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हिज़्बुल्लाह ने इसराइल पर हमले के लिए छोटे फ़र्स्ट-पर्सन व्यू (एफ़पीवी) ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ा दिया है. इनमें कुछ ऐसे सिस्टम भी शामिल हैं जो फ़ाइबर-ऑप्टिक केबल से नियंत्रित होते हैं ताकि उन्नत रक्षा प्रणालियों (एडवांस डिफ़ेंस सिस्टम) से बचा जा सके.
बीबीसी वेरिफ़ाई ने 26 मार्च से लेबनानी सशस्त्र समूह की ओर से साझा किए गए 35 वीडियो का जियो-लोकेशन देखा है, जिनमें इसराइली सैनिकों, बख़्तरबंद वाहनों और एयर डिफ़ेंस सिस्टम पर दक्षिणी लेबनान और उत्तरी इसराइल में हमले दिखाए गए हैं.
विशेषज्ञों ने बीबीसी वेरिफ़ाई को बताया कि इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्सेज़ (आईडीएफ़) अब तक “कोई प्रभावी प्रतिरोधक उपाय विकसित करने में कामयाब नहीं हो पाई है, क्योंकि छोटे ड्रोन आसानी से डिटेक्शन सिस्टम को पार कर जाते हैं.”
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इन ड्रोन्स को बाज़ार में उपलब्ध पुर्ज़ों और 3डी-प्रिंटेड हिस्सों से भी बनाया जा सकता है और ये उन काफ़ी ज़्यादा कीमत वाले लक्ष्यों की तुलना में बेहद सस्ते हैं, जिन्हें वे नष्ट कर सकते हैं.
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सस्ते एफ़पीवी ड्रोन का इस्तेमाल रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान व्यापक रूप से हुआ है और इसने आधुनिक युद्ध की तस्वीर बदल दी है.
हालांकि इसराइली सेना ने सभी हताहतों का विवरण प्रकाशित नहीं किया है, लेकिन इसराइली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एफ़पीवी हमलों में चार आईडीएफ़ सैनिक और एक नागरिक मारे गए हैं, जबकि दर्जनों घायल हुए हैं.
आईडीएफ़ ने बीबीसी वेरिफ़ाई को बताया कि वह ड्रोन से ख़तरे को समझ रही है और रक्षा प्रणालियों में सुधार के लिए ‘काफ़ी संसाधनों’ का निवेश कर रही है.
इसका मक़सद ‘ज़्यादा प्रभावी चेतावनी मॉडल’ विकसित करना और सैनिकों को ‘तैयारी और ख़तरे के प्रति जागरूकता बढ़ाने’ के लिए प्रशिक्षित करना है.
‘एकदम अलग कैटेगरी’
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राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन संस्थान (इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़) के अनुसार, आईडीएफ़ भी कई वर्षों से एफ़पीवी ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है और मौजूदा समय में दक्षिणी लेबनान के साथ ही ग़ज़ा में हमास के ख़िलाफ़ इनका इस्तेमाल कर रही है.
सैन्य विश्लेषक और पूर्व लेबनानी सेना जनरल हिशाम जाबेर ने बीबीसी अरबी को बताया कि एफ़पीवी ड्रोन ‘रडार की नज़र में नहीं आते’ और हिज़्बुल्लाह के पास मौजूद ‘सैकड़ों’ ड्रोन का इस्तेमाल बख़्तरबंद वाहनों, जिनमें टैंक भी शामिल हैं, को निष्क्रिय करने के लिए किया गया है.
जाबेर ने आगे कहा कि हिज़्बुल्लाह कई वर्षों से उत्तरी इसराइल में लक्ष्यों के ख़िलाफ़ बड़े हमलावर ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन एफ़पीवी का इस्तेमाल ‘एकदम अलग कैटेगरी’ है.
बीबीसी वेरिफ़ाई ने पाया है कि 26 मार्च से हिज़्बुल्लाह के टेलीग्राम चैनल पर क़रीब एक सौ कथित एफ़पीवी हमलों के वीडियो साझा किए गए हैं, जिनमें से 35 की पुष्टि कर ली गई है.
ऐसा लगता है कि हिज़्बुल्लाह ने 2 मार्च को संघर्ष शुरू होने के बाद से ऐसे हमलों के कोई वीडियो साझा नहीं किए थे.
गुरुवार को साझा किए गए एक वेरिफ़ॉइड वीडियो में कम से कम चार एफ़पीवी ड्रोन को किरयात श्मोना के पास इसराइली सीमा चौकी पर हमला करते हुए दिखाया गया है, जो एक-एक कर कई सैन्य वाहनों को निशाना बनाते हैं.
वीडियो क्लिप्स में कम से कम दो वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए दिखाई देते हैं.
बीबीसी वेरिफ़ाई ने दक्षिणी लेबनान में भी इसी तरह के ड्रोन हमलों का पता लगाया है, जिनमें 26 अप्रैल को तैयबे कस्बे में कम से कम दो हमले दर्ज किए गए. वीडियो में सैनिकों को निशाना बनाया गया है, जिसके बाद घायल सैनिकों को बचाने की प्रक्रिया में लगे एक आईडीएफ़ हेलीकॉप्टर के पास हमला होता है.
इसराइली मीडिया ने रिपोर्ट किया है कि इसमें एक सैनिक की मौत हो गई और छह अन्य घायल हुए.
इनमें से कई ड्रोन रेडियो या अन्य वायरलेस सिग्नल के बजाय फ़ाइबर-ऑप्टिक केबल कनेक्शन से उड़ाए जाते हैं. इसकी वजह से मौजूदा इसराइली इलेक्ट्रॉनिक डिफ़ेंस से इन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है.
किंग्स कॉलेज लंदन के सुरक्षा विशेषज्ञ डॉक्टर आंद्रेयास क्रिग ने बीबीसी वेरिफ़ाई को बताया कि फ़ाइबर-ऑप्टिक्स इसराइल की ड्रोन को पहचानने, जाम करने और रोकने की क्षमता को ‘लगभग बेकार’ कर देते हैं और ऑपरेटर को ढूँढना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
सस्ते ड्रोन्स और बनाना भी आसान
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उन्होंने कहा कि इसका असर यह होता है कि इसराइली सैनिकों को “और ज़्यादा सावधानी से आगे बढ़ना पड़ता है, अपनी स्थिति मज़बूत करनी पड़ती है, जाल और पिंजरे जैसी भौतिक सुरक्षा उपाय अपनाने पड़ते हैं, और स्थानीय रक्षा पर तत्काल अधिक ध्यान देना पड़ता है.”
क्रिग ने आगे कहा कि हिज़्बुल्लाह संभवतः इन ड्रोन्स को स्थानीय स्तर पर ही असेंबल कर रहा है, जिनके पुर्ज़े चीन जैसे स्थानों से बाज़ारों में उपलब्ध कंपोनेंट्स से लिए जाते हैं. इनकी लागत प्रति ड्रोन लगभग 300 से 500 डॉलर के बीच होती है.
सेंटर फ़ॉर इन्फ़ॉर्मेशन रेज़िलिएंस के सीनियर इन्वेस्टिगेटर और हथियार विशेषज्ञ लियोन हदावी कहते हैं कि इन ख़रीदे हुए पुर्ज़ों को थ्रीडी प्रिंटर से बने हिस्से से जोड़कर पूरा किया जाता है.
वह कहते हैं, “इन पुर्ज़ों का पता लगाना बहुत कठिन साबित हुआ है क्योंकि ये आसानी से उपलब्ध हैं और सैन्य प्रकृति के नहीं हैं. ज़्यादातर एफ़पीवी ड्रोन में आरपीजी (रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड) वारहेड लगाया जाता है, जिनकी दक्षिणी लेबनान में कोई कमी नहीं है.”
हदावी ने बीबीसी वेरिफ़ाई से कहा कि एफ़पीवी हमलों की बख़्तरबंद वाहनों को भी ख़तरे में डालने की क्षमता की वजह से इनमें बढ़ोतरी का ‘मनोवैज्ञानिक असर’ इसराइली सैनिकों पर काफ़ी गंभीर प्रतीत होता है.
अमेरिका और इसराइल के ईरान में हवाई हमलों के दो दिन बाद, 2 मार्च को इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच हालिया लड़ाई शुरू हुई थी. उन हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई मारे गए थे.
ख़ामेनेई की मौत के बाद हिज़्बुल्लाह ने इसराइल में रॉकेट दागे और इसराइल ने लेबनान में बड़े पैमाने पर हवाई हमलों और देश के दक्षिणी हिस्से में ज़मीनी कार्रवाई के साथ जवाब दिया.
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि उस समय अब तक से कम से कम 2,896 लोग मारे गए हैं, जिनमें से 400 से अधिक लोग अप्रैल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से युद्धविराम की घोषणा के बाद मारे गए.
मंत्रालय के आंकड़े लड़ाकों और नागरिकों की मौतों को अलग-अलग नहीं करते.
संघर्ष शुरू होने के बाद से लेबनान में दस लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं. इसराइल का कहना है कि इस संघर्ष में उसके चार सैनिक और 18 नागरिक मारे गए हैं.
अतिरिक्त रिपोर्टिंग: लमीस अल्तालेबी, थॉमस स्पेंसर, दीना ईसा, शैरी राइडर और पॉल ब्राउन
ग्राफ़िक्स: टॉम शील
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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