सोनम वांगचुक: भूख हड़ताल में क्या अब भी राजनीति बदलने की ताक़त है

सोनम वांगचुक: भूख हड़ताल में क्या अब भी राजनीति बदलने की ताक़त है

सोनम वांगचुक

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इमेज कैप्शन, सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 दिनों से भूख हड़ताल पर थे. लेकिन 21वें दिन उन्हें पुलिस जबरन सफ़दरज़ंग अस्पताल ले गई

58 दिनों की एक भूख हड़ताल ने भारत के नक्शे में एक बदलाव ला दिया था.

अक्तूबर 1952 में पोट्टी श्रीरामुलु ने एक अनशन शुरू किया था. वो जिस मांग का समर्थन कर रहे थे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उसका कई बार विरोध कर चुके थे. पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगु भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य चाहते थे.

श्रीरामुलु एक शांत स्वभाव के गांधीवादी थे और इससे पहले भी सामाजिक मुद्दों पर कई बार उपवास कर चुके थे. उनका मानना था कि केवल आत्म बलिदान ही दिल्ली की सरकार को उनकी बात सुनने पर मजबूर कर सकता है और ऐसा हुआ भी.

अनशन के 58वें दिन श्रीरामुलु की मौत हो गई. इसके बाद तेलुगु भाषी इलाक़ों में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए. सरकारी इमारतों पर हमले हुए, रेलवे लाइनें रोक दी गईं और उस समय फैली अशांति में कई लोगों की मौत होने की भी ख़बरें मिलीं.

कुछ ही दिनों बाद नेहरू ने आंध्र राज्य के गठन की घोषणा कर दी. इसके बाद राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया और अगले कुछ वर्षों में भाषाई आधार पर भारत के राज्यों का पुनर्गठन हुआ.

किसी एक व्यक्ति के विरोध प्रदर्शन का देश पर इतना गहरा असर बहुत कम देखने को मिला है.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा है, “पोट्टी श्रीरामुलु आज लगभग भुला दिए गए हैं. यह अफ़सोस की बात है, क्योंकि उन्होंने अपने देश के इतिहास ही नहीं, उसके भूगोल पर भी बड़ा प्रभाव डाला था.”

एक व्यक्ति की भूख ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सीमाएं बदलने में मदद की थी.

शायद यही वजह है कि सात दशक से ज़्यादा समय बाद भी भारत में लोग अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल का रास्ता चुनते हैं.

इसकी ताज़ा मिसाल शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक हैं. उनके अनिश्चितकालीन अनशन के कारण उनकी तेज़ी से बिगड़ती सेहत को लेकर चिंता बढ़ रही है.

59 वर्षीय वांगचुक पिछले 20 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारत में नीट परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर भूख हड़ताल कर रहे थे. लेकिन 21वें दिन सुबह दिल्ली पुलिस उन्हें ज़बरदस्ती सफ़दरजंग अस्पताल लेकर गई.

वांगचुक 20 दिनों तक पानी के सहारे चल रहे थे. इस दौरान उनका वज़न 9 किलोग्राम से ज़्यादा कम हो चुका है.

वो “कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)” के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं, जो शिक्षा सुधारों की मांग कर रही है. कॉकरोच जनता पार्टी का उदय एक ऑनलाइन व्यंग्य कैंपेन के तौर पर हुआ था.

गांधी के हाथों भूख हड़ताल बनी राजनीतिक शक्ति

महात्मा गांधी

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इमेज कैप्शन, महात्मा गांधी ने कम से कम 15 बड़े उपवास किए थे

भारत जैसा कोई दूसरा देश नहीं है, जहां भूख हड़ताल राजनीति का इतना अहम हिस्सा बन गई हो.

दूसरे देशों में प्रदर्शनकारी सड़कें जाम करते हैं या रैलियां निकालते हैं. भारत में भी ऐसा होता है. लेकिन यहां लोग विरोध जताने के लिए खाना भी छोड़ देते हैं.

यह परंपरा भारत के गणतंत्र बनने से भी कई सदियों पुरानी है. हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में स्वेच्छा से त्याग और उपवास को नैतिक महत्व दिया गया है.

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता महात्मा गांधी ने इस पुरानी परंपरा को आधुनिक राजनीति का हिस्सा बना दिया.

गांधी का कहना था कि उपवास किसी पर दबाव डालने या उसे ब्लैकमेल करने का तरीक़ा नहीं है. यह एक ऐसा कष्ट है, जिसका मक़सद लोगों की अंतरात्मा को जगाना है, न कि उन्हें मजबूर करना.

1918 से लेकर 1948 में अपनी हत्या तक गांधी ने कई बार उपवास किया. उन्होंने धार्मिक हिंसा, जातिगत भेदभाव और राजनीतिक मतभेदों के ख़िलाफ़ अनशन किए. इस तरह ‘ख़ाली थाली’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक बन गई.

एक अनुमान के मुताबिक़, गांधी ने कम से कम 15 बड़े उपवास किए थे. उनका सबसे लंबा उपवास 21 दिन तक चला था.

जनवरी 1948 में किया गया उनका आख़िरी उपवास पांच दिनों तक चला और उसने दिल्ली में सांप्रदायिक शांति बहाल करने में मदद की.

अपने आख़िरी उपवास से ठीक पहले, 1948 में गांधी ने लिखा था, “उपवास वह आख़िरी रास्ता है जिसे एक व्यक्ति तलवार की जगह अपनाता है.”

1947 में जब गांधी ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए उपवास शुरू किया, तब ब्रिटिश स्वामित्व वाले अख़बार द स्टेट्समैन ने लिखा, “राजनीतिक हथियार के रूप में भूख हड़ताल की नैतिकता को लेकर हम वर्षों तक भारत में इसके सबसे बड़े प्रवर्तक गांधी से सहमत नहीं रहे.”

“लेकिन हमारी नज़र में महात्मा गांधी ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में शायद ही कभी किसी ऐसे उद्देश्य के लिए उपवास किया हो, जो इससे अधिक सीधा, पवित्र और सम्मानजनक हो. यह ऐसा उपवास नहीं था, जिसे लोगों की भावनाओं को तुरंत प्रभावित करने या जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया हो.”

आज़ाद भारत ने भी इस परंपरा को अपनाया.

देश में किसानों के अधिकारों, आरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, भ्रष्टाचार विरोधी क़ानूनों और विवादित सुरक्षा क़ानूनों को हटाने जैसी मांगों को लेकर कई बार भूख हड़तालें की गई हैं.

नैतिक ताक़त बनाती है भूख हड़ताल को असरदार

इरोम शर्मिला

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इमेज कैप्शन, इरोम शर्मिला 16 साल तक भूख हड़ताल पर रहीं, उनकी जान इसलिए बची रही क्योंकि अधिकारियों ने नाक के ज़रिए उन्हें जबरन भोजन दिया

2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे की 13 दिन की भूख हड़ताल ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को नई ताक़त दी थी. इस आंदोलन ने कुछ समय के लिए पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था.

भारत के पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) क़ानून (आफ़्सपा) के विरोध में इरोम शर्मिला ने 16 साल तक भोजन नहीं किया. वह केवल इसलिए जीवित रह सकीं क्योंकि अधिकारियों ने उनकी नाक में नली डालकर उन्हें जबरन भोजन दिया.

प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी कई बार लंबी भूख हड़तालें की हैं. उनकी मांग रही है कि बड़ी बांध परियोजनाओं से विस्थापित लोगों को उचित मुआवज़ा और पुनर्वास मिले.

कनेक्टिकट विश्वविद्यालय में मानवशास्त्र के अध्येता सयंतन साहा रॉय, जो हाल के वर्षों में उपवास की राजनीति पर शोध कर रहे हैं, कहते हैं, “भूख हड़ताल विरोध का एक वैश्विक तरीक़ा है. यह केवल भारत तक सीमित नहीं है.”

दरअसल, ब्रिटिश साम्राज्य के कई हिस्सों में भूख हड़ताल लोकतांत्रिक और उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की साझा भाषा बन गई थी.

ब्रिटेन में महिलाओं को मतदान का अधिकार दिलाने के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ताओं, आयरलैंड के राष्ट्रवादियों और भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने भी इसका इस्तेमाल किया था.

लेकिन साहा रॉय के अनुसार, भारत में हालात कुछ अलग हैं.

वो कहते हैं, “भारत में कई बार सरकारें लोगों की मांगों के प्रति बेहद उदासीन हो जाती हैं. ऐसे में प्रदर्शनकारियों को लगता है कि सत्ता में बैठे लोगों को कार्रवाई के लिए मजबूर करने का यही एकमात्र रास्ता बचता है.”

उनका मानना है कि भारत में भूख हड़ताल की परंपरा इतनी मज़बूत इसलिए है, क्योंकि गांधी ने इसे नैतिक और राजनीतिक प्रतिरोध के एक स्थायी रूप में बदल दिया था.

साहा रॉय कहते हैं, “स्वार्थ से भरी राजनीति की दुनिया में भूख हड़ताल आत्म बलिदान का प्रतीक बनकर सामने आती है. जैसे-जैसे प्रदर्शनकारी का शरीर कमज़ोर होता जाता है, सत्ता में बैठे लोगों पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ता जाता है.”

हालांकि यह दबाव तभी असर डालता है, जब उसे देखने और समझने वाले लोग मौजूद हों.

साहा रॉय कहते हैं, “भूख हड़ताल को प्रभावी बनने के लिए लोगों को सामने आना ज़रूरी है. इसका लक्ष्य सिर्फ़ सरकार नहीं होती, बल्कि आम जनता भी होती है. जनता का ग़ुस्सा ही सत्ता पर दबाव बना सकता है.”

वो 1970 और 1980 के दशक की आयरलैंड की भूख हड़तालों का उदाहरण देते हैं.

उनके मुताबिक़, “ये प्रदर्शनकारी, जो अपने साथ राजनीतिक क़ैदियों जैसा व्यवहार किए जाने की मांग कर रहे थे, अपने कष्ट और मौत को स्वीकार करने की तैयारी दिखाकर आयरिश जनता को अपने समर्थन में लामबंद करना चाहते थे. ऐसे में भूख हड़ताल करने वाले का शरीर राज्य की कठोरता और क्रूरता का प्रतीक बन जाता है.”

लेकिन वो यह भी कहते हैं कि इसका असर तय नहीं होता.

वो कहते हैं, “इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जनता आपकी अपील पर प्रतिक्रिया देगी ही. यही वजह है कि भूख हड़ताल विरोध का एक बेहद जोखिम भरा और अनिश्चित तरीका है.”

लेकिन हर भूख हड़ताल कामयाब नहीं होती

2011 में अन्ना हज़ारे

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इमेज कैप्शन, 2011 में अन्ना हज़ारे की भूख हड़ताल ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को नई गति दी और कुछ समय के लिए पूरे देश में उसकी गूंज सुनाई दी

हालांकि भूख हड़तालों में नैतिक ताक़त होती है, लेकिन उन्हें आलोचना से कभी पूरी तरह छूट नहीं मिली.

अगर गांधी ने भूख हड़ताल को एक नैतिक हथियार का दर्जा दिया, तो स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े नेताओं में से एक डॉ. भीमराव आंबेडकर इसे लेकर काफ़ी सशंकित थे.

1949 में दिए गए एक ऐतिहासिक भाषण में आंबेडकर ने कहा था कि जब संविधान के तहत अपनी बात रखने और न्याय पाने के रास्ते मौजूद हैं, तो उपवास और सविनय अवज्ञा जैसे तरीक़ों की जगह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेनी चाहिए.

उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ये तरीके “अराजकता का व्याकरण” बन जाएंगे.

उन्होंने कहा था, “जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दिया जाए, उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा.”

यह बहस आज तक ख़त्म नहीं हुई है. हाल के वर्षों में भी आलोचक सवाल उठाते रहे हैं कि क्या आमरण अनशन जैसी रणनीतियों की संवैधानिक लोकतंत्र में कोई जगह होनी चाहिए.

2011 में अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी अनशन के दौरान राजनीतिक विचारक प्रताप भानु मेहता ने लिखा था कि इस तरह के आंदोलन कई बार “बेहद दबाव बनाने वाले” बन सकते हैं.

उन्होंने तर्क दिया था कि जब किसी व्यक्ति को असाधारण नैतिक प्रतिष्ठा हासिल हो, तो उसका आमरण अनशन कई मामलों में “ब्लैकमेल जैसा” रूप ले सकता है.

इसके साथ-साथ जनता के एक हिस्से में भूख हड़तालों को लेकर संदेह भी बढ़ा है.

सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे मज़ाक देखने को मिलते हैं कि नेता बंद कमरों में छिपकर खाना खा लेते हैं या अपना “उपवास” शाही दावतों से तोड़ते हैं.

कुछ भूख हड़तालें केवल कुछ घंटों तक चलती हैं. वहीं कुछ को बैनर, मंच और टीवी की सीधी कवरेज के साथ बड़े सार्वजनिक आयोजनों की तरह पेश किया जाता है.

दूसरे शब्दों में, हर भूखा पेट एक जैसा राजनीतिक असर नहीं पैदा करता. इतिहास भी यही दिखाता है.

पोट्टी श्रीरामुलु की मौत ने भारत के संघीय ढांचे को ही बदल दिया और नए राज्यों के गठन का रास्ता खोला.

अन्ना हज़ारे का आंदोलन कुछ समय के लिए पूरे देश में भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बनाने में सफल रहा, लेकिन उसकी रफ़्तार जल्दी ही कम हो गई.

इरोम शर्मिला प्रतिरोध का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन गईं, हालांकि जिस क़ानून के ख़िलाफ़ वो लड़ रही थीं, वो लंबे समय तक लागू रहा.

भूख हड़ताल के साथ जुड़ा है जीवन का ख़तरा

2012 में दिल्ली में भूख हड़ताल पर बैठे हड़ताली पायलट तख्तियां दिखाते हुए

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इमेज कैप्शन, 2012 में दिल्ली में भूख हड़ताल पर बैठे हड़ताली पायलट तख्तियां दिखाते हुए

दूसरी ओर, डॉक्टर अक्सर ऐसे आंदोलनों में असहज स्थिति में होते हैं. दो हफ़्ते तक भोजन न मिलने पर शरीर सिर्फ़ चर्बी ही नहीं, बल्कि मांसपेशियों को भी तोड़कर ऊर्जा हासिल करने लगता है.

शरीर में ज़रूरी खनिज तत्वों का संतुलन बिगड़ने से दिल की धड़कन से जुड़ी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जो जानलेवा भी साबित हो सकती हैं.

वहीं लंबे उपवास के बाद अगर अचानक भोजन शुरू कर दिया जाए, तो उसके भी अपने ख़तरे होते हैं.

इसी वजह से हर लंबी भूख हड़ताल एक साथ राजनीतिक विरोध भी होती है और चिकित्सकीय आपात स्थिति भी.

सरकारें भी इस बात को अच्छी तरह जानती हैं. यही कारण है कि भूख हड़ताल करने वालों को अक्सर अस्पताल ले जाकर जबरन भोजन दिया जाता है.

वांगचुक की सेहत में लगातार गिरावट दिखाई देने के बाद विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और संगीतकारों ने उनसे अनशन ख़त्म करने की अपील की है.

इसके बावजूद, तमाम संदेहों और आलोचनाओं के बीच भारत ने कभी पूरी तरह इस विश्वास को नहीं छोड़ा कि स्वेच्छा से सहा गया कष्ट राजनीति को उस तरह प्रभावित कर सकता है, जैसा भाषण नहीं कर सकते.

सयंतन साहा रॉय कहते हैं कि वांगचुक का अनशन भी कुछ हद तक उसी परंपरा का अनुसरण करता दिखता है.

उनके मुताबिक़, “अपनी पीड़ा को सार्वजनिक रूप से सामने रखकर वांगचुक गांधी के रास्ते पर चलते नज़र आते हैं. जैसे-जैसे उनकी सेहत बिगड़ती है, उनका आंदोलन अधिक ध्यान आकर्षित करता है और सरकार के लिए राजनीतिक दबाव भी बढ़ता है. आगे यह मामला किस दिशा में जाएगा, यह अभी देखना बाकी है.”

आख़िरकार, यह देखना होगा कि वांगचुक की भूख हड़ताल लोगों की सोच बदल पाती है या फिर उन कई बलिदानों की लंबी सूची में शामिल हो जाती है, जो अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सके.

इसका फ़ैसला केवल उनके आंदोलन के भविष्य को ही नहीं, बल्कि भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक परंपराओं में से एक- भूख हड़ताल- के आज के असर को भी तय कर सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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