
अधिकारियों के मुताबिक, इंदौर में इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं। शुरुआत में आरोपी सिर्फ मैसेज के जरिए संपर्क करते हैं। अगर कर्मचारी नए नंबर पर कॉल कर पुष्टि करने की कोशिश करता है तो जवाब मिलता है कि, मैं अभी मीटिंग में हूं, बाद में बात करता हूं। इसके बाद कंपनी या चल रहे प्रोजेक्ट से जुड़ी ऐसी जानकारी साझा की जाती है, जिससे कर्मचारी को पूरा भरोसा हो जाए कि, सामने वाला वास्तव में उसका बॉस ही है। भरोसा बनने के कुछ दिन बाद अपराधी कर्मचारी को एक लिंक भेजते हैं। इस लिंक पर क्लिक करते ही कई मामलों में स्क्रीन शेयरिंग एप इंस्टाल हो जाता है, जिससे मोबाइल फोन की जानकारी अपराधियों तक पहुंच जाती है।
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