प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर हाई कोर्ट में जनहित याचिका प्रस्तुत हुई है। कहा है कि प्रदेश के विद्यार्थियों को मूलभूत और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं…और पढ़ें

HighLights
- प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर हाई कोर्ट में जनहित याचिका प्रस्तुत हुई है, कहा है कि विद्यार्थियों को मूलभूत और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं
- हालत यह है कि शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं, हजारों स्कूलों में पीने के पानी और बिजली की व्यवस्था नहीं है
- न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने केंद्र और राज्य शासन से जवाब मांगा है
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर हाई कोर्ट में जनहित याचिका प्रस्तुत हुई है। कहा है कि प्रदेश के विद्यार्थियों को मूलभूत और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं। हालत यह है कि शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं। हजारों स्कूलों में पीने के पानी और बिजली की व्यवस्था नहीं है। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य शासन से जवाब मांगा है।
हाई कोर्ट में यह जनहित याचिका सेंधवा निवासी बीएल जैन ने अधिवक्ता अभिषेक तुगनावत के माध्यम से प्रस्तुत की है। याचिका में कहा है कि वर्तमान में स्थिति यह है कि प्रदेश में शिक्षकों के 40 प्रतिशत पद रिक्त हैं। संविधान के अनुच्छेद 45 के अंतर्गत शिक्षा का अधिकार अधिनियम में 6 से 14 वर्ष आयुवर्ग के प्रत्येक बच्चे को निश्शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्यों को दी गई है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि शासन नौनिहालों के भविष्य के प्रति गंभीर नही है। बच्चों के शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।
स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी प्रदेश की शैक्षणिक व्यवस्था असंतोषजनक है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश की शिक्षा की गुणवत्ता बिगड़ने के साथ-साथ बुनियादी ढांचा भी ध्वस्त नजर आ रहा है। प्रदेश में शिक्षकों के दो लाख 89 हजार पद स्वीकृत हैं। इनमें से एक लाख 15 हजार 678 पद रिक्त हैं। इसी तरह प्रदेश के 83514 स्कूलों में से पांच हजार स्कूलों के भवन जर्जर होकर बच्चों के लिए असुरक्षित हैं। 3400 स्कूलों में तो बच्चों के लिए शौचालय तक नहीं हैं। दस हजार स्कूलों में आज भी बिजली नहीं है। प्रदेश में 1895 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं है। 40 हजार स्कूलों में सुरक्षा के लिए बाउंड्रीवाल नहीं है। हजारों स्कूलों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। कई स्कूल आज भी झोपडियों में संचालित हो रहे हैं।
यह भी कहा है याचिका में
याचिका में कहा है कि एक तरफ तो हम डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ प्रदेश के 59 हजार स्कूल ऐसे हैं जहां कम्प्यूटर की सुविधा नहीं है। पिछले दस वर्ष में जनसंख्या में तो बढ़ोतरी हुई लेकिन कक्षा एक से 12वीं तक के शासकीय स्कूलों के विद्यार्थियों की संख्या में 22 लाख 3 हजार विद्यार्थियों की कमी दर्ज की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में निर्देश दिए थे कि स्कूलों में बच्चियों के लिए निश्शुल्क सेनेटरी पेड एवं छात्र-छात्राओ के लिए पृथक-पृथक टायलेट होना चाहिए। इस निर्देश का पालन नहीं करने पर संबंधित स्कूल के विरुद्ध कार्रवाई के लिए भी कहा है, लेकिन कुछ नहीं हो रहा। प्रदेश शासन बजट का लगभग 16 प्रतिशत मुफ्त की योजनाओं में खर्च कर रही है, जबकि शिक्षा जैसे मूलभूत सुविधा का अभाव है। याचिका में अब 22 जुलाई को सुनवाई होगी।
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