इंस्पायरिंग:जरूरत से ज्यादा सोच-विचार न करें, काम पर ध्यान दें और उसका आनंद लें – जोस बटलर

इंस्पायरिंग:जरूरत से ज्यादा सोच-विचार न करें, काम पर ध्यान दें और उसका आनंद लें – जोस बटलर




35 वर्षीय इंग्लिश क्रिकेटर हाल ही में टी20 में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज बने हैं। उनके अच्छे-बुरे अनुभवों का सार, उन्हीं की जुबानी…
जब लोग मुझे आज मैदान पर देखते हैं, तो उन्हें सिर्फ एक बल्लेबाज दिखता है। लेकिन मेरे भीतर हर दिन एक नई लड़ाई चलती है। उम्र बढ़ रही है, टीम बदल रही है, नए खिलाड़ी आ रहे हैं और जिंदगी भी मुझे हर दिन कुछ नया सिखा रही है। हाल ही में आयरलैंड दौरे पर टीम के लड़के मुझे प्यार से ‘ग्रैंडपा’ कहकर बुला रहे थे। मैं मुस्कुरा देता था। टीम में मेरे साथ सिर्फ आदिल राशिद ही ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें अनुभव वाला माना जा सकता था। बाकी सभी के सामने पूरा करियर पड़ा है। कई बार उन्हें देखकर मन में आता था कि कितने खुशनसीब हैं ये, अभी इनके सामने कितनी लंबी मंजिल है। लेकिन मैंने खुद से एक वादा किया है। अपनी उम्र के बारे में ज्यादा नहीं सोचूंगा। जब तक शरीर साथ देगा, क्रिकेट खेलूंगा और हर पल का लुत्फ उठाऊंगा।
कुछ महीने पहले मैंने अपनी पुरानी डायरी निकाली। सालों तक हर मैच के बाद उसमें अपने खेल के बारे में लिखता था। क्या सही किया, क्या गलत किया, अगली बार क्या बदलना है। खासकर जब व्हाइट बॉल टीम का कप्तान था, तब यह आदत और बढ़ गई थी। अच्छे दिन भी आए, लेकिन मुश्किल दिन ज्यादा याद रहे। 2023 विश्व कप मेरे लिए भारी रहा। आईपीएल खेलने भारत आया तो वही पुरानी डायरी साथ ले गया। पढ़ते-पढ़ते एक अजीब बात समझ आई। जब मैं शानदार क्रिकेट खेल रहा था, तब भी मैं लगभग वही बातें लिख रहा था, जो खराब दौर में लिखता था। दस साल की डायरी में एक जैसी बातें बार-बार दिखाई दीं। तब खुद से कहा, शायद मैं जरूरत से ज्यादा कोशिश कर रहा हूं।
मैंने नोट्स लिखना छोड़ दिया। बस खेलना शुरू किया। हैरानी की बात यह रही कि उसी आईपीएल में मैंने अपने करियर का सबसे बेहतरीन क्रिकेट खेला। तब महसूस हुआ कि हर चीज को पकड़कर रखने की जरूरत नहीं होती। कभी खुद को थोड़ा खुला छोड़ना भी जरूरी है। अब मैं हर गेंद को बोझ बनाकर नहीं खेलना चाहता। लेकिन ‘द हंड्रेड’ टूर्नामेंट के दौरान मेरे पिता इस दुनिया से चले गए। यह बड़ा सदमा था। उस पल ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर कुछ बदल गया। उसके बाद क्रिकेट की अहमियत अलग तरह से समझ आने लगी। उन्होंने हमेशा सिर्फ एक बात चाही थी…मैं अपना सर्वश्रेष्ठ दूं।
अब मैं हर मैच उनके लिए खेलता हूं। अब समझ आया है कि क्रिकेट पूरी जिंदगी नहीं है। जब आप अपने माता-पिता में से किसी एक को खो देते हैं, तब चीजों को देखने का नजरिया बदल जाता है। जिंदगी में जब अच्छे पल आएं तो उन्हें जी भरकर जी लें। बुरे दिन आएं तो उनसे भागे नहीं।
दर्द को दबाएं नहीं, उसका सामना करें
दर्द से भागना ठीक नहीं है। अगर हंसने का मन करे तो हंसें, रोना आए तो रो लें। मैंने यही किया है। दु:ख को दबाने से वह खत्म नहीं हो जाता है। पिता के जाने के बाद दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी-20 सीरीज में 304 रन बनाए। यह विश्व रिकॉर्ड था।
(तमाम इंटरव्यू में)



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