सेहत की बात:कम उम्र में मिर्गी की समस्या कितनी खतरनाक, क्या होता है इसका ब्रेन पर असर? – Epilepsy At A Young Age May Affect The Brains Overall Functioning Know Young-onset Epilepsy Risk

सेहत की बात:कम उम्र में मिर्गी की समस्या कितनी खतरनाक, क्या होता है इसका ब्रेन पर असर? – Epilepsy At A Young Age May Affect The Brains Overall Functioning Know Young-onset Epilepsy Risk

बचपन या कम उम्र में शुरू होने वाली मिर्गी पूरे दिमाग की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकती है। एक नए अध्ययन में पाया गया कि ऐसे मरीजों के दिमाग की गतिविधियां सरल हो जाती हैं। वैज्ञानिकों ने इसे एंट्रॉपी में कमी बताया, जिसका अर्थ है दिमाग की गतिविधियों में विविधता और जटिलता की कमी।

यह अध्ययन एम्स नई दिल्ली, नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर, ब्रिटेन की एस्टन यूनिवर्सिटी और कुछ अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया। इसमें 32 ऐसे मरीज शामिल थे जिनकी मिर्गी की सर्जरी हो चुकी थी।

ये मरीज सर्जरी के बाद कम से कम तीन साल तक दौरे से पूरी तरह मुक्त रहे थे। मरीजों के दिमाग की गतिविधियों की जांच एमईजी नामक आधुनिक तकनीक से की गई। शोधकर्ताओं ने दिमाग के 114 अलग-अलग हिस्सों का विश्लेषण किया। नतीजों से पता चला कि मिर्गी शुरू होने की उम्र और दिमाग की एंट्रॉपी के बीच सबसे मजबूत संबंध है। जितनी कम उम्र में दौरे शुरू हुए, पूरे दिमाग की औसत एंट्रॉपी उतनी ही कम पाई गई।

यह संबंध मरीज की मौजूदा उम्र को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा। शोधकर्ताओं ने इन नतीजों को शुरुआती बताया है। यह अध्ययन केवल सर्जरी से अच्छा फायदा पाने वाले मरीजों पर केंद्रित था। इसलिए इसके निष्कर्ष सभी मिर्गी रोगियों पर एकदम लागू नहीं किए जा सकते।




Epilepsy at a Young Age May Affect the Brains Overall Functioning know Young-Onset Epilepsy risk

मिर्गी का दिमाग पर असर
– फोटो : Amarujala.com/AI


पूरे दिमागी नेटवर्क पर असर

सर्जरी वाले हिस्से और दिमाग के बाकी हिस्सों की एंट्रॉपी में कोई खास अंतर नहीं दिखा। इससे साफ संकेत मिलता है कि मिर्गी का असर सिर्फ एक जगह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे दिमागी नेटवर्क को प्रभावित कर सकता है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

बचपन में झेला गया मानसिक या शारीरिक आघात केवल बच्चे के वर्तमान जीवन को प्रभावित नहीं करता, बल्कि आगे चलकर उसकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर भी असर डाल सकता है। इसका प्रभाव अगली पीढ़ी तक पहुंचने की आशंका भी रहती है।

सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन और सामाजिक कार्य विभाग के प्रोफेसर जुबैर मिनाई ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे के व्यवहार और स्वास्थ्य में बदलाव को समय रहते पहचानना और परिवार, स्कूल, चिकित्सक व मनोवैज्ञानिक के स्तर पर मिलकर काम करना जरूरी है। उपचार केवल समस्या पर ध्यान देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका उचित इलाज भी किया जाना चाहिए।

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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।


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