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समाज में विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह को लेकर आज भी कई तरह की सामाजिक रूढ़ियां और संकोच मौजूद हैं। ऐसे समय में भोपाल और उज्जैन के दो परिवारों ने रिश्तों की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी हर ओर चर्चा हो रही है। बेटे की कैंसर से मौत के बाद ससुर ने अपनी बहू को बेटी का दर्जा दिया और उसका पूरे रीति-रिवाज के साथ पुनर्विवाह कराया। इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं पिता की भूमिका निभाते हुए कन्यादान भी किया। इस पूरे फैसले में परिवार के सभी सदस्यों ने उनका साथ दिया। युवती का पुनर्विवाह 6 जुलाई को विदिशा निवासी गोविंद बैरागी से संपन्न हुआ। विवाह समारोह में दोनों परिवारों के सदस्य और रिश्तेदार मौजूद रहे। 2018 में हुई थी पहली शादी, 2022 में कैंसर से पति का निधन लड़की के पिता एवं कोलूखेड़ी स्थित वैष्णो देवी मंदिर के पुजारी पंडित रामबाबू बैरागी ने बताया कि उनकी बेटी का पहला विवाह वर्ष 2018 में उज्जैन जिले के जेतल क्षेत्र निवासी दिनेश बैरागी के बेटे से हुआ था। वर्ष 2022 में कैंसर के कारण दामाद का निधन हो गया। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा, लेकिन ससुराल पक्ष ने बहू का हाथ नहीं छोड़ा। पंडित रामबाबू बैरागी के मुताबिक, बेटे के निधन के कुछ समय बाद ही समधी दिनेश बैरागी ने उनसे कहा था, आप चिंता मत करिए। यह अब मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है। मैं इसका विवाह अपनी बेटी की तरह करूंगा। उन्होंने अपना वादा निभाया। विवाह की पूरी जिम्मेदारी उठाई, बेटी की पसंद के अनुसार आवश्यक सामान दिलाया और पूरे सम्मान के साथ उसकी विदाई की। ससुर बोले- जिंदगी बहुत बड़ी है, इसलिए नया जीवन जरूरी ससुर दिनेश बैरागी ने कहा कि पूरा परिवार इस निर्णय के साथ खड़ा था। उन्होंने कहा, हमने पूरे परिवार के साथ मिलकर फैसला लिया कि इसका पुनर्विवाह होना चाहिए। जिंदगी बहुत बड़ी है, कोई कब तक अकेले जीवन बिताए। हमने इसे अपनी बेटी माना है और आज बेटी का कन्यादान कर रहे हैं। इससे बड़ी खुशी हमारे लिए क्या हो सकती है। उन्होंने समाज से अपील करते हुए कहा, अगर किसी परिवार में ऐसी दुखद स्थिति आ जाए तो पुनर्विवाह में कोई बुराई नहीं है। समाज को आगे बढ़कर ऐसे परिवारों का साथ देना चाहिए। ननद बोली- हमारी तीन बहनें थीं, अब यह चौथी बहन है इस पहल में परिवार की बेटियों ने भी पूरी संवेदनशीलता के साथ भागीदारी निभाई। दिनेश बैरागी की बेटी सपना बैरागी ने कहा, यह हमारी भाभी थीं, लेकिन आज हमने इन्हें अपनी बहन बनाकर विदा किया है। हमारी तीन बहनें थीं, अब यह हमारी चौथी बहन है। हम सभी ने मिलकर इसकी शादी में सहयोग किया है। उन्होंने समाज से अपील करते हुए कहा, पुनर्विवाह में कोई गलत बात नहीं है। जिस घर में ऐसी परिस्थिति आए, वहां ससुराल वाले बहू को बेटी मानकर उसका घर दोबारा बसाएं। यही समाज के लिए सबसे बड़ा संदेश है। पिता बोले- ऐसा ससुर हर बेटी को मिले लड़की के पिता पंडित रामबाबू बैरागी ने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि बेटी के ससुराल वाले इतना बड़ा निर्णय लेंगे। उन्होंने कहा, “मेरे समधी ने कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने मेरी बेटी को अपनी बेटी बनाकर विदा किया। अगर समाज में हर परिवार ऐसी सोच अपनाए तो कोई भी बेटी विधवापन को अभिशाप नहीं समझेगी। उसे भी सम्मान के साथ नई जिंदगी जीने का अवसर मिलेगा।
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