले एक सड़क हादसे का शिकार होने के बाद से इस समस्या से खासा परेशान था। उसकी मूत्रनली पूरी तरह नष्ट हो गई थी। इसके बाद वो विभिन्न अस्पतालों में उपचार के लिए भटका। कई प्रकार की प्रक्रियाएं की गईं, लेकिन कहीं भी सफलता नहीं मिली। स्थिति इतनी गंभीर थी कि उसे लंबे समय तक सुप्राप्यूबिक कैथेटर (एसपीसी) के सहारे रहना पड़ रहा था। युवक एमवायएच पहुंचा, जहां यूरोलॉजी विभाग की टीम ने विस्तृत जांच और मूल्यांकन किया। जांच में पाया गया कि पारंपरिक तकनीकों से उपचार संभव नहीं है और मूत्रनली का पुनर्निर्माण ही एकमात्र विकल्प है।
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