चीन में नैप सर्विस; मासिक फीस 480 रुपए, कंबल मुफ्त:दफ्तरों के लंच ब्रेक में सिनेमा हॉल दे रहा झपकी लेने की सुविधा

चीन में नैप सर्विस; मासिक फीस 480 रुपए, कंबल मुफ्त:दफ्तरों के लंच ब्रेक में सिनेमा हॉल दे रहा झपकी लेने की सुविधा



चीन में नैप सर्विस; मासिक फीस 480 रुपए, कंबल मुफ्त:दफ्तरों के लंच ब्रेक में सिनेमा हॉल दे रहा झपकी लेने की सुविधा


चीन के शियान शहर के एक सिनेमा ने दिन में खाली पड़े थिएटरों को कमाई का नया जरिया बना लिया है। यहां ऑफिस कर्मचारियों को दोपहर में सोने की सुविधा दी जा रही है। इस ‘नैप सर्विस’ की मासिक फीस करीब 480 रुपए है। डबल पास करीब 720 रुपए का है। ग्राहक दोपहर 12 बजे से 2.30 बजे तक आराम कर सकते हैं। फोन साइलेंट रखना जरूरी है और ज्यादा खर्राटे लेने वालों को अलग हॉल में भेजा जाता है। यहां मुफ्त में कंबल, कॉफी और दूसरे ड्रिंक्स दिए जाते हैं। आई-मास्क 80 रुपए प्रति पीस पर उपलब्ध हैं। एक कर्मचारी ने बताया कि पहले वह ऑफिस की डेस्क पर झपकी लेता था। अब सोने के लिए सिनेमा हॉल में आता है। सिनेमा हॉल में मिलने वाली सुविधाएं और नियम फ्लैट रिक्लाइनिंग सीटें – सिनेमाघरों ने अपने दो स्क्रीनों में विशेष रूप से 76 एडजस्टेबल रिक्लाइनर सीटें तैयार की हैं, जिन्हें पूरा पीछे झुकाकर आराम से सोया जा सकता है। मुफ्त सुविधाएं – ग्राहकों को सोने के लिए कंबल, मोबाइल चार्जर और जागने के बाद तरोताजा होने के लिए कॉफी या अन्य पेय पदार्थ मुफ्त दिए जाते हैं। अतिरिक्त सुविधाएं – डिस्पोजेबल ईयरप्लग (कान के प्लग) और आई मास्क (आंखों की पट्टी) लगभग 5.9 युआन (88 यूएस सेंट) के मामूली शुल्क पर उपलब्ध हैं। शांति बनाए रखने का नियम – सिनेमा हॉल के अंदर मोबाइल फोन को साइलेंट रखना अनिवार्य है। कॉल आने पर हॉल से बाहर जाकर बात करनी होती है। अलग जोन – महिलाओं और पुरुषों के लिए बैठने और सोने के अलग-अलग जोन बनाए गए हैं। समय और कीमत – यह सुविधा केवल वर्किंग डेज (सोमवार से शुक्रवार) पर दोपहर 12:00 बजे से ढाई 2:30 बजे तक उपलब्ध होती है। सिनेमाघरों ने क्यों उठाया यह कदम? आमतौर पर वर्किंग डेज में दोपहर के समय सिनेमा हॉल पूरी तरह खाली रहते हैं और थिएटर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इस ‘लंच-ब्रेक इकोनॉमी’ के जरिए सिनेमाघर अपनी खाली पड़ी सीटों से कमाई कर रहे हैं और वीकडे ऑक्यूपेंसी रेट (सीटें भरने की दर) को बढ़ा रहे हैं। चीनी कर्मचारियों में दोपहर को सोने की पुरानी संस्कृति रही है, इसलिए दफ्तर की डेस्क पर असहज होकर सोने के बजाय लोग अंधेरे और शांत सिनेमा हॉल को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।



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