मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक 20 साल की महिला को राहत दी है जो सांसारिक जीवन छोड़कर जैन साध्वी बनना चाहती है।

HighLights
- माता-पिता और रिश्तेदार फैसले का विरोध कर रहे
- याचिका में महिला ने तुरंत पुलिस सुरक्षा की मांग की थी
- महिला मदद के लिए पुलिस का सहारा ले सकती है
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक 20 साल की महिला को राहत दी है जो सांसारिक जीवन छोड़कर जैन साध्वी बनना चाहती है। कोर्ट ने कहा कि एक बालिग नागरिक के तौर पर, वह अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले लेने और अपनी पसंद के धर्म का पालन करने के लिए आजाद है।
इंदौर बेंच के जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने 7 सितंबर को महिला की रिट याचिका का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की।
माता-पिता और रिश्तेदार फैसले का विरोध कर रहे
महिला के वकील ने कोर्ट को बताया कि उसने श्वेतांबर जैन धर्म अपनाने, दीक्षा लेने और साध्वी के तौर पर धार्मिक रास्ते पर चलने का फैसला किया था, लेकिन उसके माता-पिता और रिश्तेदार उसके फैसले का विरोध कर रहे थे और उसे परेशान कर रहे थे। याचिका में महिला ने पुलिस सुरक्षा की मांग की थी।
माता-पिता के प्रति कोर्ट की सहानुभूति
सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा, मैंने कोर्ट में दी गई दलीलों पर विचार किया है। ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता, जो 20 साल की है और भारत की नागरिक है, अपने तरीके से धर्म या धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने और अपनी मर्जी से जिंदगी जीने की हकदार है। मामले के खास तथ्यों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि महिला और उसके माता-पिता, दोनों के प्रति उसकी समान सहानुभूति है।
लेकिन कानून कहता है कि याचिकाकर्ता के बालिग (18 साल से अधिक उम्र) और भारत का नागरिक होने के नाते, उसे अपने पारिवारिक और अन्य कानूनी अधिकारों की सुरक्षा पाने का हक है और किसी भी व्यक्ति द्वारा पैदा की गई किसी भी रुकावट को कानून की नजर में मंजूरी नहीं दी जा सकती।
महिला मदद के लिए पुलिस का सहारा ले सकती है
न्यायाधीश ने महिला से कहा कि अगर उसके माता-पिता या कोई और व्यक्ति उसके खिलाफ जबरदस्ती के तरीके अपनाता है, तो वह मदद के लिए संबंधित पुलिस स्टेशन या अधिकारी के पास आवेदन कर सकती है।
कोर्ट ने लता सिंह बनाम यूपी राज्य और AIR 2006 SC 2522 में दर्ज एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया था कि 18 साल से ज्यादा उम्र के लोग अपने फैसले लेने के लिए आजाद हैं और कोर्ट को ऐसे लोगों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर महिला की ओर से ऐसी कोई अर्जी दी जाती है, तो संबंधित अधिकारी या स्टेशन इंचार्ज मामले की जांच करेंगे और सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसले में दिए गए निर्देशों के अनुसार तुरंत कार्रवाई करेंगे।
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