महिला ने परिवार न्यायालय में पति के विरुद्ध प्रकरण प्रस्तुत कर भरण पोषण दिलवाए जाने की गुहार लगाई थी, लेकिन वर्ष 2023 में परिवार न्यायालय ने महिला को …और पढ़ें

HighLights
- ऐसी महिला को भरण-पोषण से वंचित करना उसे दोबारा पीडित बनाने जैसा है।
- कोरोनाकाल में विधर्मी ने स्वयं को हिंदू बताकर मंदिर में महिला से विवाह किया था।
- गर्भावस्था के दौरान महिला को आधार कार्ड से व्यक्ति की वास्तविकता पता चली।
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और विवाह के बाद धर्म परिवर्तन को लेकर हिंसा के मामले में कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पीडिता और उसकी अवयस्क पुत्री को 20 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की कोर्ट ने कहा कि अगर किसी महिला से धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह किया गया है और इससे उसे संतान भी हुई है तो सिर्फ विवाह की वैधता के आधार पर महिला को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
एडवोकेट राजेश जोशी ने बताया कि 23 फरवरी 2020 को कोरोनाकाल में एक अन्य धर्म के व्यक्ति ने स्वयं को हिंदू बताकर मंदिर में एक महिला से विवाह किया था। गर्भावस्था के दौरान महिला को आधार कार्ड से व्यक्ति की वास्तविकता पता चली। इसके बाद पति उस महिला पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने लगा।
महिला ने जब ऐसा करने से इंकार किया तो उसके साथ मारपीट की जाने लगी। महिला ने इसकी शिकायत पुलिस में की थी।
महिला ने परिवार न्यायालय में पति के विरुद्ध प्रकरण प्रस्तुत कर भरण पोषण दिलवाए जाने की गुहार लगाई थी, लेकिन वर्ष 2023 में परिवार न्यायालय ने महिला को कानूनी रूप से विवाहित नहीं मानते हुए भरण-पोषण आवेदन निरस्त कर दिया, जबकि उसकी बेटी को दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दिलवाया।
परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए महिला ने हाई कोर्ट में अपील प्रस्तुत की। हाई कोर्ट ने इसका निराकरण करते हुए आदेश में टिप्पणी की कि धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और उससे संतान उत्पन्न होने की स्थिति में महिला को केवल तकनीकी आधार पर भरण -पोषण से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए पत्नी और पुत्री दोनों के लिए 10-10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण मंजूर किया।
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