नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। कनाड़िया गांव की 12.41 एकड़ कृषि भूमि के करीब 18 साल पुराने विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एमपी हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ का आदेश पलटते हुए कहा कि राजस्व रिकार्ड में नामांतरण होने या नाम हटने मात्र से जमीन का मालिकाना हक न तो बनता है और न खत्म होता है।
स्वामित्व खत्म होने का दावा है तो उसके लिए वैध और प्रमाणित दस्तावेज जरूरी है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस आगस्टीन जार्ज मसीह की पीठ ने हाई कोर्ट का नौ मई 2025 का फैसला निरस्त कर निचली अदालतों के निर्णय बहाल कर दिए।
ऐसे शुरू हुआ जमीन का विवाद
मामला कनाड़िया के सर्वे नंबर 307 की 12.41 एकड़ जमीन और उस पर बने मकान का है। यह जमीन भगवानसिंह की थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटों रामप्रसाद और वासुदेव के नाम संयुक्त रूप से राजस्व रिकार्ड में दर्ज हुए। रामप्रसाद की पत्नी जमनाबाई और उनके बच्चों का दावा था कि रामप्रसाद का जमीन में बराबर हिस्सा है।
26 जनवरी 2008 को जमीन का एक हिस्सा बेचने संबंधी सार्वजनिक सूचना प्रकाशित हुई। इसके बाद 30 जनवरी को जमनाबाई पक्ष ने राजस्व रिकार्ड की प्रमाणित प्रतियां निकलवाईं तो पता चला कि रामप्रसाद का नाम हट चुका है। सर्वे नंबर 307/01 वासुदेव के बेटे जसवंत और 307/02 वासुदेव के नाम दर्ज था। इसके बाद 13 फरवरी 2008 को जमनाबाई पक्ष ने सिविल कोर्ट में सह-स्वामित्व, बंटवारे और अलग कब्जे की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
1990 के दस्तावेज पर था विवाद
वासुदेव पक्ष का कहना था कि रामप्रसाद ने 1990 में ही अपना अधिकार छोड़ दिया था। इसके लिए नायब तहसीलदार के समक्ष दिए गए कथित शपथ पत्र, उसके आधार पर हुए नामांतरण और 17 जून 1990 के सहमति दस्तावेज का सहारा लिया गया। तर्क था कि 1990 से नामांतरण दर्ज होने के बावजूद इसे करीब 18 साल तक चुनौती नहीं दी गई, इसलिए मुकदमा समय-सीमा से बाहर है।
सिविल कोर्ट ने चार मई 2016 को यह तर्क नहीं माना और रामप्रसाद के उत्तराधिकारियों को सह-स्वामी मानते हुए बंटवारे का अधिकार दिया। अतिरिक्त जिला न्यायालय ने दो मई 2019 को भी यह फैसला बरकरार रखा। अदालत ने पाया कि रामप्रसाद द्वारा अधिकार छोड़ने के कथित दस्तावेज को पर्याप्त स्वतंत्र प्रमाण से साबित नहीं किया गया।
हाई कोर्ट ने पलटा, सुप्रीम कोर्ट ने फिर बदला फैसला
वासुदेव पक्ष की दूसरी अपील पर हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने नौ मई 2025 को दोनों निचली अदालतों के फैसले पलट दिए। हाई कोर्ट ने 1990 के नामांतरण और दस्तावेज को महत्व देते हुए मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद जमनाबाई पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राम प्रसाद द्वारा अधिकार छोड़ने का दावा करने वाले पक्ष को इसे साबित करने की जिम्मेदारी भी है। केवल राजस्व रिकार्ड में नाम बदल जाना इसका प्रमाण नहीं हो सकता। नामांतरण राजस्व प्रशासन के लिए होता है, इससे स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं होता।
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मप्र भू-राजस्व संहिता की धारा 117 के तहत राजस्व प्रविष्टि की शुद्धता की धारणा भी अंतिम प्रमाण नहीं है। कोर्ट ने माना कि 2008 में सार्वजनिक सूचना सामने आने के बाद ही जमनाबाई पक्ष को रिकार्ड में हुए बदलाव की जानकारी मिलने की बात रिकार्ड से समर्थित है। इसलिए 1990 से मुकदमे की समय-सीमा शुरू मानना उचित नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने 20 अगस्त 2026 को हाई कोर्ट का फैसला निरस्त कर ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय न्यायालय के फैसले बहाल कर दिए।
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