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एक ओर दशहरे पर देशभर में रावण दहन होता है, वहीं जबलपुर से 32 किमी दूर पाटन में नामदेव परिवार रावण की पूजा करता है। परिवार में यह परंपरा 1975 में संतोष नामदेव उर्फ लंकेश ने शुरू की थी। पेशे से टेलर संतोष रावण को परम ज्ञानी, महापंडित और प्रकांड विद्वान मानते थे। 2025 में 72 साल की उम्र में हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई, लेकिन उनके जाने के बाद भी परिवार ने परंपरा नहीं छोड़ी। इस दशहरे पर बड़े बेटे राजकुमार ने उसी स्थान पर रावण की पूजा की, जहां उनके पिता करीब 50 साल तक प्रतिमा स्थापित कर पूजन करते रहे थे। राजकुमार का कहना है कि पिता ने जीवनभर रावण के ज्ञान और विद्वता का सम्मान करते हुए पूजा की। अब उनके नहीं रहने पर इस परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनकी है। उन्होंने कहा, “जब तक जिंदा हूं, तब तक पूजा करता रहूंगा।” दशहरे पर पिता को याद करते हुए राजकुमार ने कहा कि परिवार उनके शुरू किए अनुष्ठान को रुकने नहीं देगा। शिवजी के साथ रावण की प्रतिमा भी करते थे स्थापित संतोष नामदेव हर साल नवरात्र के दस दिनों तक भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करते थे। उनका मानना था कि रावण एक महाज्ञानी और विद्वान था। इसी मान्यता के चलते उन्होंने उसकी आराधना शुरू की। उन्होंने अपने दोनों बेटों के नाम भी मेघनाद और अक्षय रखे, जो रावण के पुत्रों के नाम हैं। शुरुआत में हुआ विरोध, फिर परिवार भी जुड़ा रावण की पूजा शुरू करने पर संतोष को परिवार, रिश्तेदारों और स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। हालांकि, वे अपनी मान्यता पर कायम रहे और शिवजी के साथ रावण की पूजा करते रहे। धीरे-धीरे परिवार और आसपास के लोग भी उनके साथ पूजन में शामिल होने लगे। दशहरे पर पूजा देखने पहुंचते हैं लोग दशहरे पर पाटन में रावण की प्रतिमा के दर्शन और पूजा देखने के लिए लोग पहुंचते हैं। संतोष नामदेव की यह परंपरा स्थानीय लोगों के बीच चर्चा और कौतूहल का विषय रही है। अब उनके बेटे राजकुमार और परिवार के अन्य सदस्य पूजा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनका कहना है कि पिता की शुरू की गई यह परंपरा आगे भी जारी रहेगी।
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