![]()
अगर आप खुद धूम्रपान नहीं करते, लेकिन आपके आसपास कोई स्मोकिंग कर रहा है, तो भी आप फेफड़ों के कैंसर (लंग कैंसर) की चपेट में आ सकते हैं। स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट, जबलपुर की हालिया स्टडी में यह चिंताजनक बात सामने आई है। संस्थान में लंग कैंसर के 546 मरीजों पर 5 साल तक चले अध्ययन में पाया गया कि इनमें से 328 (60%) मरीज स्मोकर थे, जबकि 218 मरीज नॉन-स्मोकर थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नॉन-स्मोकर मरीजों में 58 लोग पैसिव स्मोकिंग का शिकार थे, यानी वे खुद सिगरेट या बीड़ी नहीं पीते थे, बल्कि दूसरों के धुएं के संपर्क में आने से इस बीमारी की चपेट में आ गए। धुएं के सीधे संपर्क में आकर कैंसर का शिकार होने वालों में अधिकांश महिलाएं शामिल हैं। अध्ययन में लंग कैंसर के देर से पता चलने की एक बड़ी और डरावनी तस्वीर भी सामने आई है। जागरूकता और शुरुआती जांच सुविधाओं के अभाव में 57% मरीजों को सीधे ‘स्टेज-4’ में जाकर बीमारी का पता चला, जब कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका था। विशेषज्ञों का मानना है कि धूम्रपान के अलावा लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता, हवा में मौजूद PM 2.5 और अन्य जहरीले प्रदूषक भी नॉन-स्मोकर्स में फेफड़ों के कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर का देरी से पता (लास्ट स्टेज में) चलना और ग्रामीण इलाकों में ज्यादा केस होना दर्शाता है कि यहां जांच सुविधा और जागरूकता को लेकर भारी कमी है। स्टडी की खास बातें खराब हवा भी बढ़ा रहा खतरा… डब्ल्यूएचओ और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर वायु प्रदूषण को कैंसर कारकों की श्रेणी में रख चुके हैं। खराब हवा के लंबे समय तक संपर्क से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। नॉन-स्मोकर्स और महिलाओं में भी लंग कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं। -डॉ. विकास मिश्रा, सीनियर पल्मोनरिस्ट, जीएमसी टीबी का इलाज, निकला कैंसर स्टडी में 49 मरीजों को पहले टीबी रह चुकी थी, जबकि 17 मरीज ऐसे थे जिन्हें शुरुआत में टीबी मानकर इलाज किया गया, बाद में फेफड़ों का कैंसर निकला। शोधकर्ताओं ने चेताया है कि टीबी और फेफड़ों के कैंसर के लक्षण कई बार एक जैसे होते हैं। ऐसे में बिना पुष्टि के लंबे समय टीबी का इलाज करने से कैंसर एडवांस स्टेज में पहुंच जाता है। हर साल 0.3% का इजाफा मप्र कैंसर रजिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में हर एक लाख आबादी पर 12.1 लोग लंग कैंसर से पीड़ित हैं। इन मामलों में हर साल 0.3% की वृद्धि दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि धूम्रपान अभी भी सबसे बड़ा जोखिम कारक है, लेकिन बिगड़ती वायु गुणवत्ता, पीएम 2.5 और अन्य प्रदूषक भी इस कैंसर का खतरा बढ़ाने वाले कारक हैं।
Source link
#वरलड #लग #कसर #ड #नन #समकरस #क #भ #लग #कसर #क #त #लसट #सटज #म #पत #चल #Bhopal #News


