देश की हवाई निगरानी और रक्षा क्षमता को नई मजबूती देने की दिशा में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने बुधवार को दो महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। ये समझौते एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यू एंड सी) मार्क-2 कार्यक्रम के तहत किए गए हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इससे भारतीय वायुसेना की निगरानी, कमान और नियंत्रण क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। साथ ही, आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी नई गति मिलेगी।
किन कंपनियों के साथ हुए समझौते और उनकी क्या भूमिका होगी?
पहला समझौता एआई इंजीनियरिंग सर्विसेज लिमिटेड (एआईईएसएल) के साथ किया गया है। इसके तहत छह ए321 यात्री विमानों को सैन्य उपयोग के अनुरूप तैयार किया जाएगा। इन विमानों में विशेष उपकरण और अत्याधुनिक प्रणालियां लगाकर उन्हें एईडब्ल्यू एंड सी मार्क-2 विमान के रूप में विकसित किया जाएगा। दूसरा समझौता अदाणी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के साथ हुआ है। कंपनी इस परियोजना में विकास एवं उत्पादन साझेदार की भूमिका निभाएगी। वह इन विमानों में लगने वाली मिशन प्रणालियों के विकास और उनके एकीकरण में डीआरडीओ का सहयोग करेगी।

एईडब्ल्यू एंड सी मार्क-2 से भारतीय वायुसेना को क्या फायदा होगा?
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, डीआरडीओ की सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (सीएबीएस) इस परियोजना की प्रमुख प्रयोगशाला है। एईडब्ल्यू एंड सी मार्क-2 प्रणाली तैयार होने के बाद भारतीय वायुसेना को लंबी अवधि तक हवाई निगरानी करने, अधिक दूरी से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, सुरक्षित संचार स्थापित करने, युद्धक्षेत्र की बेहतर जानकारी हासिल करने तथा अधिक प्रभावी कमान एवं नियंत्रण की क्षमता मिलेगी। इससे लंबी दूरी से आने वाले संभावित खतरों का समय रहते पता लगाकर उनका प्रभावी जवाब देना आसान हो जाएगा। संशोधित विमान एयरबस डिफेंस एंड स्पेस उपलब्ध कराएगी, जबकि डीआरडीओ, अदाणी डिफेंस और भारतीय वायुसेना मिलकर उनमें मिशन प्रणालियों का एकीकरण और उड़ान परीक्षण करेंगे।
इस परियोजना में डीआरडीओ और अडानी की क्या भूमिका होगी?
इस साझेदारी में डीआरडीओ अपनी रक्षा अनुसंधान, मिशन सिस्टम और स्वदेशी तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराएगा, जबकि अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस उन्नत विनिर्माण, सिस्टम इंटीग्रेशन और पूरे जीवनचक्र के दौरान तकनीकी सहायता प्रदान करेगा। दोनों संस्थाओं की संयुक्त क्षमता से भारत का सबसे उन्नत स्वदेशी एयरबोर्न सर्विलांस प्लेटफॉर्म तैयार किया जाएगा।
भारत किस विशिष्ट देशों के क्लब में शामिल होगा?
अब तक केवल अमेरिका, फ्रांस, इज़राइल, चीन और स्वीडन जैसे पांच देशों ने ही स्वदेशी AEW&C क्षमता विकसित की है। एईडब्ल्यू और सी-एमकेआईआई के विकसित होने के बाद भारत भी इस चुनिंदा समूह में शामिल हो जाएगा, जो देश की रक्षा तकनीक और आत्मनिर्भरता के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।
IACCS से जुड़ने पर क्या बदलेगा?
इस प्लेटफॉर्म को भारतीय वायुसेना की इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा जाएगा। यह देशव्यापी कमांड एवं कंट्रोल नेटवर्क है, जो निगरानी, वायु रक्षा और सैन्य अभियानों से जुड़े संसाधनों को रियल-टाइम में आपस में जोड़ता है। इसके माध्यम से हवाई रक्षा और अधिक मजबूत होगी, निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी, युद्धक्षेत्र में बेहतर समन्वय स्थापित होगा और किसी भी खतरे के प्रति प्रतिक्रिया पहले से अधिक प्रभावी बन सकेगी।
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परीक्षण पूरे होने के बाद आगे क्या होगा?
सभी तकनीकी और उड़ान परीक्षण पूरे होने के बाद सैन्य विमानन प्रमाणन एजेंसियों से आवश्यक मंजूरी प्राप्त की जाएगी। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इस परियोजना में निजी उद्योगों की भागीदारी से देश में अनुसंधान, नवाचार और रक्षा उत्पादन को नई गति मिलेगी। साथ ही रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती मिलेगी।
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