मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर में न्याय के नए और आधुनिक मंदिर यानी जिला कोर्ट बिल्डिंग का निर्माण प्रशासनिक लेटलतीफी, आपसी समन्वय की कमी और ठेकेदारों की लापरवाही के भंवरजाल में फंसकर रह गया है। पीपल्याहाना तालाब के समीप आकार ले रही जिला कोर्ट की नई 9 मंजिला बिल्डिंग पिछले 8 साल से बन रही है, लेकिन इसका इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। इस कछुआ चाल का सबसे बड़ा नुकसान जनता के पैसे की बर्बादी के रूप में सामने आया है। समय पर काम पूरा न होने के कारण अब इस प्रोजेक्ट की लागत में 215 करोड़ रुपए से अधिक का भारी-भरकम इजाफा हो गया है। लेटलतीफी के कड़वे सच के बीच एक राहत भरी खबर भी आई है। पिछले काफी समय से फंड की कमी और ठेकेदार एजेंसी को पेमेंट न होने के कारण पूरा निर्माण कार्य लगभग ठप पड़ा हुआ था। इस गतिरोध को तोड़ने के लिए कुछ समय पहले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की कैबिनेट बैठक में 215.61 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि की संशोधित प्रशासनिक स्वीकृति दे दी गई है। बजट को हरी झंडी मिलने के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि इस रुके हुए काम में एक बार फिर रफ्तार आएगी।
10 वर्ष पुरानी डीपीआर और करीब 8 साल पहले हुई निर्माण की शुरुआत
अधिकारियों के अनुसार, इंदौर जिला न्यायालय की इस भव्य और सर्वसुविधायुक्त बिल्डिंग के निर्माण के लिए साल 2016 में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की गई थी। इसके करीब दो साल बाद, यानी 2018 में धरातल पर निर्माण कार्य शुरू हो सका। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक यह प्रोजेक्ट 411 करोड़ रुपए में पूरा होना था और इसका लक्ष्य भी तय समय सीमा के भीतर रखा गया था, लेकिन समय चक्र ऐसा घूमा कि बजट और समय दोनों का गणित पूरी तरह बिगड़ गया। अब संशोधित मंजूरी के बाद इस पूरे प्रोजेक्ट की कुल लागत 626.61 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर समय रहते विभागों में मॉनिटरिंग की होती और काम समय पर पूरा होता, तो इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
विवादों में रहीं एजेंसियां और एक पर हुई एफआईआर
इस पूरी बिल्डिंग का निर्माण सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम रोचक नहीं रहा है। निर्माण की कमान संभालने वाली एजेंसियों की कार्यप्रणाली के चलते पिछले 8 साल में तीन एजेंसियां बदली जा चुकी हैं और वर्तमान में चौथी एजेंसी यहां काम कर रही है। सबसे पहले दिलीप बिल्डकॉन ने 2018 में इस दिग्गज कंपनी के रूप में निर्माण की नींव रखी और काम शुरू किया। इसके बाद काम की कमान दूसरी एजेंसी हर्ष एंड कंपनी के हाथों में गई। इसके बाद आरकान एजेंसी को काम सौंपा गया, जो सबसे विवादित ठेकेदार एजेंसी रही। इसका कार्यकाल सबसे ज्यादा विवादों और चर्चाओं में रहा। निर्माण शर्तों के उल्लंघन कर बैंक की धरोहर राशि में गड़बड़ी के चलते इस एजेंसी के ठेकेदार पर एफआईआर तक दर्ज कराई गई, जिसके बाद इसे काम से बेदखल किया गया। फिलहाल इस बिल्डिंग के निर्माण की जिम्मेदारी अग्रवाल एंड कंपनी के पास है। इस पूरे प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग का जिम्मा लोक निर्माण विभाग की भवन विंग के पास है।
वकीलों की परेशानी भी बढ़ रही
कोर्ट बिल्डिंग के समय पर तैयार न होने से न केवल सरकार की जेब ढीली हुई है, बल्कि इंदौर के हजारों वकीलों और प्रतिदिन कोर्ट आने वाले हजारों पक्षकारों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पुराने कोर्ट परिसर में जगह की कमी और पार्किंग की समस्या से हर कोई त्रस्त है। उधर पीडब्ल्यूडी भवन विंग के अधिकारियों का कहना है कि कैबिनेट से संशोधित बजट स्वीकृत होने के बाद अब ठेकेदार एजेंसी के भुगतान का संकट पूरी तरह खत्म हो गया है। रुके हुए बिलों का भुगतान जल्द कर दिया जाएगा, जिससे अग्रवाल एंड कंपनी पूरी क्षमता और मजदूरों की संख्या बढ़ाकर काम को जल्द से जल्द अंतिम रूप दे सकेगी। देखना दिलचस्प होगा कि 215 करोड़ की यह बूस्टर डोज इस कछुआ चाल वाले प्रोजेक्ट को कितनी जल्दी मंजिल तक पहुंचाती है।
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