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बीती 21 जून को नीट री-एग्ज़ाम के दौरान 20 लाख से ज़्यादा स्टूडेंट्स ने पेपर लीक की आशंकाओं के बीच परीक्षा दी. इस पुनर्परीक्षा के दौरान बिहार में सॉल्वर पकड़े गए, हालांकि अधिकांश जगहों पर सख़्त निगरानी में ठीक ढंग से परीक्षा पूरी हुई.
इससे पहले 3 मई को हुई नीट यूजी में पेपर लीक के मामले सामने आने के बाद शिक्षा मंत्रालय ने इसे रद्द कर दिया था. इसके बाद विभिन्न राज्यों से नीट की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के आत्महत्या करने की ख़बरें भी सामने आईं, जिससे यह मामला और भी गंभीर हो गया.
उधर, सीबीएसई 12वीं बोर्ड के लिए लागू हुए नए मूल्यांकन सिस्टम ओएसएम (ऑन-स्क्रीन मार्किंग) सिस्टम को लेकर विवाद जारी है और स्टूडेंट्स अपने रिवाइज़ मार्क्स का इंतज़ार कर रहे हैं.
वहीं महाराष्ट्र में रविवार यानी 28 जून को होने वाली शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को पेपर लीक के बाद रद्द कर दिया गया है.
ऐसे में सवाल है कि आख़िर क्या स्टूडेंट्स उन संस्थाओं पर दोबारा भरोसा कर सकेंगे जो उनका भविष्य तय करती हैं? क्या माता-पिता भरोसा कर सकते हैं कि वर्षों का त्याग किसी प्रशासनिक चूक की भेंट नहीं चढ़ेगा?
(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की ‘जीवन आस्था’ हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)
कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने इसी मुद्दे पर इस सप्ताह बीबीसी के साप्ताहिक कार्यक्रम ‘द लेंस’ में बात की.
कार्यक्रम में प्रभावित विद्यार्थियों और विशेषज्ञ ने अपनी राय रखी.
कार्यक्रम में शामिल हुए शिक्षा मामलों के विशेषज्ञ प्रेमपाल शर्मा, जो भारत सरकार में संयुक्त सचिव के पद से सेवानिवृत्त हैं. साल 2004 से 2009 तक वे एनसीईआरटी टेक्स्ट बुक कमेटी में शामिल थे और इसी विषय पर अब तक आठ किताबें भी लिख चुके हैं.
नीट री-एग्ज़ाम: स्टूडेंट्स पर बढ़ता मानसिक तनाव

झारखंड की मीनू कुमारी बीते एक साल से नीट की तैयारी करने के लिए दिल्ली में रह रही हैं. उन्होंने बीबीसी के स्टूडियो आकर अपनी बात रखी.
उन्होंने कहा कि वो हर दिन 12 से 14 घंटे पढ़ाई कर रही थीं और उनका नीट का पेपर भी अच्छा हुआ था, मगर फिर इसके कैंसिल होने की ख़बर ने उन्हें काफ़ी निराश कर दिया.
वो कहती हैं, “मेरा पहला पेपर काफी अच्छा हुआ था, फिर रीनीट की घोषणा हुई तो मैं काफी परेशान थी. मगर डॉक्टर बनने के सपने ने मुझे हिम्मत बंधाए रखी. मैंने ख़ुद को समझाया कि दोबारा पेपर देने के अलावा कुछ भी मेरे हाथ में नहीं है.”
दिल्ली के सुशांत सिंह पिछले तीन साल से नीट की तैयारी कर रहे हैं और नीट पेपर लीक से प्रभावित हैं. उन्होंने दसवीं पास करने के बाद से ही नीट के लिए कोचिंग शुरू कर दी थी.

उन्होंने बीबीसी से कहा कि नीट के री-एग्ज़ाम के लिए खुद को तैयार करना अधिकांश स्टूडेंट्स के लिए मानसिक तौर पर थकाने वाला था क्योंकि तीन मई के पेपर के बाद ज़्यादातर एस्पिरेंट अपने घरों को चले गए या घूमने चले गए. ऐसे में दोबारा बैठकर वहीं पढ़ाई करना मुश्किल रहा.
वो कहते हैं कि कोविड महामारी के समय हम सबने डॉक्टरों की कमी के चलते नुक़सान उठाया, फिर भी सरकार ने सबक़ नहीं लिया.
उनका कहना है, “डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स को कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है. हमारा सिस्टम स्टूडेंट्स को रोल-इन (अंदर) करने के बजाय रोल-आउट (बाहर) करता है.”
नीट विवाद के बाद व्यवस्था पर भरोसे का संकट

नीट रीएग्ज़ाम के दौरान सरकार ने लीक से बचने के लिए हर तरह के कदम उठाए, क्या इससे सिस्टम पर भरोसा बहाल होगा?
इसके जवाब में छात्र सुशांत सिंह ने कहा कि दोबारा परीक्षा के दौरान तुलनात्मक रूप से गड़बड़ियां कम हुईं, सख़्ती काफ़ी थी. मगर सिर्फ एक पेपर से भरोसा नहीं लौटेगा.
वो कहते हैं, “अगले साल नीट को ऑनलाइन (सीबीटी मोड) कराने की घोषणा हुई है, तो वहाँ पर सिस्टम हैक हो जाएगा या क्या हो जाएगा, हम में से कोई भी नहीं जानता है.”
छात्रा मीनू ने कहा कि इस बार पेपर लीक वगैरह तो नहीं हुआ लेकिन भरोसा पैदा कर पाना इतना आसान नहीं है, हर दिन जो इतने स्कैम हो रहे हैं जिससे स्टूडेंट्स अपने भविष्य को लेकर बहुत परेशान हैं.
दूसरी ओर, छात्र सुशांत का कहना है कि इस सिस्टम को सुधारने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने जो शीर्ष लोग हैं वो शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ जैसे शिक्षक आदि होने चाहिए.
इसके अलावा, इन दोनों विद्यार्थियों ने यह भी कहा कि शिक्षा व्यवस्था में गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे धरने का वे समर्थन करते हैं.
दोनों का ही मानना है कि ऐसे मामलों में स्टूडेंट्स के साथ अभिभावकों को भी आगे आना चाहिए, तब ही बदलाव आ सकेगा क्योंकि ज़्यादातर प्रभावित स्टूडेंट्स 18 साल के कम उम्र के होते हैं जो परिवार की सहमति के बिना कदम नहीं उठा सकते.
एनटीए की परीक्षा व्यवस्था कैसे सुधरेगी?

एनटीए द्वारा केंद्रीयकृत तरीके से जो परीक्षाएं आयोजित हो रही हैं, इस एजेंसी के ऊपर क्या विद्यार्थियों का भरोसा दोबारा जम सकेगा? और इसके लिए क्या कदम उठाने चाहिए?
इस सवाल के जवाब में शिक्षा मामलों के विशेषज्ञ प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि एनटीए बनाने के पीछे का मकसद नेक था, मगर एनटीए बार-बार फेल हुआ और फिर भी कोई सबक नहीं सीखा गया. इससे एक पूरी पीढ़ी का भरोसा सिस्टम से डिगा है, लेकिन इसे सरकार हल्के में ले रही है.
वो 2024 के नीट-यूजी पेपर लीक का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि तब सुप्रीम कोर्ट में मामला चला. फिर एनटीए में सुधार के लिए राधाकृष्णनन कमेटी बनी, मगर उसकी सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया गया.
उन्होंने दावा किया कि “एनटीए ने राधाकृष्णनन कमेटी की सिफ़ारिशों के ख़िलाफ़ ऐसे लोगों को एक्सपर्ट बनाया जो दिल्ली की पोस्टिंग चाहते थे. इसमें सरकार और व्यवस्था दोनों का बराबर का हाथ है. लगातार ख़ामियों वाली एनटीए या तो भंग कर दी जाए या फिर इसमें तकनीकी ज्ञान वाले एक्सपर्ट लाए जाएं.”
साथ ही विशेषज्ञ प्रेमपाल शर्मा का यह भी कहना है कि किसी व्यवस्था को अच्छा बनाने के लिए उसकी ख़ामियों को सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए, मगर ऐसा नहीं हो रहा है.
उन्होंने सीबीएसई की कॉपी चेकिंग के नए ओएसएम सिस्टम का संदर्भ लेते हुए कहा कि सार्थक सिद्धांत नाम के छात्र ने जब सवाल उठाए तो उन्हें ‘पाकिस्तानी’ बता दिया गया था.
उन्होंने यह भी कहा कि ब्यूरोक्रेट, नेता और अमीरों के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं इसलिए देश की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर ध्यान नहीं दिया जा रहा.
उनका मानना है कि जेईई प्रवेश परीक्षा के मॉडल पर नीट परीक्षा को भी ऑनलाइन करने से लीक से बचा जा सकता है.
हालांकि वह यह भी जोड़ते हैं कि ऑनलाइन सेंटर बनाने के समय धोखाधड़ी न हो, साथ ही ऑनलाइन पेपर कराने के लिए ज़रूरी तकनीक से जुड़े ठेके देते समय पारदर्शिता बरती जाए.
उन्होंने कहा कि सीबीएसई के ओएसएम सिस्टम की तरह ऐसा न हो कि फ्रॉड करने वाली कंपनी को ही ठेका दे दिया जाए.
साथ ही वह मानते हैं कि यूपीएसई जिस तरह पेन-पेपर मॉडल पर बड़े विश्वसनीय तरीके से पेपर करा पाने में सफल है और रेलवे भर्ती बोर्ड भी बड़ी संख्या में जिस तरीके से बिना लीक का पेपर करा पा रही है, इनसे भी एनटीए सीख ले सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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