सुप्रीम कोर्ट:’कीमती जल निकाय असुरक्षित, तो मूकदर्शक नहीं बैठ सकते’; राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से अदालत – Supreme Court Updates Wetlands Issue Guidelines For Personal Data Collection During Probe Cji Surya Kant News

सुप्रीम कोर्ट:’कीमती जल निकाय असुरक्षित, तो मूकदर्शक नहीं बैठ सकते’; राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से अदालत – Supreme Court Updates Wetlands Issue Guidelines For Personal Data Collection During Probe Cji Surya Kant News

सुप्रीम कोर्ट:’कीमती जल निकाय असुरक्षित, तो मूकदर्शक नहीं बैठ सकते’; राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से अदालत – Supreme Court Updates Wetlands Issue Guidelines For Personal Data Collection During Probe Cji Surya Kant News

सुप्रीम कोर्ट अपडेट
– फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों के प्रकाशन की तारीख से नौ साल बीत जाने के बाद भी जलस्रोतों का जमीनी सत्यापन व सीमांकन का काम पूरा नहीं हुआ है। जब कीमती जलस्रोतों की सुरक्षा नहीं हो रही हो तो अदालतें इस स्थिति को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों व संबंधित अधिकारियों को आर्द्रभूमि की मौके पर जाकर पड़ताल करने व उनकी सीमाएं तय करने का निर्देश दिया। जस्टिस अरविंद कुमार व जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने कहा, पेयजल स्त्रोत होने के कारण जलस्रोत अत्यंत मूल्यवान हैं और संविधान के तहत मिले जीवन के अधिकार के दायरे में आते हैं। यह अदालत केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती और न ही जल निकायों के असुरक्षित रहने से होने वाले परिणामों के प्रति उदासीन रह सकती है। शीर्ष अदालत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।


चार हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश

अदालत ने शुरुआत में कहा कि हलफनामे अधिकतम चार हफ्ते के भीतर दाखिल किए जाने चाहिए। अदालत ने बताया, वरिष्ठ वकील शेखर नफड़े ने जोर देकर कहा है कि काम करने में काफी समय लगेगा, इसलिए उन्होंने छह से नौ महीने का उचित समय दिए जाने का अनुरोध किया है। हालांकि, यह उचित लगता है कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चार महीने का समय दिया जाए।

जांच के दौरान निजी डाटा संग्रह के लिए दिशा-निर्देश तय करने को सुप्रीम कोर्ट में याचिका

जांच के दौरान व्यक्तिगत व डिजिटल डाटा के संग्रह के लिए दिशा-निर्देश तय करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में ऐसी व्यापक व सांविधानिक रूप से मान्य सुरक्षा व्यवस्था बनाने की मांग की गई है जो जांच एजेंसियों को व्यक्तिगत व डिजिटल जानकारी तक पहुंच बनाने की शक्तियों का इस्तेमाल करने के मामले में नियंत्रित कर सके। पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की तरफ से दाखिल याचिका के अनुसार, आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, सोशल मीडिया अकाउंट, क्लाउड स्टोरेज और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किसी व्यक्ति के निजी जीवन की बहुत सारी जानकारी मौजूद होती है। इसमें निजी बातचीत, लोकेशन हिस्ट्री, पेशेवर बातचीत, गोपनीय जानकारी व अन्य लोगों से जुड़े विवरण शामिल हो सकते हैं। वकील अनूप प्रकाश अवस्थी के जरिये दाखिल इस याचिका में तर्क दिया गया है कि ऐसी जानकारी तक बिना किसी रोक-टोक या जरूरत से ज्यादा पहुंच से किसी अपराध की जांच के लिए आवश्यक जानकारी से कहीं अधिक डाटा सामने आ सकता है। इससे संविधान प्रदत निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

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