
vikrant massey :वेब सीरीज ‘मुसाफिर कैफे’ इन दिनों नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है. इस सीरीज का चेहरा अभिनेता विक्रांत मेस्सी हैं. खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट के जरिये उन्होंने बतौर निर्माता भी डेब्यू किया है. सीरीज और अपने इस नये सफर को लेकर उन्होंने कई दिलचस्प बातें साझा कीं.
‘मुसाफिर कैफे’ से निर्माता के तौर पर पहले जुड़े या एक्टर के रूप में?
दोनों ही साथ-साथ हुआ. इस सीरीज को शरण्या गोपालन ने लिखा है. जब मैंने इसकी स्क्रिप्ट पढ़ी, तो मैं पूरी तरह इससे जुड़ गया. मुझे लगा कि निर्माता के तौर पर अपनी शुरुआत करने के लिए इससे बेहतर प्रोजेक्ट नहीं हो सकता. आजकल वेब सीरीज के नाम पर क्राइम और थ्रिलर कंटेंट बनाया जा रहा है. ऐसे में मैंने धारा के विपरीत जाकर एक रोमांटिक सीरीज से जुड़ने का फैसला किया.मुझे हमेशा ही धारा के विपरीत काम करना पसंद है
कहानी का बैकड्रॉप पहाड़ है. आप कितना पहाड़ों से जुड़ाव रखते हैं?
बहुत ज्यादा. मेरे पिता शिमला से हैं और मेरी ससुराल धर्मशाला में है. मुझे पहाड़ों पर जाना काफी पसंद है.मुझे जब भी समय मिलता है. मैं पहाड़ों पर पहुँच जाता है.
यह दिव्य प्रकाश दुबे की किताब ‘मुसाफिर कैफे’पर आधारित है. क्या आपने वह पढ़ी है. हिंदी साहित्य से आपका कितना लगाव है?
मैंने वह किताब पढ़ी है, लेकिन मैंने ज्यादा हिंदी साहित्य नहीं पढ़ा है. हिंदी की मैंने सिर्फ एक-दो किताबें ही पढ़ी हैं. मैं ज्यादातर अंग्रेजी किताबें पढ़ता हूं, क्योंकि मैं हर चीज के बारे में अंग्रेजी में ही सोचता हूं. मेरी हिंदी अच्छी है, पर मन ही मन मेरा जुड़ाव ज्यादातर अंग्रेजी किताबों से ही महसूस होता है.
बतौर प्रोड्यूसर आप किस तरह की कहानियां बताना चाहेंगे. क्या आप नये लोगों को मौका देंगे, क्योंकि आप खुद बिना किसी बैकग्राउंड के यहां पहुंचे हैं?
बिल्कुल. ‘होममेड स्टोरीज’ का मूल डीएनए ही यही है और इसे लेकर हम पूरी तरह स्पष्ट हैं. मेरी नेटफ्लिक्स टीम से बातचीत चल रही है. मैं उन 17 साल के कई ‘विक्रांत’ जैसे युवाओं को मौका देना चाहता हूं, क्योंकि मुझे भी लोगों ने यहां तक पहुंचने का अवसर दिया. मैं उन्हें एक प्लेटफॉर्म देने की पूरी कोशिश करूंगा, ठीक वैसे ही जैसे करीब 20 साल पहले किसी ने मेरी मदद की थी. साथ ही मैं जल्द ही एक फिल्म का निर्देशन करने की भी योजना बना रहा हूं.
अभिनेता के तौर पर आपने नेशनल अवॉर्ड अपने नाम कर लिया है. जब आपको यह अवॉर्ड मिला, तो आपको कैसा लगा?
सच कहूं, तो कोई खास एहसास नहीं हुआ. मैं काफी नर्वस था, क्योंकि वहां सब कुछ बहुत बारीकी से तय होता है. आपको हर चीज की रिहर्सल एक दिन पहले करनी पड़ती है. इसके लिए सिर्फ 30 सेकंड मिलते हैं. बताया जाता है कि आपको 30 सेकंड तक वहां रहना है, राष्ट्रपति से कुछ फीट की दूरी पर खड़ा होना है और उन्हें छूना नहीं है. मेरा पूरा ध्यान एक अच्छी तस्वीर लेने पर था, जिसे मैं अपनी दीवार पर लगा सकूं.
क्या नेशनल अवॉर्ड के बाद फिल्ममेकर्स का आपको देखने का नजरिया बदला है. क्या इससे बेहतर स्क्रिप्ट चुनने की आजादी मिली है?
हां, कुछ हद तक बदलाव आया है, लेकिन स्क्रिप्ट चुनने का मेरा नजरिया नहीं बदला. मैं उन्हीं मूल्यों के साथ काम करना चाहता हूं, जिनकी वजह से मुझे यह सम्मान मिला. मेरा फोकस आज भी सिर्फ अच्छी कहानियां और सही लोगों के साथ काम करने पर ही है.

