नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। ‘कारगिल युद्ध में हीरो वही बना, जिसके सामने दुश्मन आ गया। मेरे सामने दुश्मन आया, तो मैंने टपका दिया। मेरे जैसे हजारों योद्धा भारतीय सेना में हैं, मैं अकेला नहीं हूं। फर्क सिर्फ इतना था कि मुझे मौका मिला और कारगिल युद्ध की पहली जीत का पहला तिरंगा फहराने का सौभाग्य इस हाथ को मिला।’
यह विचार 1999 के कारगिल युद्ध में तोलोलिंग टॉप की ऐतिहासिक विजय के नायक और ‘2 राज राइफल्स’ के महावीर चक्र विजेता पूर्व नायक दिगेंद्र कुमार ने व्यक्त किए। वे गुरुवार को इंदौर प्रेस क्लब में आयोजित ‘चाय पर चर्चा’ कार्यक्रम में शामिल हुए। आगामी 15 अगस्त के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि तोलोलिंग टॉप पर कब्जा करना कारगिल युद्ध का टर्निंग पॉइंट था।
मध्य प्रदेश देश का ‘कलेजा’, यहीं से मिलती है ऊर्जा
प्रेस क्लब के प्रांगण में पत्रकारों से बातचीत करते हुए दिगेंद्र कुमार ने मध्य प्रदेश की धरती को नमन किया। उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा, ‘मध्य प्रदेश पूरे हिंदुस्तान का ’कलेजा है। जब तक दिल में सांस और धड़कन नहीं होती, तब तक हाथ, पैर और सिर काम नहीं करते। इस माटी ने पूरे देश को अन्न, धन और वीर योद्धा दिए हैं।’
14 घंटे की कठिन चढ़ाई और रशियन रस्से का करिश्मा
युद्ध के टर्निंग पॉइंट का जिक्र करते हुए दिगेंद्र कुमार ने बताया कि तोलोलिंग टॉप नेशनल हाईवे 1-अल्फा के बेहद पास था, जहां से दुश्मन लगातार गोलाबारी कर रहा था। इससे पहले दो-तीन बटालियनें वहां कब्जा करने में नाकाम रही थीं और कई जवान शहीद हो गए थे। तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष जनरल वेद प्रकाश मलिक ने ‘2 राजपूताना राइफल्स’ को यह जिम्मा सौंपा। दिगेंद्र कुमार ने बताया कि उन्होंने पीछे की ओर से खतरनाक चट्टान पर चढ़ने का जोखिम उठाया। इसके लिए उन्होंने 90 मीटर लंबे और 10 टन वजन उठाने की क्षमता वाले विशेष रशियन रस्से का इस्तेमाल किया। माइनस तापमान और बर्फबारी के बीच लगातार 14 घंटे की बेहद कठिन चढ़ाई के बाद उन्होंने ऊपर पहुंचकर रस्सा बांधा, जिससे बाकी घातक प्लाटून के ऊपर जाने का रास्ता साफ हुआ।
कारगिल युद्ध में पहली बार बोफोर्स का ‘डायरेक्ट फायर’
दिगेंद्र कुमार ने एक और ऐतिहासिक वाकये का खुलासा करते हुए बताया कि कारगिल युद्ध में पहली बार बोफोर्स तोप का इस्तेमाल ‘डायरेक्ट फायर’ के रूप में कराया गया था। उन्होंने अपने पास मौजूद नक्शे के आधार पर सटीक जीआर तोपखाने को दिया। तोप के गोलों ने सीधे दुश्मन के ठिकानों पर सटीक निशाना साधा, जिससे पाकिस्तानी सेना की ‘6 नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री’ के बंकर हिल गए।
11 बंकरों को तबाह करने का जांबाज प्लान
12 जून 1999 की सुबह का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि पहाड़ी पर चढ़ने से पहले उन्होंने ईश्वर और शिवजी के प्रतीक स्वरूप को नमन कर अपनी ””घातक प्लाटून”” का मनोबल बढ़ाया। उन्होंने मेजर विवेक गुप्ता, सूबेदार भंवरलाल और एमपी के जांबाज हवलदार सुल्तान सिंह नरवारिया समेत 10 बहादुर साथियों के साथ मिलकर दुश्मन के 11 बंकरों को एक-एक करके उड़ाने का प्लान बनाया था। हर एक जवान ने अपने-अपने हिस्से का बंकर बांटा और अपनी जान की बाजी लगाकर तोलोलिंग टॉप पर जीत का पहला तिरंगा फहराया।
हवा में झपटा लाइव ग्रेनेड, ऐसे नाम पड़ा ‘कोबरा’
संवाद के दौरान दिगेंद्र कुमार ने अपने नाम के साथ जुड़े ‘कोबरा’ शब्द का हैरतअंगेज किस्सा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि श्रीलंका में ‘ऑपरेशन पवन’ के दौरान जब वे अपने जनरल के काफिले में खुली 800 जीप पर 360-डिग्री सुरक्षा घेरा बनाकर चल रहे थे, तभी झाड़ियों से निकले एक उग्रवादी ने जीप पर जलता हुआ लाइव ग्रेनेड फेंक दिया।
दिगेंद्र कुमार ने सेकंड के सौवें हिस्से में अद्भुत फुर्ती दिखाते हुए उस ग्रेनेड को हवा में ही कैच किया और बिना एक पल गंवाए वापस दुश्मन की ओर उछाल दिया। ग्रेनेड उग्रवादी के पास जाकर फटा और उसका काम तमाम हो गया। रियर-व्यू मिरर में यह पूरी घटना देख रहे जनरल साहब ने काफिला रुकने पर पूछा कि ‘वो कौन सा लड़का है जिसने उग्रवादियों का ग्रेनेड वापस उन्हीं पर मार दिया?’ जब उन्हें बताया गया कि वह कमांडो दिगेंद्र हैं, तो जनरल बोले ‘दिगेंद्र नहीं, वो तो “कोबरा’ है।” आखिर में दिगेंद्र कहते हैं कि कमांडो का नियम ‘फाइट एंड डेथ’ होता है, लेकिन मेरा उसूल हमेशा ‘अटैक एंड फिनिश’ का रहा है।
Source link
#दशमन #समन #आय #त #टपक #दय #हर #त #व #हर #यदध #ह #ज #सरहद #पर #डट #ह #इदर #म #बल #करगल #हर #दगदर #कमर

