इंदौर: बिना हेलमेट स्कूल-कॉलेजों में एंट्री बंद करें, सुप्रीम कोर्ट सड़क सुरक्षा समिति ने दिया प्रस्ताव

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सड़क सुरक्षा समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे की अध्यक्षता में इंदौर जिला सड़क सुरक्षा समिति की महत्वपूर्ण बैठक सिटी बस ऑफिस में आयोजित की गई। इस बैठक में इंदौर जिले में सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम, सड़क सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने तथा दुर्घटनाओं में होने वाली जनहानि को नियंत्रित करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की विस्तार से समीक्षा की गई। बैठक के दौरान संबंधित अधिकारियों ने जिले में सड़क सुरक्षा के लिए किए जा रहे विभिन्न कार्यों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें मुख्य रूप से दुर्घटना संभावित क्षेत्रों अर्थात ब्लैक स्पॉट का चिन्हांकन एवं सुधार, जन-जागरूकता अभियान, यातायात नियमों के उल्लंघन पर चालानी कार्रवाई, यातायात व्यवस्था में सुधार, सड़क इंजीनियरिंग से संबंधित सुधारात्मक कार्य तथा सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों पर अंकुश लगाने के उपायों की जानकारी दी गई। न्यायमूर्ति सप्रे ने सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए सभी विभागों के बीच बेहतर समन्वय के साथ प्रभावी और परिणाममूलक कार्रवाई सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया। इस अवसर पर नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल, ट्रैफिक डीसीपी राजेश त्रिपाठी, स्मार्ट सिटी के सीईओ अर्थ जैन, अपर कलेक्टर नवजीवन विजय पवार, रिंकेश वैश्य सहित सड़क सुरक्षा से जुड़े विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

जीरो फैटलिटी डिस्ट्रिक्ट के रूप में विकसित होगा इंदौर

बैठक को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे ने कहा कि सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली जनहानि को कम करना केवल किसी एक विभाग का नहीं बल्कि सभी संबंधित विभागों और पूरे समाज का संयुक्त दायित्व है। उन्होंने उल्लेख किया कि मध्य प्रदेश में पिछले कुछ समय में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में कमी दर्ज की गई है, जो संतोषजनक है लेकिन इसमें और सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि देश में पिछले पांच वर्षों के दुर्घटना आंकड़ों के आधार पर अधिक मृत्यु दर वाले जिलों की पहचान कर उन्हें जीरो फैटलिटी डिस्ट्रिक्ट के रूप में विकसित करने की पहल की गई है। मध्य प्रदेश में पहले धार, खरगोन, रीवा, सतना, सागर और जबलपुर को इस योजना में शामिल किया गया था। अब इंदौर, भोपाल और उज्जैन को भी इसमें शामिल कर कुल 9 जिलों को जीरो फैटलिटी डिस्ट्रिक्ट बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीरो फैटलिटी का उद्देश्य केवल कागजी घोषणा करना नहीं, बल्कि ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना है जहां सड़क दुर्घटना में किसी भी व्यक्ति की जान न जाए। इसके लिए पुलिस, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग, परिवहन विभाग और स्वास्थ्य विभाग को एक साथ मिलकर काम करना होगा।

सुरक्षित पैदल चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार

न्यायमूर्ति सप्रे ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों का संदर्भ देते हुए कहा कि सड़क पर सुरक्षित रूप से पैदल चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। यदि किसी सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ या सुरक्षित मार्ग उपलब्ध नहीं है और इस कारण दुर्घटना होती है, तो इसके लिए संबंधित निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों को सड़क की रूपरेखा तैयार करते समय पैदल यात्रियों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित फुटपाथ की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। उन्होंने सड़क किनारे मौजूद अवरोधों, अतिक्रमण और अनधिकृत रूप से खड़े रहने वाले लोगों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सड़क सुरक्षा केवल वाहन चालकों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि बेहतर सड़क डिजाइन, फुटपाथ निर्माण, अतिक्रमण हटाने और बाधाओं को दूर करने का दायित्व सरकारी विभागों का है।

बैठक के दौरान न्यायमूर्ति सप्रे ने अधिकारियों को सड़क सुरक्षा से संबंधित कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए:

1. हेलमेट नियम का कड़ाई से पालन: दोपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट की अनिवार्यता को सख्ती से लागू किया जाए और उल्लंघन करने वालों पर नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाए।

2. शैक्षणिक संस्थानों में विशेष अभियान: विद्यार्थियों में हेलमेट पहनने की आदत डालने के लिए सभी स्कूल और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

3. बिना हेलमेट परिसर में प्रवेश पर रोक: दोपहिया वाहन से आने वाले विद्यार्थियों के लिए हेलमेट अनिवार्य किया जाए तथा बिना हेलमेट आने वाले विद्यार्थियों के प्रवेश पर रोक लगाने के प्रस्ताव पर विचार किया जाए।

4. शिक्षक एवं स्टाफ के लिए भी अनिवार्यता: हेलमेट पहनने का नियम केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं बल्कि दोपहिया वाहन से आने वाले शिक्षकों, कर्मचारियों और अन्य स्टाफ पर भी समान रूप से लागू हो।

5. विशेष लाइसेंस शिविरों का आयोजन: स्कूल और कॉलेजों में पात्र विद्यार्थियों के ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए विशेष शिविर आयोजित किए जाएं ताकि उन्हें सुविधा मिल सके।

6. नियमित जागरूकता सत्र: सड़क सुरक्षा को नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बनाते हुए विद्यार्थियों के लिए समय-समय पर जागरूकता सत्र आयोजित किए जाएं।

7. पुलिस अधिकारियों का सीधा संवाद: पुलिस अधिकारी स्वयं स्कूल-कॉलेजों में जाकर विद्यार्थियों और अभिभावकों से संवाद करें और उन्हें दुर्घटनाओं के गंभीर परिणामों से अवगत कराएं।

8. प्रमाणित हेलमेट का उपयोग: विद्यार्थियों को केवल हेलमेट पहनने के लिए ही नहीं, बल्कि अच्छी गुणवत्ता वाले प्रमाणित हेलमेट का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जाए।

9. उत्कृष्ट कार्य करने वालों का प्रोत्साहन: सड़क सुरक्षा नियमों का बेहतर पालन कराने वाले संस्थानों एवं व्यक्तियों के प्रयासों का रिकॉर्ड रखा जाए और उन्हें समय-समय पर प्रोत्साहित किया जाए।

10. असमय मौतों को रोकना ही मुख्य लक्ष्य: सड़क सुरक्षा का मूल उद्देश्य दुर्घटनाओं में होने वाली असमय मौतों को रोकना है, जिसके लिए प्रशासन, पुलिस, शिक्षण संस्थानों, अभिभावकों और विद्यार्थियों को मिलकर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

 

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