भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने के लिए 6 अप्रैल से हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई सोमवार को भी जारी रही। मस्जिद पक्ष ने प्रतिउत्तर प्रस्तुत करते …और पढ़ें

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने के लिए 6 अप्रैल से हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई सोमवार को भी जारी रही। मस्जिद पक्ष ने प्रतिउत्तर प्रस्तुत करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के सर्वे पर ही सवाल खड़े कर दिए। वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने मस्जिद पक्ष की ओर से कहा कि सर्वे के दौरान मिली शिलाओं, मूर्तियों और अन्य सामग्री की कार्बन डेटिंग ही नहीं की गई। जब कार्बन डेटिंग ही नहीं हुई तो एएसआइ को कैसे पता चला कि भोजशाला का निर्माण परमारकाल में हुआ था। वर्ष 2003 से भोजशाला एएसआइ के अाधिपत्य में है। इस बात की आशंका को नकारा नहीं जा सकता कि सर्वे से पहले कुछ वस्तुएं भोजशाला में प्रतिस्थापित कर दी गई हों।
सर्वे की प्रक्रिया और साक्ष्यों पर मस्जिद पक्ष की आपत्तियां
कोर्ट ने एएसआइ को निर्देश दिए थे कि सर्वे के दौरान भोजशाला में किसी तरह का भौतिक बदलाव नहीं किया जाएगा, बावजूद इसके सर्वे में दो ओटले हटा दिए गए। एएसआइ ने एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर सर्वे किया, ऐसे में मस्जिद पक्ष की ओर से उपस्थित दो लोगों के लिए हर जगह मौजूद होना संभव नहीं था। सोमवार को मस्जिद पक्ष के अलावा अपीलार्थी काजी जकुल्ला की ओर से भी प्रतिउत्तर पूरे हो गए। अब मंगलवार को कोर्ट अन्य पक्षकारों को सुनेगी। संभवत: मंगलवार को भोजशाला मामले में सुनवाई पूरी हो जाएगी। सोमवार दोपहर ढाई बजे अपीलार्थी काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने तर्क रखना शुरू किए।
कानूनी अधिसूचना और ऐतिहासिक आदेशों का उल्लेख
उन्होंने कहा कि भोजशाला को मंदिर बताने वाले खुद असमंजस में हैं। उन्हें नहीं पता कि वे क्या सिद्ध करना चाहते हैं। कभी भोजशाला को मंदिर बताते हैं तो कभी पाठशाला। उनके पास अपनी बात सिद्ध करने के लिए कुछ नहीं है। वे सिर्फ कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं। याचिकाकर्ता कह रहे हैं कि भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर है, लेकिन एएसआइ ने इसकी घोषणा 29 नवंबर 1951 को की थी। वर्ष 1904 से 28 नवंबर 1951 के बीच की कोई अधिसूचना नहीं है। इस समयावधि में एएसआइ को भोजशाला में कुछ करने का अधिकार ही नहीं था। 24 अगस्त 1935 को धार दरबार ने ऐलान की घोषणा की थी।
नमाज की अनुमति और मंदिर पक्ष के दावों पर बहस
एएसआइ ने वर्ष 2003 में दिए आदेश में शुक्रवार को दोपहर एक से तीन के बीच नमाज की अनुमति दी थी, क्योंकि एएसआइ को पता था कि धार दरबार का आदेश अस्तित्व में है। दोपहर करीब साढे तीन बजे खुर्शीद ने अपनी बात रखना शुरू की। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य रिकार्ड पर उपलब्ध नहीं है जो सिद्ध कर सके कि भोजशाला मंदिर है। मंदिर पक्ष ने स्वामित्व को लेकर कोई राहत नहीं मांगी है। मंदिर पक्ष एक भी साक्ष्य ऐसा प्रस्तुत नहीं कर सका जो सिद्ध करे कि भोजशाला को तोड़कर मस्जिद बनाया गया हो।
वजूखाना और विसंगतियों पर वरिष्ठ अधिवक्ता के तर्क
सर्वे बताता है कि विवादित स्थान के बीच में एक टैंक बना है। दरअसल यह वजूखाना है। इससे पानी की निकासी की व्यवस्था भी है। वीडियोग्राफी में दिख रहा है कि अखबार, प्लास्टिक, कप आदि मिले हैं। यह संभव नहीं कि ये चीजें सदियों से वहां पड़ी हो। सर्वे के दौरान गौतम बुद्ध की एक मूर्ति भी मिली थी, लेकिन एएसआइ की रिपोर्ट में इसका उल्लेख तक नहीं है। आज पूरी हो सकती है सुनवाई कोर्ट भोजशाला मामले में मंगलवार को सुनवाई पूरी कर सकती है। सोमवार को कोर्ट ने इस मामले में शाम करीब साढ़े पांच बजे तक सुनवाई की। कोर्ट ने सभी पक्षकार और इंटरविनरों से कहा है कि वे मंगलवार को अपने तर्क पूरे कर लें।
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