फादर्स डे: पिता की राह पर बढ़े कदम, किसी ने सुरों की साधना संभाली, तो किसी ने सेवा का लिया संकल्प

फादर्स डे: पिता की राह पर बढ़े कदम, किसी ने सुरों की साधना संभाली, तो किसी ने सेवा का लिया संकल्प

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। पिता केवल परिवार की जिम्मेदारियां निभाने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे अपने बच्चों के पहले शिक्षक, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत भी होते हैं। कई बार बच्चों के जीवन की दिशा किसी किताब या सलाह से नहीं, बल्कि पिता के व्यक्तित्व और उनके कार्यों को देखकर तय होती है।

इन बच्चों ने केवल अपने पिता के पेशे को नहीं अपनाया, बल्कि उनकी वर्षों की मेहनत, मूल्यों और विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया है। शास्त्रीय संगीत की दुनिया में बेटी अपने पिता के सुरों की परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही है, तो दूसरी ओर चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में भाई-बहन अपने पिता की सेवा भावना को आगे बढ़ा रहे हैं। यह कहानी बताती है कि विरासत केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि संस्कार, समर्पण और जीवन मूल्यों का नाम भी है।

सुरों की साधना बनी जीवन का लक्ष्य, पिता को ही बनाया गुरु

ग्वालियर घराने के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और गुरु पंडित सुनील मसूरकर की पुत्री तथा शिष्या डा. शिल्पा मसूरकर आज स्वयं एक स्थापित शास्त्रीय गायिका हैं। शिल्पा बताती हैं कि बचपन से ही घर में संगीत का वातावरण था। रियाज, संगीत की चर्चा और कार्यक्रमों की तैयारियां उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थीं।

बचपन में एक बार पिता को इंदौर के एक मंदिर में आयोजित संगीत कार्यक्रम में प्रस्तुति देते हुए सुना था। उस दिन श्रोताओं की प्रतिक्रिया और पिता की साधना को देखकर मन में संगीत के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। तभी तय कर लिया कि वे भी इसी क्षेत्र में आगे बढ़ेंगी। सबसे बड़ा सौभाग्य यह रहा कि घर में ही श्रेष्ठ गुरु मिल गए। उन्होंने बताया कि जीवन का यादगार क्षण तीन वर्ष पहले आया, जब लोकमान्य नगर में आयोजित एक कार्यक्रम में पहली बार पिता और बेटी ने एक साथ मंच साझा किया। प्रस्तुति के बाद श्रोताओं ने वंस मोर की मांग की।

पिता की सेवा भावना ने बनाया डाक्टर, अब मरीजों की मदद को बना रहे मिशन

प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डा. प्रमोद नीमा के बेटे डा. कृष्णकांत नीमा और बेटी डा. सुहानी नीमा ने भी चिकित्सा क्षेत्र को ही अपना करियर चुना है। यह बताते हैं कि बचपन से उन्होंने अपने पिता को मरीजों की सेवा करते हुए देखा। कई बार वे उनके साथ स्वास्थ्य शिविरों में भी जाते थे। वहां महसूस किया कि किस तरह जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को इलाज मिलने से राहत मिलती है। डा. कृष्णकांत ने बताया कि पिता को मरीजों से मिलने वाला विश्वास और सम्मान हमेशा प्रेरित करता था। वहीं डा. सुहानी काने बताया कि बचपन में ही तय कर लिया था कि जीवन में ऐसा काम करना है जिससे लोगों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आए। डाक्टर बनना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है।

बेटी के सपनों के लिए पिता ने छोड़ा अपना करियर

naidunia_image

इंदौर की बेटी पलक शर्मा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैराकी स्पर्धा में कई स्वर्ण पदक हासिल कर चुकी है। इनके पिता पंकज शर्मा मुंबई में कई फिल्मों में काम कर चुके हैं, लेकिन जब बात बेटी के सपने की आई तो वह अपना करियर छोड़कर वापस इंदौर लौट गए। पलक अभी जिले की बेटी बचाव-बेटी पढ़ाओ की ब्रांड एंबेसडर है। पलक बताती है कि पिता के कारण ही आज वह इस मुकाम पर पहुंच पाई है।

कोरोना काल में जब स्विमिंग पूल बंद हुए तब, उन्होंने घर की छत को ही अभ्यास का मैदान बना दिया। अभ्यास या फिर स्पर्धा में भाग लेने के लिए जाना पड़ता था तो पिता ने हमेशा सहयोग किया, वह स्वयं दूसरे राज्यो में साथ लेकर जाते थे। वहीं पिता पंकज ने बताया कि मुझे फिल्मों में काम करके पहचान जरूर मिली, लेकिन बेटी की सफलता में जो खुशी मिलती है, वह किसी शोहरत से बड़ी है।

Father’s Day Special: पिता के संघर्ष की कहानी से गिफ्ट आइडियाज तक, इस स्पेशल दिन ऐसे करें पापा को खुश

Source link
#फदरस #ड #पत #क #रह #पर #बढ #कदम #कस #न #सर #क #सधन #सभल #त #कस #न #सव #क #लय #सकलप

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *