एलजीबीटीक्यू कम्युनिटी के लोग ढलती उम्र में जिन चुनौतियों का कर रहे हैं सामना

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“मुंबई में इस समय कशिश प्राइड फ़िल्म फ़ेस्टिवल चल रहा है. कोई मुझे बस नीचे तक भी ले जाता, तो मैं थोड़ा घूम-फिर आता. आज वहां के लोगों की तस्वीरें देखकर मेरा मन बहुत भर आया. किसी को भी यह नहीं लगा कि मुझे भी अपने साथ ले जाना चाहिए.”

मुंबई में रहने वाले 65 वर्षीय धवल (बदला हुआ नाम) यह बताते हुए काफ़ी भावुक हो गए.

उन्होंने कहा, “यही अब मेरी ज़िंदगी की हक़ीक़त है और मैंने इसे स्वीकार कर लिया है,” और उन्होंने बात बदल दी.

2022 में ब्रेन स्ट्रोक आने के बाद धवल की पूरी ज़िंदगी बदल गई. पहले उनकी ज़िंदगी हमेशा लोगों से घिरी रहती थी, वह अब चार दीवारी के भीतर सिमटकर रह गई है.

असल में बढ़ती उम्र में अकेले ज़िंदगी जीना बहुत से लोगों की किस्मत में आता है. बच्चे अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते हैं और अगर पति-पत्नी में से किसी एक की मौत हो जाए, तो ऐसे कई लोग हमारे आसपास मिल जाते हैं जो अकेले जीवन बिता रहे होते हैं.

लेकिन क्वीयर समुदाय (गे, लेज़्बियन, बाईसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर) के लोगों की कहानी बुढ़ापे में कुछ अलग होती है.

कई बार उनके पास न कोई पार्टनर होता है और न ही कमाई का कोई पक्का ज़रिया. ऐसे में उन्हें बढ़ती उम्र में सिर्फ़ अकेलेपन से ही नहीं, बल्कि रोज़ी-रोटी चलाने के लिए छोटे-मोटे काम करने के जद्दोजहद से भी जूझना पड़ता है.

धवल अपना घर चलाने के लिए सजावटी सामान बनाकर बेचते हैं, लेकिन इन चीज़ों की मांग भी ज़्यादातर त्योहारों के समय ही होती है.

इस लेख के लिए जब मैं धवल से मिलने गया, तो एक 65 साल के बुज़ुर्ग ने दरवाज़ा खोला.

मैंने पूछा,”क्या आप ही धवल हैं?”

उन्होंने सिर हिलाकर हाँ कहा.

ब्रेन स्ट्रोक की वजह से उनका शरीर काफ़ी कमज़ोर हो चुका था. बाल सफ़ेद हो गए थे और चलने-फिरने में भी उन्हें दिक्क़त हो रही थी. धवल ने मुझे बैठने के लिए कुर्सी दी और फिर हमारी बातचीत शुरू हुई.

अकेलेपन से जूझ रहे हैं क्वीयर समुदाय के बुज़ुर्ग

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मुंबई के भीड़भाड़ वाले भुलेश्वर इलाक़े में एक पुरानी इमारत की दस बाई दस की छोटी-सी खोली में वे रहते हैं. साल 2000 में उनकी मां की मौत के बाद से वो अकेले ही रह रहे हैं.

मैंने उनसे पूछा, “क्या आपकी ज़िंदगी में फिर कभी कोई नहीं आया?”

उन्होंने जवाब दिया, “आया था.”

उन्होंने बताया, “जब मैं किशोर अवस्था में था, तब मुझे 21 साल के एक लड़के से प्यार हो गया था. वह रोज़ मेरे घर आता था. हम करीब 10 साल तक साथ रहे. लेकिन बाद में उसने एक लड़की से शादी कर ली और काम के लिए विदेश चला गया. उसके बाद से मैं अकेला ही हूं.”

मैंने पूछा, “फिर क्या उसने कभी आपसे दोबारा संपर्क नहीं किया?”

इस पर धवल ने कहा, “किया था. विदेश से लौटने के बाद उसने मुझसे फिर संपर्क किया. अब उसके बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो चुके हैं. इसलिए वह ख़ुद को अकेला महसूस करने लगा है. इसी वजह से उसने यह टटोलने के लिए मुझसे संपर्क किया था कि क्या वह फिर से मेरी ज़िंदगी में लौट सकता है. लेकिन मैंने उसे मना कर दिया.”

इस उम्र में अब मैं किसी और की ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहता. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इतना बीमार पड़ जाऊंगा और चार दीवारी के बीच सिमटकर रह जाऊंगा.”

यह कहते समय धवल के चेहरे पर दुख, अकेलेपन और अपने ही लोगों से मिले अविश्वास की झलक साफ़ दिखाई दे रही थी.

इस कहानी के सिलसिले में जब मैं उनसे मिलने गया, तो उन्होंने बताया कि काफ़ी दिनों बाद कोई उनसे मिलने आया है.

रोज़ आने वाले रसोइए और काम करने वाली महिला को छोड़ दें, तो कई-कई दिनों तक उनका किसी तीसरे व्यक्ति से आमने-सामने बात करना भी नहीं होता.

बहन, उनके पति और भांजी के अलावा उनसे मिलने बहुत कम लोग आते हैं.

धवल ने अपनी भावनाएं ज़ाहिर करते हुए कहा, “मैंने क्वीयर समुदाय के कई लोगों की मदद की है, लेकिन आज जब मुझे मदद की ज़रूरत है तो सब मुझे भूल गए हैं.”

साल 2024 में संगत ने एक अध्ययन किया था, जिसमें सामने आया कि एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के लोगों को बढ़ती उम्र में अकेले पड़ जाने का डर सताता है.

उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य सेवाओं और रोज़मर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा, इस बात की भी उन्हें चिंता रहती है.

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि ऐसे लोगों के लिए दोस्त ही सबसे बड़ा भावनात्मक, सामाजिक और ज़रूरत पड़ने पर देखभाल का सहारा बनते हैं.

इस अध्ययन के लिए संगत ने भारत में 50 वर्ष से अधिक उम्र के 20 क्वीयर लोगों के इंटरव्यू किए थे.

2020 में भारत के मध्यम आयु और बुज़ुर्ग समलैंगिक पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर किए गए एक अध्ययन में भी अकेलेपन की समस्या की गंभीरता सामने आई थी.

40 साल से अधिक उम्र के 200 से ज़्यादा प्रतिभागियों में से 60 फ़ीसदी से अधिक लोगों ने कहा कि वे अकेलेपन का अनुभव करते हैं.

मनोचिकित्सक निलेश मोहित का कहना है, “अगर आप क्वीयर हैं, तो आपकी ज़िंदगी में शारीरिक और मानसिक फिटनेस बहुत अहम है.”

सुशील और पीयूष पिछले 30 वर्षों से साथ रह रहे हैं. दोनों की उम्र 61 साल है और दोनों रोज़ जिम जाते हैं.

बातचीत के दौरान सुशील ने कहा, “कुछ भी हो जाए, मुझे और पीयूष को आख़िर तक फिट रहना ही होगा. हम किसी भी हालत में व्यायाम नहीं छोड़ते.”

जब मैंने उनसे पूछा, “ऐसा क्यों?”, तो उन्होंने एक अनुभव साझा किया.

उन्होंने बताया, “कोविड के दौरान पीयूष को हार्ट अटैक आया था. मैं उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर गया. सारे कागज़ों पर मैंने दोस्त के तौर पर हस्ताक्षर किए. लेकिन कुछ जांचों के लिए अस्पताल का स्टाफ़ सिर्फ़ ख़ून के रिश्तेदार (परिवार वालों) की सहमति मांग रहा था.”

“मैंने उन्हें बताया कि हम साथ रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद स्टाफ़ रिश्तेदार की मंज़ूरी पर अड़ा रहा.”

उन्होंने कहा, “स्टाफ़ ने मुझसे यहां तक पूछा कि क्या इनका कोई नहीं है, क्या ये अनाथ हैं? उनका यह रवैया देखकर मैं पूरी तरह टूट गया था.”

कितनी कठिन होती है क्वीयर लोगों की ज़िंदगी

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सुशील नहीं चाहते कि उन्हें फिर कभी ऐसा अनुभव झेलना पड़े. यही वजह है कि फिट रहने के लिए वो जिम जाते हैं, स्विमिंग करते हैं, टेबल टेनिस खेलते हैं और डांस भी करते हैं.

लेकिन इसके बावजूद पीयूष को एक और चिंता सताती है.

वे कहते हैं, “हमारे रिश्ते को कोई क़ानूनी मान्यता नहीं मिली है. इतने साल साथ रहने के बावजूद हम अस्पताल में एक-दूसरे के लिए कोई बड़ा फैसला नहीं ले सकते. अगर हममें से कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए और कोई अहम फ़ैसला लेने की नौबत आए, तो वह फ़ैसला हम नहीं ले पाएंगे.”

“इसी तरह, एक सामान्य शादीशुदा जोड़े में किसी एक की मौत के बाद दूसरे को संपत्ति और दूसरे अधिकार अपने आप मिल जाते हैं. लेकिन हमें एक-दूसरे की ज़िंदगी आसान बनाने के लिए वसीयत लिखनी पड़ेगी. और अगर उस पर भी किसी ने आपत्ति कर दी, तो इस उम्र में कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं.”

उन्होंने कहा, “अगर हमारे परिवार वाले या ख़ून के रिश्तेदार, संपत्ति और विरासत के अधिकारों को लेकर हमारे निधन के बाद परेशानी खड़ी करना चाहें, तो वे ऐसा कर सकते हैं.”

इस बात को समझाने के लिए पीयूष अपने एक दोस्त का उदाहरण देते हैं.

वे बताते हैं, “हमारे दो क्वीयर दोस्तों ने मिलकर एक कारोबार शुरू किया था. लेकिन दुर्भाग्य से उनमें से एक की मौत हो गई. अब दूसरे साथी को अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है. इस लड़ाई में वह पूरी तरह थक चुका है. उसे जो मानसिक तनाव और दुख झेलना पड़ रहा है, उसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है.”

हालांकि पीयूष का मानना है कि क्वीयर लोगों के लिए आर्थिक रूप से मज़बूत होना बहुत ज़रूरी है. उनके मुताबिक़ इससे कम से कम कुछ सहारा मिल जाता है.

‘समय पर शादी कर ली होती, तो आज इतना अकेला न होता’

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55 वर्षीय रवि (बदला हुआ नाम) कहते हैं, “पूरी ज़िंदगी हम स्वीकार किए जाने और रिश्तों की तलाश में लगे रहते हैं. यह सोचकर रिश्तेदारों पर भी पैसा ख़र्च करते हैं कि आख़िर में वही काम आएंगे. अपनों के लिए खर्च करना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सोचना चाहिए कि अगर बुढ़ापे में कोई साथ न रहा तो क्या होगा. इसलिए सही निवेश करके रखना भी ज़रूरी है.”

रवि का इंटीरियर डिज़ाइन का छोटा-सा कारोबार है. अंधेरी में एक छोटे से घर में रहने वाले रवि अक्सर अपने दोस्तों से घिरे रहते हैं. दिलचस्प बात यह है कि उनके ज़्यादातर दोस्त उनकी उम्र से लगभग आधी उम्र के हैं.

जब मैंने पूछा, “आपके ज़्यादातर दोस्त आपसे आधी उम्र के क्यों हैं?”

जवाब में उन्होंने कहा, “मेरी उम्र के लगभग सभी दोस्तों की शादी हो चुकी है. वे अपनी ज़िंदगी और बच्चों में व्यस्त हैं. मैं अकेला हूँ.”

“मेरे पास काफ़ी समय होता है और युवा लड़कों के पास भी समय होता है. इसके अलावा जेन-ज़ी पीढ़ी के बच्चों को किसी क्वीयर दोस्त के साथ घूमने-फिरने में कोई झिझक या शर्म महसूस नहीं होती.”

सुशील और पीयूष ने भी मुझे बताया कि उनका ज़्यादातर उठना-बैठना और दोस्ती युवा लोगों के साथ ही है.

रवि कहते हैं कि जब भी उन्हें किसी मदद की ज़रूरत पड़ती है, ये युवा दोस्त तुरंत मदद के लिए पहुंच जाते हैं.

फिर भी रवि को साठ साल की उम्र के बाद अकेले पड़ जाने का डर सताता है. वे अभी से पैसे जमा कर रहे हैं ताकि साठ के बाद अपने गांव रत्नागिरी जाकर रह सकें.

रवि कहते हैं, “कभी-कभी लगता है कि अगर समय पर शादी कर ली होती, तो शायद आज इतना अकेला नहीं होता. बुढ़ापे की भी इतनी चिंता नहीं होती.”

कैसे मदद कर रही ‘सिनएजर्स’ नाम की संस्था

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इसी चिंता की वजह से पीयूष के एक दोस्त ने, एक लड़के के साथ उनका रिश्ता सफल नहीं होने के बाद, 40 साल की उम्र में एक महिला से शादी कर ली.

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. इसके बाद 2020 में किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में 10 लाख से अधिक क्वीयर लोगों ने हिस्सा लिया था.

इस सर्वेक्षण में शामिल लोगों में से 40 फ़ीसदी की उम्र 45 साल से अधिक थी और उनमें से लगभग 30 फ़ीसदी लोगों ने बताया कि उन्होंने महिलाओं से विवाह किया है.

65 साल की उम्र पार कर चुके और जीवन के कई अनुभवों से गुज़र चुके सुशील बातचीत के अंत में कहते हैं, “मेरी तो भगवान से यही प्रार्थना होगी कि अगले जन्म में भी मुझे ‘गे’ ही बनाना. क्योंकि अपने समुदाय के लिए मुझे अभी बहुत काम करना है.”

मुंबई के प्रसाद डांडेकर और अशोक रो कवी ने मिलकर 50 वर्ष से अधिक उम्र के क्वीयर पुरुषों के लिए ‘सिनएजर्स’ नाम का एक सपोर्ट ग्रुप शुरू किया है. इस समूह के सदस्य एक-दूसरे की मदद करते हैं और महीने में एक बार लंच, डिनर, फिल्म या पिकनिक के लिए मिलते हैं. साथ ही अलग-अलग गतिविधियों का भी आयोजन करते हैं.

शैलेश ठाकुर इस समूह के सदस्य हैं.

उन्होंने बताया, “हम समय-समय पर मिलते रहते हैं और एक-दूसरे की मदद करते हैं. लेकिन मुंबई की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए हम अभी तक ‘बडी सिस्टम’ को पूरी तरह लागू नहीं कर पाए हैं.”

“बडी सिस्टम का मतलब है कि हर बुज़ुर्ग और अकेले रहने वाले व्यक्ति को उसके इलाके में ही कोई ऐसा साथी मिले, जो ज़रूरत पड़ने पर तुरंत मदद के लिए पहुंच सके. इस दिशा में हमारा काम जारी है.”

“हम यह भी सोच रहे हैं कि देखभाल और सहयोग की व्यवस्था को और बेहतर कैसे बनाया जाए. हालांकि, जब भी किसी सदस्य को मदद की ज़रूरत होती है, हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं.”

‘सिनएजर्स’ समूह में फ़िलहाल 150 से अधिक सदस्य हैं, जो भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं.

लेकिन यह कहानी मुख्य रूप से शहरी जीवन की है. अगर कोई क्वीयर व्यक्ति किसी छोटे गांव या कस्बे में रहता हो और जन्म से महिला हो, तो उसकी स्थिति काफी अलग हो सकती है.

60 वर्ष की उम्र पार कर चुकी सोनू (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनके रिश्तेदार आज भी उन पर शादी करने का दबाव डालते हैं.

मेरे रिश्तेदार आज भी मुझसे कहते हैं कि शादी कर लो, अकेले ज़िंदगी जीना मुश्किल होता है. इस पर मैं उनसे कहती हूं कि ज़िंदगी आसान होगी या मुश्किल, यह तो ऊपरवाला तय करता है. शादी करना कोई ज़रूरी बात नहीं है.”

सोनू राजस्थान के एक छोटे से गांव में अपने छोटे भाई के साथ रहती हैं.

एक तो लड़की होना, ऊपर से मुस्लिम परिवार से होना, और फिर पुरुषों जैसे कपड़े पहनना और उसी तरह रहना-सहना. इन वजहों से गांव के लोग उनका मज़ाक उड़ाया करते थे.

लोग कहते थे, “यह लड़की नहीं, लड़का है. लड़कों जैसे बाल रखती है. बुर्का भी नहीं पहनती.”

लेकिन अब गांव के लोगों ने भी उन्हें स्वीकार कर लिया है.

बीए तक पढ़ाई करने वाली सोनू ने शुरुआत में एक कंपनी में नौकरी की थी. अब वे पार्ट-टाइम ड्राइवर का काम करती हैं.

सोनू कहती हैं, “जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, अकेलापन महसूस होता है. लेकिन अब मैं इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचती. मेरे बड़े भाई और उनके बच्चे मेरे घर के पास ही रहते हैं. लगभग पूरा परिवार मेरे आसपास ही है. उन सभी को मेरे बारे में पता है और उन्होंने मुझे स्वीकार किया है. इसलिए जब भी कोई ज़रूरत पड़ती है, वे मेरी बहुत मदद करते हैं.”

सोनू बताती हैं कि उन्हें आठवीं कक्षा से ही लड़कियां पसंद थीं. उस समय उनकी एक गर्लफ्रेंड भी थी. साथ ही, उनके परिवार ने शुरू से ही उन्हें स्वीकार किया.

वे कहती हैं, “मेरे माता-पिता सरकारी नौकरी में थे. मेरी मां नर्स थीं. उन्हें शुरू से ही मेरे बारे में पता था. उन्होंने मुझे कभी नहीं रोका. मैं अपनी मर्जी से पुरुषों के कपड़े पहनती थी. मैंने हमेशा बेफिक्र होकर अपनी ज़िंदगी जी है. मेरे परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया है.”

शायद इसी सपोर्ट की वजह से सोनू ने अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जी और आज भी जी रही हैं.

धवल, सोनू, रवि, सुशील और पीयूष सिर्फ कुछ उदाहरण हैं. क्वीयर समुदाय के कई बुज़ुर्ग आज भी छिपकर या दोहरी ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं.

बढ़ती उम्र के साथ आने वाली चुनौतियां हर किसी की ज़िंदगी का हिस्सा हैं. इससे कोई भी पूरी तरह बच नहीं सकता. लेकिन क्वीयर लोगों के सामने ये चुनौतियां अक्सर और भी जटिल और कठिन रूप में सामने आती हैं.

‘सिनएजर्स’ जैसे कुछ प्रयास ज़रूर शुरू हुए हैं, लेकिन उनकी ज़रूरत कितनी बड़ी है, यह तभी सही मायने में समझा जा सकेगा जब इस समुदाय के बुज़ुर्ग लोगों की वास्तविक संख्या और उनकी परिस्थितियों पर व्यापक अध्ययन होगा.

कुछ संस्थाएं और व्यक्ति इस दिशा में शोध करके अपना योगदान दे रहे हैं, लेकिन अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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