महानवमी पर कन्या पूजन में लंगूर को भोजन कराने की परंपरा क्यों? जानें बटुक भैरव से जुड़ी कथा – Kanya Pujan 2026 The Religious Significance Of Feeding A Langur Alongside Nine Girls During Navratri

महानवमी पर कन्या पूजन में लंगूर को भोजन कराने की परंपरा क्यों? जानें बटुक भैरव से जुड़ी कथा – Kanya Pujan 2026 The Religious Significance Of Feeding A Langur Alongside Nine Girls During Navratri



शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना के साथ कन्या पूजन का भी विशेष महत्व होता है। नवरात्रि के अंतिम दिनों, खासकर महाअष्टमी और महानवमी पर, भक्त छोटी कन्याओं को घर बुलाकर उनका पूजन करते हैं और उन्हें भोजन कराते हैं। इस परंपरा में कन्याओं के साथ एक बालक को भोजन कराने की भी प्रथा है, जिसे कई जगह लंगूर या लांगूर कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस बालक का संबंध बटुक भैरव से जोड़ा जाता है। आखिर कन्या पूजन में लंगूर को बैठाने की परंपरा क्यों प्रचलित है और इसका क्या धार्मिक महत्व है? आइए जानते हैं।






Kanya Pujan 2026 The Religious Significance of Feeding a Langur Alongside Nine Girls During Navratri

कन्या पूजन में लंगूर को क्यों बैठाया जाता है?
– फोटो : अमर उजाला


कन्या पूजन में लंगूर को क्यों बैठाया जाता है?

नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन को शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की आराधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। परंपरा के अनुसार, छोटी कन्याओं को देवी के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनका पूजन किया जाता है। कई परिवारों में कन्याओं के साथ एक बालक को भी आमंत्रित किया जाता है और उसे आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है। इस बालक को लंगूर या लांगूर कहा जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस बालक को भगवान भैरव के बाल स्वरूप यानी बटुक भैरव का प्रतीक माना जाता है। बटुक भैरव को भगवान शिव के भैरव स्वरूप से संबंधित माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में भैरव को देवी के रक्षक के रूप में भी प्रतिष्ठा प्राप्त है। यही वजह है कि कुछ क्षेत्रों में कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के साथ बालक को भोजन कराने की परंपरा निभाई जाती है। हालांकि, यह रीति सभी क्षेत्रों और परिवारों में एक जैसी नहीं होती।


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कन्या पूजन
– फोटो : ai


बटुक भैरव कौन हैं और मां दुर्गा से क्या संबंध है?

हिंदू धार्मिक मान्यताओं में बटुक भैरव को भगवान भैरव का बाल स्वरूप माना जाता है। भगवान भैरव का संबंध भगवान शिव से है और उन्हें कई परंपराओं में क्षेत्रपाल तथा रक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है। मां दुर्गा की उपासना के साथ भैरव की आराधना करने की परंपरा भी प्रचलित है। इसी धार्मिक धारणा के आधार पर कुछ स्थानों पर कन्या पूजन के समय बालक को बटुक भैरव का प्रतीक मानकर उसका पूजन किया जाता है। कन्याओं को भोजन कराने के साथ बालक को भी भोजन, दक्षिणा और उपहार देना श्रद्धा तथा सम्मान का हिस्सा माना जाता है। भक्त इस परंपरा के माध्यम से मां दुर्गा और भगवान भैरव दोनों का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।


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कन्या पूजन में लंगूर को भोजन कराने का क्या है महत्व


कन्या पूजन में लंगूर को भोजन कराने का क्या है महत्व?

धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, कन्या पूजन में बालक को शामिल करना देवी के साथ उनके रक्षक स्वरूप के प्रति भी श्रद्धा व्यक्त करने का तरीका माना जाता है। इस दौरान कन्याओं और बालक के पैर धोकर, तिलक लगाकर और भोजन कराकर उनका सम्मान किया जाता है। भोजन के बाद उन्हें सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपहार भी दिए जाते हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहती है। बटुक भैरव के प्रतीक माने जाने वाले बालक को भोजन कराने के पीछे भी यही भाव जुड़ा है। कुछ लोक परंपराओं में इसे पूजा की पूर्णता और देवी के प्रति समर्पण से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि लंगूर को बैठाना हर जगह अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में कन्या पूजन की विधि तथा परंपराएं भिन्न हो सकती हैं। पूजा में श्रद्धा, सेवा, सम्मान और कन्याओं को आदरपूर्वक भोजन कराना विशेष महत्व रखता है।


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कन्या पूजन करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
– फोटो : अमर उजाला


कन्या पूजन करते समय किन बातों का ध्यान रखें?

कन्या पूजन के दौरान स्वच्छता और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। कन्याओं को घर आमंत्रित करके सम्मानपूर्वक बैठाएं, उनके पैर धोकर तिलक लगाएं और भोजन कराएं। भोजन में परिवार की परंपरा के अनुसार हलवा, पूरी, चना या अन्य सात्विक पकवान शामिल किए जा सकते हैं। भोजन के बाद कन्याओं को सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपहार देकर आदरपूर्वक विदा करें। यदि आपके परिवार में कन्याओं के साथ लंगूर को बैठाने की परंपरा है, तो बालक को भी इसी तरह सम्मानपूर्वक भोजन कराएं। पूजा का मूल भाव देवी के प्रति श्रद्धा, सेवा और सम्मान है। इसलिए किसी परंपरा का पालन करते समय उसके धार्मिक महत्व को समझने के साथ सभी बच्चों के प्रति स्नेह और आदर बनाए रखना भी जरूरी है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।


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