![]()
करियर की अनिश्चितता, रिश्तों में ‘सिचुएशनशिप’ का भ्रम या सोशल मीडिया की अंधी दौड़… आज की युवा पीढ़ी जब भी किसी मानसिक उलझन में फंसती है, तो सीधे गूगल, चैटबॉट या एल्गोरिदम की शरण में जाती है, लेकिन स्क्रीन की चमक अक्सर तनाव बढ़ाती है, कम नहीं करती। असल में युवाओं की हर आधुनिक समस्या की ‘चाबी’ घर में बैठे दादी-नानी या बुजुर्गों के पास मौजूद है। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के जेरेंटोलॉजिस्ट कार्ल पिल्लेमर ने अपने ऐतिहासिक ‘द लेगेसी प्रोजेक्ट’ में 1500 से अधिक बुजुर्गों पर स्टडी की। इस शोध का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह निकला कि 80-90 साल की उम्र में पहुंचे बुजुर्गों का सबसे बड़ा पछतावा कोई गलत फैसला नहीं, बल्कि ‘उन बातों की चिंता में वक्त गंवाना था, जो उनके नियंत्रण में थीं ही नहीं।’ स्टडी के दौरान एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि नौकरी जाने के डर में उन्होंने तीन महीने घुट-घुटकर निकाल दिए। वे तीन महीने चिंता ने छीन लिए, काम कुछ नहीं आया। ऐसे में जब भी भविष्य को लेकर ‘पैनिक’ शुरू हो, तो कल्पना कीजिए कि 1000 बुजुर्ग आपसे कह रहे हैं… ‘चिंता मत करो, सिर्फ उस पर फोकस करो जो आज तुम्हारे हाथ में है।’ युवा पीढ़ी काम के दबाव में अपनों से कट जाती है। इन बुजुर्गों का साझा निष्कर्ष था कि जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि यह याद रहता है कि संकट के समय कौन साथ खड़ा था।
चैटबॉट से सलाह लेने के बजाय किसी बुजुर्ग से पूछें- ‘जब आप मेरी उम्र में थे, तो आपने कठिन फैसले कैसे लिए?’ इन दिनों परफेक्ट दिखने की होड़ युवाओं को थका रही है। इस मामले में बुजुर्गों की साझा सीख यही है कि सुख किसी बड़ी उपलब्धि में नहीं, बल्कि सुबह की गर्म चाय, अच्छी धूप या अपनों की मुस्कान जैसे ‘साधारण पलों’ में छिपा है। बुजुर्गों की सीख को आधुनिक जिंदगी में ढालें: एक्सपर्ट पिल्लेमर आगाह करते हैं कि बुजुर्गों की पुरानी जीवनशैली की हूबहू नकल न करें, बल्कि उसके पीछे की सीख को आधुनिक जिंदगी में ढालें। जब आप बुजुर्ग से सवाल करते हैं, तो उन्हें यह अहसास होता है कि उनका अनुभव आज भी समाज के लिए बेशकीमती है। एल्गोरिदम आपको डेटा दे सकता है, पर जिंदगी जीने का नजरिया सिर्फ वही दे सकता है जिसने जिंदगी को जिया व महसूस किया हो। अगली बार जब भी तनाव घेरने लगे, फोन लॉक करें और घर के बुजुर्ग के पास जाकर बैठें, समाधान वहीं से मिलेगा।
Source link

