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दुनिया में फोटोग्राफी की शुरुआत से बहुत पहले, एक अंग्रेज़ महिला ने भारतीय लोगों के चित्र बनाए.
यह काम उन्होंने अपनी असाधारण जिज्ञासा की वजह से किया और बहुत सटीकता के साथ उन लोगों का स्केच बनाया जिनसे वह पूरे भारत में मिलीं.
एमिली ईडेन एक प्रतिभाशाली कलाकार और लेखिका थीं. वो ब्रिटेन के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों में से एक से ताल्लुक रखती थीं.
उन्होंने 1830 के दशक में अपने भाई, जॉर्ज ईडेन के साथ उत्तर भारत की यात्रा की. जॉर्ज ईडेन भारत के गवर्नर-जनरल और ऑकलैंड के पहले अर्ल थे.
एमिली ने राजकुमारों, सेनापतियों और दरबारियों के साथ-साथ, मुलाज़िमों, यात्रियों, फ़क़ीरों, अफ़ग़ान और सिख रईसों, अकाली योद्धाओं, पहाड़ी समुदायों और यहां तक कि शाही यात्राओं में साथ चलने वाले जानवरों के भी चित्र बनाए.
उनकी इस कला ने उन्हें अपने समय के कई दूसरे कलाकारों से अलग पहचान दिलाई.
उनके दो दर्जन से ज़्यादा स्केच 1844 में ‘पोर्ट्रेट्स ऑफ़ द प्रिंसेस एंड पीपल ऑफ़ इंडिया’ नाम से प्रकाशित हुए.
आज ये दिल्ली स्थित डीएजी में लगी ‘प्रिंसेस एंड पीपल’ प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण हैं.
इस प्रदर्शनी का क्यूरेशन कला इतिहासकार मैरी ऐन प्रायर ने किया है. इसमें एमिली ईडेन के मूल स्केच से तैयार किए गए हाथ से रंगे लिथोग्राफ़ संग्रह को एक साथ प्रदर्शित किया गया है.
मार्च 1836 में ईडेन कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंचीं. वहां उन्होंने आधिकारिक कार्यक्रमों की व्यस्तता और एक बिल्कुल नए माहौल को देखा.
घर की याद और नए माहौल में ढलने की मुश्किलों के कारण उन्होंने तीन हफ़्तों तक कोई स्केच नहीं बनाया और दो महीने तक कोई पेंटिंग पूरी नहीं कर सकीं.
लेकिन उनके यात्रा दल ने उनका हौसला बनाए रखा. इस दल में उनके भतीजे विलियम, बहन फ़ैनी, नौकरानियां, एक आया, एक रसोइया, एक निजी सेवक, एक चिकित्सक और कई पालतू जानवर शामिल थे.
कला इतिहासकार और लेखिका मैरी ऐन प्रायर लिखती हैं कि भारत पहुंचने से पहले ही समुद्री यात्रा के दौरान अलग-अलग लोगों, संस्कृतियों और जीवन शैली से मुलाक़ात ने एमिली की सोच का दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया था.
वह लिखती हैं, “लोगों और जगहों की विविधता ने एमिली की कलात्मक अभिव्यक्ति को प्रेरित किया और उसे बेहतर बनाया.”
“उनकी स्वाभाविक जिज्ञासा उन्हें हमेशा अलग और अनोखी चीज़ों की ओर खींचती थी. उन्होंने अपने विचारों को स्केच और पेंटिंग्स के ज़रिए बेहद बारीकी से दर्शाया.”
सांस्कृतिक आकर्षण
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महलों, चर्चों और इंग्लैंड के परिदृश्यों की बजाय ईडेन का ध्यान धीरे-धीरे उन अनजान लोगों, उनके पहनावे, इमारतों और अपरिचित परिदृश्यों की ओर जाने लगा, जिनसे वह यात्रा के दौरान मिलीं.
1836 से 1842 के बीच उनकी यही जिज्ञासा उन्हें ऐसे इलाक़ों में ले गई, जहां बड़े राजनीतिक बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी. उनके स्केच महाराजा रणजीत सिंह के दरबार की दुर्लभ झलक दिखाते हैं.
उस समय उनकी पंजाब रियासत भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे शक्तिशाली रियासतों में से एक थी. ईडेन के स्केच महाराजा रणजीत सिंह के शासन के अंतिम दौर और विक्टोरियन युग की शुरुआत के समय को दर्शाते हैं.
ईडेन जितनी अच्छी कलाकार थीं, उतनी ही प्रभावशाली लेखिका भी थीं. उनकी जीवंत डायरियों में हास्य और अवलोकन की भरमार है. वह अक्सर लोगों और जगहों के नाम उसी तरह लिखती थीं, जैसे वे उन्हें सुनाई देते थे.
पवित्र शहर बनारस (अब वाराणसी) पहुंचने पर ईडेन का दल पहले गंगा नदी में नाव से चला और फिर पास के रामनगर पहुंचा, जहां राजा का एक देहाती निवास था.
यह दृश्य एमिली को इतना पसंद आया कि उन्होंने लिखा, “हमने तय किया है कि अपना स्टीमर यहीं रखेंगे और बाहर निकलकर स्केच बनाएंगे.”
हालांकि, उनके अंदर यह जोश और उत्साह अचानक नहीं आया. इंग्लैंड और भारत के बीच सांस्कृतिक अंतर की वजह से उन्हें घर की बहुत याद आती थी.
वह चर्च में आने वाली महिलाओं, भयंकर मच्छरों, लगातार पड़ने वाली गर्मी, कुत्तों, कौवों, सियारों और ब्राह्मिनी चील के शोर से परेशान होती थीं. वह दिन का ज़्यादातर समय घर के अंदर बिताने से भी परेशान थीं.
लेकिन जैसे-जैसे महीने बीतते गए उन्होंने बड़ी संख्या में स्केच बनाए. उनकी पेंटिंग जल्द ही लोकप्रिय हो गईं. शिमला में आयोजित चैरिटी मेलों में वे तेज़ी से बिकने लगीं.
भारत में रहने वाले ब्रिटिश लोगों ने उनकी सराहना की और भारतीय कलाकारों ने भी उनकी शैली की नकल की.
प्रायर के मुताबिक़, भारत में ईडेन के बनाए स्केच रीजेंसी और विक्टोरियन दौर की किसी भी ब्रिटिश महिला कलाकार के सबसे बेहतरीन कामों में गिने जाते हैं.
बोटैनिकल पेंटिंग्स के लिए मशहूर शार्लट कैनिंग और बाद में मैरिएन नॉर्थ ही उनकी उपलब्धि की बराबरी कर सकीं.
हालांकि, ईडेन की चीज़ों को बारीकी से परखने की अद्भुत क्षमता के साथ-साथ ब्रिटेन के सभ्यतागत मिशन में उनका अटूट विश्वास भी बना रहा.
प्रायर लिखती हैं कि ईडेन ने भारत में बिताए अपने वर्षों को “एक बड़े उद्देश्य के लिए सहा जाने वाला अप्रिय अनुभव” माना. उन्होंने औपनिवेशिक शासन को देश को “सभ्य बनाने” की ज़िम्मेदारी के रूप में परिभाषित किया.
1842 में ईडेन परिवार भारत छोड़कर इंग्लैंड लौट गया. ब्रिटेन लौटने के बाद एमिली ने पेंटिंग जारी रखी, लेकिन भारत में अनजान लोगों और अपरिचित नज़ारों को चित्रित करने की जो तीव्र इच्छा उनमें थी, वह अब कम हो चुकी थी.
बाद के वर्षों में उन्होंने कम चित्र बनाए और उनमें परिचित अंग्रेज़ी नज़ारों की झलक मिलती थी.
समय के साथ लेखन वह माध्यम बना, जिसके ज़रिए भारत में उनके अनुभव बड़े पैमाने पर पाठकों तक पहुंचे. भारत से लिखे गए उनके जीवंत पत्रों का संग्रह ‘अप द कंट्री’ 1866 में प्रकाशित हुआ. इसके बाद 1872 में ‘लेटर्स फ़्रॉम इंडिया’ प्रकाशित हुआ.
हालांकि, शुरुआत में उनकी साख पहले अफ़ग़ान युद्ध से जुड़े उनके परिवार के संबंधों के कारण बनी रही. लेकिन धीरे-धीरे उनकी प्रतिष्ठा एक लेखिका और कलाकार के रूप में उनकी अपनी उपलब्धियों पर आधारित हो गई.
एमिली ईडेन का निधन 1869 में हुआ.
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बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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