वेनेज़ुएला भूकंप के बाद चर्चा: भारत पर भूकंप का कितना ख़तरा

वेनेज़ुएला भूकंप के बाद चर्चा: भारत पर भूकंप का कितना ख़तरा

वेनेज़ुएला में सात से ज़्यादा तीव्रता के दो भूकंप आने से हज़ारों लोगों की मौत की आशंका है

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वेनेज़ुएला की राजधानी कराकास में कुछ ही सेकंड के अंतराल पर दो बड़े भूकंप आए. इसकी वजह से हज़ारों लोगों के मारे जाने की आशंका है.

वेनेज़ुएला में आए इस विनाशकारी भूकंप के बाद चर्चा ये चल रही है कि भारतीय शहरों पर भूकंप का कितना ख़तरा है.

भारत के कई शहरों में बीते कुछ सालों में कई भूकंप आए हैं जिसकी वजह से हज़ारों लोगों की जानें गई हैं.

इसके अलावा राजधानी दिल्ली और आस-पास के कई इलाकों में भूकंप के छोटे झटके लगातार महसूस किए जाते रहे हैं.

(ये आर्टिकल 17 फ़रवरी 2025 को सबसे पहले छपा था)

भूगर्भ विशेषज्ञों ने भारत के क़रीब 59% भू-भाग को भूकंप संभावित क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया है.

दुनिया के दूसरे देशों की तरह ही भारत में ऐसे ज़ोन रेखांकित किए गए हैं, जिनसे पता चलता है कि किस हिस्से में सीस्मिक गतिविधि (पृथ्वी के भीतर की परतों में होने वाली भौगोलिक हलचल) ज़्यादा रहती है और किन हिस्सों में कम.

वैज्ञानिकों ने इसका तरीक़ा निकाला है, भूकंप संभावित क्षेत्रों के चार-पाँच सीस्मिक ज़ोन बनाकर उन्हें चिह्नित करना. ज़ोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम रहती है, वहीं ज़ोन-5 में ज़्यादा प्रबल रहती है.

दिल्ली पर कितना ख़तरा?

दिल्ली

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इमेज कैप्शन, दिल्ली-एनसीआऱ इलाके ने बीते कुछ सालों में भूकंप के कई झटके महसूस किए हैं

दिल्ली-एनसीआर का इलाक़ा सीस्मिक ज़ोन-4 में आता है और यही वजह है कि उत्तर भारत के इस क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियाँ तेज़ रहती हैं.

जानकार सीस्मिक ज़ोन-4 में आने वाले भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज़्यादा बताते हैं. ग़ौरतलब है कि मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहर सीस्मिक ज़ोन-3 की श्रेणी में आते हैं.

जबकि भूगर्भशास्त्री कहते हैं कि दिल्ली की दुविधा यह भी है कि वह हिमालय के निकट है, जो भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का ख़मियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

‘इंडियन एसोसिएशन ऑफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स’ के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर महेश टंडन को लगता है कि दिल्ली में भूकंप के साथ-साथ कमज़ोर इमारतों से भी ख़तरा है.

उन्होंने कहा, “हमारे अनुमान के मुताबिक़ दिल्ली की 70-80% इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेलने के लिहाज़ से डिज़ाइन ही नहीं की गई हैं. पिछले कई दशकों के दौरान यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर बढ़ती गईं इमारतें ख़ासतौर पर बहुत ज़्यादा चिंता की बात हैं क्योंकि अधिकांश के बनने से पहले मिट्टी की पकड़ की जाँच नहीं हुई है.”

दिल्ली के पास फ़ॉल्ट लाइन मौजूद

विश्लेषक भारत के सभी बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली में भूकंप की आशंका ज़्यादा बताते हैं

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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने साल 2025 में आदेश दिया था कि ऐसी सभी इमारतें, जिनमें 100 या उससे अधिक लोग रहते हैं, उनके ऊपर भूकंप-रोधी होने वाली किसी एक श्रेणी का साफ़ उल्लेख होना चाहिए. फ़िलहाल तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता.

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की एक बड़ी समस्या घनी आबादी भी है. डेढ़ करोड़ से अधिक आबादी वाली राजधानी दिल्ली में लाखों इमारतें दशकों पुरानी हैं और तमाम मोहल्ले एक-दूसरे से सटे हुए बने हैं.

भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, दिल्ली और उत्तर भारत में छोटे-मोटे झटके या आफ्टरशॉक्स तो आते ही रहेंगे, लेकिन जो बड़ा भूकंप होता है, उसकी वापसी 500 वर्ष में ज़रूर होती है और इसीलिए यह चिंता का विषय भी है.

वैसे भी दिल्ली से थोड़ी दूर स्थित पानीपत इलाक़े के पास भूगर्भ में फ़ॉल्ट लाइन मौजूद है, जिसके चलते भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन टेक्नोलॉजी के प्रमुख भूगर्भशास्त्री डॉक्टर कालचंद जैन मानते हैं कि, “किसी बड़े भूकंप के समय, स्थान और रिक्टर पैमाने पर उसकी तीव्रता की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती.”

लेकिन उन्हीं के मुताबिक़, “हम इस बात को भी कह सकते हैं कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सीस्मिक गतिविधियाँ सिलसिलेवार रही हैं और वे किसी बड़े भूकंप की भी वजह हो सकती हैं.”

कहाँ तक हो सकता है भूकंप का असर

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की एक बड़ी समस्या आबादी का घनत्व भी है

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भूकंप और सीस्मिक ज़ोन से जुड़ी एक और अहम बात है कि किसी भी बड़े भूकंप की रेंज 250-350 किलोमीटर तक हो सकती है.

मिसाल के तौर पर 2001 में गुजरात के भुज में आए भूकंप ने क़रीब 300 किलोमीटर दूर स्थित अहमदाबाद में भी बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी. अगर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पिछले 300 वर्षों के भूकंप के इतिहास को टटोला जाए, तो सबसे ज़्यादा तबाही मचाने वाला भूकंप 15 जुलाई, 1720 का बताया जाता है.

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व सहायक महानिदेशक डॉक्टर प्रभास पांडे ने इस मामले पर वर्षों तक रिसर्च करके अपनी स्टडी में इसका ज़िक्र किया है.

उनके अनुसार, “1720 वाले भूकंप की तीव्रता का अंदाज़ा 1883 में प्रकाशित हुए ‘द ओल्डहैम्स कैटालॉग ऑफ़ इंडियन अर्थक्वेक्स’ से मिलता है और रिक्टर पैमाने पर यह 6.5-7.0 के बीच का रहा था. इसने पुरानी दिल्ली और अब नई दिल्ली इलाक़े में भारी तबाही मचाई थी और भूकंप के पाँच महीनों बाद तक हल्के झटके महसूस किए गए थे.”

डॉक्टर प्रभास पांडे लिखते हैं, “अगर 20वीं सदी की बात हो तो 1905 में काँगड़ा, 1991 में उत्तरकाशी और 1999 में चमोली में आए भूकंप उत्तर भारत में बड़े कहे जाएँगे और इनके कोई न कोई जुड़ाव पृथ्वी के भीतर की गतिविधियों से रहा है, जो एक ही समय पर दिल्ली-एनसीआर में भी महसूस की गई हैं.”

दिल्ली कितनी तैयार?

सवाल यह भी है कि दिल्ली भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए कितनी तैयार है.

सार्क डिज़ास्टर मैनेजमेंट सेंटर के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर संतोष कुमार को लगता है कि पहले की तुलना में अब भारत ऐसी किसी आपदा से बेहतर ढंग से निपट सकता है.

उन्होंने बताया, “देखिए, आशंकाएँ सिर्फ़ अनुमान पर आधारित होती हैं. अगर हम लातूर में आ चुके भूकंप को ध्यान में रखें, तो निश्चित तौर पर दिल्ली में कई भवन असुरक्षित हैं. लेकिन बहुत सी जगहें सुरक्षित भी हैं. सबसे अहम है कि हर नागरिक ऐसे ख़तरे को लेकर सजग रहे और सरकारें प्रयास करें कि नियमों का उल्लंघन कतई न हो.”

‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ की अनुमिता रॉय चौधरी का भी मानना है कि दिल्ली में हज़ारों ऐसी इमारतें हैं, जिनमें रेट्रोफिटिंग यानी भूकंप निरोधी मरम्मत की सख़्त ज़रूरत है.

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भारत के 29 शहर भूकंप के साये में हैं. नेशनल सेंटर फोर सिसमोलॉजी (एनसीएस) के मुताबिक इन 29 शहरों पर भूकंप का गंभीर ख़तरा है.

इन शहरों में दिल्ली समेत नौ राज्यों की राजधानियां भी हैं. ये ज़्यादातर शहर हिमालय ज़ोन से लगे हैं. हिमालय से लगे शहरों का दुनिया के उन शहरों में शुमार है जहां भूकंप का सबसे ज़्यादा ख़तरा रहता है.

दिल्ली, पटना, श्रीनगर, कोहिमा, पुडुच्चेरी, गुवाहाटी, गंगटोक, शिमला, देहरादून, इम्फाल और चंडीगढ़ भूकंपीय क्षेत्र के ज़ोन चार और पांच में हैं.

द ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस) ने भारत में भूकंपीय ज़ोन दो से पांच के बीच का अंतर बताया है. एनसीएस के निदेशक विनीत गहलोत ने कहा कि इन वर्गीकरणों में भूकंप के रिकॉर्ड, निर्माण गतिविधियां और नुक़सान को जेहन में रखा गया है.

एनसीएस भूकंप का अध्ययन करता है और उसके रिकॉर्ड को सहेजता है. यह उन इलाक़ों को चिन्हित करता है कि कहां ज़्यादा ख़तरा है और कहां कम ख़तरा है.

ज़ोन दो में भूकंप का ख़तरा कम होता है वहीं ज़ोन पांच में भूकंप की तबाही की आशंका सबसे ज़्यादा होती है. ज़ोन चार और पांच भूकंप के भारी ख़तरे वाले इलाक़े हैं.

ज़ोन पांच में भारत का पूरा पूर्वोत्तर है. इनमें जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात के साथ उत्तरी बिहार के कुछ हिस्से और अंडमान निकोबार हैं.

वहीं जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा, दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात के कुछ हिस्से और महाराष्ट्र का कुछ भाग ज़ोन चार में हैं.

गुजरात का भुज 2001 में भयावह तरीक़े से भूकंप की चपेट में आया था. इस भूकंप में 20 हज़ार लोग मारे गए थे.

चंडीगढ़, अंबाला, अमृतसर, लुधियाना और रूड़की भी भूकंप के ख़तरे के लिहाज से चार और पांच ज़ोन में आते हैं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस (आईआईएससी) के प्रोफ़ेसर कुसल राजेंद्रण ने कहा कि ये वे शहर हैं जहां आबादी का घनत्व बहुत सघन है और ये गंगा के मैदानी भाग हैं.

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