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बीते कुछ समय से देश के जानेमाने शिक्षाविद् और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ख़बरों में रहे हैं.
कभी लद्दाख को संविधान की छठवीं अनुसूची में शामिल कराने की अपनी मांगों के लिए आमरण अनशन को लेकर, तो कभी लद्दाख से दिल्ली तक उनके पैदल मार्च को लेकर.
अब एक बार फिर वह अपने आमरण अनशन को लेकर सुर्खियों में बने हुए हैं. लेकिन इस बार वजह लद्दाख नहीं, देश की शिक्षा व्यवस्था है.
सोनम वांगचुक एजुकेशनिस्ट हैं. शिक्षा को लेकर अपने कामों की वजह से उन्होंने दुनियाभर में नाम कमाया.
शिक्षा के अलावा सोनम वांगचुक ने लद्दाख को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद करने के कई उपाय सुझाए और उन्हें विकसित किया.
इन्हीं कामों की वजह से लोग उन्हें इंजीनियर, इनोवेटर, एजुकेशनिस्ट या पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर जानते हैं.
सोनम वांगचुक को उनके कामों के लिए कई सम्मान भी मिल चुके हैं, जिनमें 2018 का रेमन मैग्सेसे पुरस्कार भी शामिल है. इसे एशिया का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है.
‘शिक्षा में इनोवेशन लाने वाला सुधारक’
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रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फ़ाउंडेशन की वेबसाइट ने वांगचुक को “लद्दाख के ऊंचाई वाले इलाक़ों में शिक्षा के क्षेत्र में इनोवेशन लाने वाला शिक्षा सुधारक” बताया है.
रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फ़ाउंडेशन के मुताबिक़, 1998 में वांगचुक ने SECMOL (सेकमोल) स्कूल की शुरुआत की. इसका फ़ुल फ़ॉर्म है, ‘स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ़ लद्दाख’.
इसका मक़सद लद्दाख के स्टूडेंट्स का कॉन्फिडेंस बढ़ाना, उनमें लाइफ़स्किल्स डेवलप करना और लीडरशिप ट्रेनिंग से लेकर सौर ऊर्जा प्रणाली लगाने तक के कई तरह के कोर्सेस उपलब्ध कराना था.
रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फ़ाउंडेशन के मुताबिक़, वांगचुक की देखरेख में सेकमोल के स्टूडेंट रीन्युएबल एनर्जी जेनेरेट कर रहे हैं और स्कूल और लद्दाख के गांवों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं.
जलवायु परिवर्तन की वजह से खेती के लिए नेचुरल वाटर सप्लाई प्रभावित होने के बाद वांगचुक ने “आइस स्तूप” बनाने की ओर कदम बढ़ाया.
ये स्तूप, कोन के आकार के आइस माउंटेन होते हैं, जो सर्दियों में पानी को जमा रखते हैं और गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलकर सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराते हैं.
नोबेल प्राइज़ की वेबसाइट के मुताबिक़, वांगचुक ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और वह पिछले 30 सालों से ज़्यादा समय से शिक्षा सुधार के क्षेत्र में काम कर रहे हैं.
उन्होंने “ऑपरेशन न्यू होप” की शुरुआत में अहम भूमिका निभाई. यह सरकार, गांवों के समुदायों और सिविल सोसाइटीज़ के बीच की एक पहल थी. इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना था.
इस कार्यक्रम के तहत सरकारी स्कूलों की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए गांव स्तर पर शिक्षा समितियों का गठन किया गया, टीचर्स को चाइल्ड फ्रैंडली पढ़ाने के तौर-तरीकों की ट्रेनिंग दी गई और स्थानीय स्तर पर आधारित बच्चों के सिलेबस की किताबों को फिर से तैयार किया गया.
फेल होने वाले बच्चों के लिए ख़ास स्कूल
इसके अलावा जो स्टूडेंट्स स्टेट बोर्ड की परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाए, उनके लिए सोनम वांगचुक ने लेह के पास सेकमोल अल्टरनेटिव स्कूल कैंपस की स्थापना की.
यह एक ख़ास स्कूल है जिसमें एडमिशन का क्राइटेरिया परीक्षा में फेल होना है. एक इंजीनियर के रूप में वांगचुक इस स्कूल में इनोवेशन की शिक्षा देते हैं. यहां उन्होंने स्टूडेंट्स के साथ मिलकर कम लागत वाले, मिट्टी से बने और सौर ऊर्जा से गर्म रहने वाले भवन तैयार किए.
ये भवन लद्दाख की सर्दियों में बाहर का तापमान शून्य से 15 डिग्री सेल्सियस नीचे होने पर भी भीतर लगभग 15 डिग्री सेल्सियस तापमान बनाए रखते हैं.
स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सुधार और वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था के मिशन को वांगचुक ने विश्वविद्यालय स्तर पर ले जाना चाहा. इसी कोशिश के तहत उन्होंने हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ़ अल्टर्नेटिव्स लद्दाख (एचआईएएल या हयाल) की शुरुआत की.
उनका कहना है कि सेकमोल में किए गए शोध को हयाल में दूसरे स्तर पर ले जाया जाता है. वो बताते हैं कि सौर ऊर्जा से कमरों को गर्म करने का एक आविष्कार सेकमोल में शुरू किया गया था जिसे हयाल आगे लेकर गया.
वांगचुक कहते हैं कि भारतीय सेना के साथ पार्टनरशिप में चीन से लगी सीमा पर सेना के कैंपों के लिए इस आविष्कार पर काम किया गया और इसे अफ़ग़ानिस्तान में भी ले जाया गया है.
एचआईएएल की वेबसाइट के मुताबिक़, सोनम वांगचुक इसके फाउंडर और डायरेक्टर हैं.
लद्दाख के लिए दिल्ली तक पैदल मार्च
सोनम वांगचुक एक पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर भी काफ़ी सक्रिय रहे हैं. वांगचुक लद्दाख को पूर्व राज्य का दर्जा देने की मांग करते रहे हैं.
वह लद्दाख को संविधान की छठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए आमरण अनशन और दिल्ली तक मार्च भी कर चुके हैं.
यह पैदल मार्च उन्होंने अक्तूबर 2024 में लद्दाख से दिल्ली तक निकाला था. हालांकि दिल्ली पुलिस ने सिंघु बॉर्डर से उन्हें हिरासत में ले लिया था.
साल 2025 में 35 दिन की उनकी भूख हड़ताल के 15वें दिन 24 सितंबर को लेह में आंदोलन हिंसक हो गया. इसी के दो दिन बाद यानी 26 सितंबर 2025 को वांगचुक को हिरासत में लिया गया था.
इन सब के अलावा सोनम वांगचुक के ऐसे कई किस्से और पहलू हैं जो लोगों को पता नहीं हैं.
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नौ साल की उम्र तक स्कूल से दूर रहे
इंडिया टुडे ग्रुप को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के कई पहलुओं के बारे में बताया. सोनम का जन्म साल 1966 में लेह के दुर्गम गांव उलेटोक्पो में हुआ था.
सोनम ने बताया था कि उन्होंने नौ साल की उम्र तक स्कूल की शक्ल नहीं देखी थी और इसी की वजह से वो कुछ अलग तरीक़े से सोच पाए.
सोनम के मुताबिक़, स्कूल न जाने की वजह से उनकी मां ने उन्हें घर पर ही स्थानीय भाषा में पढ़ाया और उन्होंने शुरुआती ज्ञान ख़ुद के अनुभवों से हासिल किया.
सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल राजनेता थे और नौ साल की उम्र के बाद सोनम वांगचुक को श्रीनगर के स्थानीय स्कूल में भेज दिया गया.
इंटरव्यू में सोनम वांगचुक ने बताया था कि स्कूल में उन्हें अंग्रेज़ी की किताबें पकड़ा दी गईं और उन्हें कुछ समझ नहीं आता था. उन्होंने बताया कि स्कूल के शिक्षक उन्हें पीछे की सीट पर बैठा देते थे या क्लास के बाहर खड़ा कर दिया करते थे.
सोनम ने इंटरव्यू में बताया था कि इस ‘उत्पीड़न’ से तंग आकर 12 साल की उम्र में वो लद्दाख के स्टूडेंट्स के लिए विशेष केंद्रीय विद्यालय में दाख़िला लेने के लिए अकेले बस से दिल्ली भाग आए.
उन्होंने बताया कि वहां पर बच्चों की बहुत भीड़ थी और उन्हें कई दिनों से कैंप में दाख़िले का इंतज़ार करना पड़ रहा था.
सोनम वांगचुक ये सब देखकर सीधे स्कूल में प्रिंसिपल के रूम में चले गए और उनसे दाख़िला देने को कहा. प्रिंसिपल उनके इस जुझारूपन से ख़ुश हुए और उन्हें दाख़िला दे दिया.
इंजीनियरिंग के लिए ख़ुद पैसे जुटाए
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इसके बाद सोनम वांगचुक ने इंजीनियरिंग की तैयारी की और श्रीनगर के रीज़नल इंजीनियरिंग कॉलेज (वर्तमान में एनआईटी) में लिखित परीक्षा पास करके इंटरव्यू देने गए.
सोनम वांगचुक कहते हैं कि इंटरव्यू के दौरान प्रिंसिपल ने जब उनके पिता का नाम देखा तो उनसे पूछा कि उनके पिता क्या करते हैं तो उन्होंने कहा कि वो पेशे से किसान हैं. हालांकि उस समय सोनम के पिता जम्मू-कश्मीर में मंत्री थे.
सोनम का कहना था कि उन्होंने जब बीटेक का एक साल पूरा कर लिया तो वो मैकेनिकल इंजीनियरिंग करना चाहते थे क्योंकि उनकी ऑप्टिक्स में दिलचस्पी थी. वहीं उनके पिता उन्हें सिविल इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए कह रहे थे.
उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई को चुना तो उनके पिता ने उन्हें पढ़ाई का ख़र्चा देने से मना कर दिया जिसके बाद अपने ख़र्चे पूरे करने के लिए उन्होंने स्कूली बच्चों के लिए कोचिंग की शुरुआत की.
19 साल की उम्र में उन्होंने एक होटल के कमरे को किराए पर लेकर जब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो दो महीने में ही तीन साल की इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फ़ीस जुटा ली.
सोनम वांगचुक कहते हैं कि यही वह मौक़ा था जिसने उन्हें शिक्षा के लिए काम करने को प्रेरित किया. इसके बाद उन्होंने कॉलेज से निकलते ही साल 1988 में सेकमोल की शुरुआत की.
ये वही सेकमोल है, जिसने उन्हें दुनियाभर में पहचान और इज़्ज़त दी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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