सुंदरता का नया ट्रेंड; चेहरे पर ‘स्ट्रैटेजिक रिंकल्स’ की मांग:चिकनी त्वचा नहीं, झुर्रियों की चाहत, एक बार का खर्च 5 लाख रु.

सुंदरता का नया ट्रेंड; चेहरे पर ‘स्ट्रैटेजिक रिंकल्स’ की मांग:चिकनी त्वचा नहीं, झुर्रियों की चाहत, एक बार का खर्च 5 लाख रु.




आजकल चेहरे की त्वचा से उम्र छिपाने के बजाय उसे सहज ढंग से स्वीकार करने का ट्रेंड बढ़ रहा है। एकदम चिकनी त्वचा के बजाय लोग अब हल्की झुर्रियों को बनाए रखना चाहते हैं। कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट में अब ऐसी मांग ज्यादा की जा रही है, जिसमें स्वाभाविकता बनी रहे। अमेरिकी त्वचा विशेषज्ञ डॉ. एंथनी रॉसी इसे ‘स्ट्रैटेजिक रिंकलिंग’ यानी ‘रणनीतिक झुर्रियां’ कह रहे हैं। मकसद चेहरे की झुर्रियों को मिटाना नहीं, बल्कि चेहरे को स्वाभाविक और उम्र के अनुरूप दिखाना है। न्यूयॉर्क की फैमिली ऑफिस एग्जीक्यूटिव स्टेफनी एबेंड चेहरे की झुर्रियों को छुपाने के लिए कई साल तक बोटॉक्स लेती रहीं। बाद में उन्हें लगा कि पूरी तरह चिकनी त्वचा उन्हें उनकी उम्र से कम दिखाने की कोशिश करती हुई नजर आती है। अब वे माथे पर कुछ लकीरें रहने देती हैं, जबकि चेहरे के दूसरे हिस्सों में कम मात्रा में बोटॉक्स और फिलर लेती हैं। न्यूयॉर्क के त्वचा विशेषज्ञ और स्किन-केयर ब्रांड डॉ. रॉसी के संस्थापक डॉ. एंथनी रॉसी बताते हैं कि ग्राहक ऐसी त्वचा चाहते हैं, जिससे उम्र के हिसाब से स्वभाविक लगे। बदलता रहा है सुंदरता का पैमाना डॉ. रोसी बताते हैं कि समय के साथ सुंदरता का मानक बदलता रहा है। 1920-30 के दशक में मेकअप क्रीम और पाउडर से बेदाग, समान रंगत वाला चेहरा लोकप्रिय हुआ। 1950-60 के दशक में हॉलीवुड संस्कृति ने साफ-सुथरी, युवा दिखने वाली त्वचा को ग्लैमर से जोड़ा। 1980-90 के दशक में सांवला रंग और बाद में एंटी-एजिंग क्रीम, रेटिनॉइड व कॉस्मेटिक का चलन बढ़ा। 2002 में अमेरिका में बोटॉक्स कॉस्मेटिक को मंजूरी दी। बोटॉक्स ने माथे और भौंहों के बीच की झुर्रियों को खत्म करने तरीका दिया। इसके बाद ‘फ्रोजन’ या बेहद चिकना चेहरा सुंदरता का नया मानक बन गया। लेकिन 2020 के दशक में सोशल मीडिया पर ‘प्राकृतिक सुंदरता’ और कम-मेकअप लुक की लोकप्रियता बढ़ी। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की डॉ. विवियन बुके बताती है कि कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट में ग्राहक ऐसे मेकअप की मांग करते हैं, जिसमें बनावटपन न दिखे व प्राकृतिक चेहरा नजर आए। हल्की झुर्रियों को बनाए रखने के लिए स्कि​न-बूस्टर अपना रहे डॉ. एंथनी रॉसी बताते हैं कि अब लोग बोटॉक्स की मात्रा घटाकर स्किन-बूस्टर, रेडियो-फ्रीक्वेंसी माइक्रोनीडलिंग और फ्रैक्शनल लेजर ट्रीटमेंट करवा रहे हैं। ​स्किन-बूस्टर का खर्च 76,000 से 1.14 लाख रु. प्रति सत्र है और साल में दो बार कराना हाता है। रेडियो-फ्रीक्वेंसी माइक्रोनीडलिंग में 95,000 से 2.38 लाख रु. खर्च होते हैं। फ्रैक्शनल लेजर रिसर्फेसिंग कराने का एक बार का खर्च लगभग 1.70 लाख रु. है। वसा हटाकर चेहरे में इंजेक्शन लगाने का 2.85 लाख से 5.23 लाख रुपए है। इनका उद्देश्य त्वचा की गुणवत्ता को बेहतर करना है।



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