नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्याय तक प्रभावी पहुंच के लिए संवाद, गरिमा और समावेशन जरूरी हैं। न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की समस्याओं को सुनना और उनकी स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समाधान उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। न्याय तक पहुंचने की शुरुआत हमें संवाद से करनी होगी।
भारत विविधता वाला देश है। क्षेत्र और स्थान के अनुसार परेशानी का स्वरूप भी बदल जाता है। जिस क्षेत्र में परेशानी आ रही है, हमें उसी क्षेत्र की भाषा, व्यवहार और प्रकृति के अनुसार संवाद करना चाहिए। संवाद के साथ सम्मान और सबको साथ लेकर चलना जरूरी है।
न्याय की आस में आपके पास आने वाले व्यक्ति की आधी परेशानी सिर्फ आपके व्यवहार से दूर हो सकती है। अगर आप उससे उसी की भाषा में, उसके आत्मसम्मान का ध्यान रखते हुए संवाद करेंगे तो वह सहज होने लगेगा और आप पर उसका विश्वास बढ़ जाएगा। स्थानीय लोगों को उनकी भाषा के आत्मसम्मान के साथ सुनना चाहिए।
यह बात न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इंदौर में शनिवार से प्रारंभ हुई नेशनल लीगल सर्विसेस आथारिटी (नालसा) की दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कांफ्रेंस का शुभारंभ करने के बाद न्यायाधीशों को संबोधित करते हुए कही। इस मौके पर मुख्यमंत्री मोहन यादव एवं केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन मेघवाल भी उपस्थित रहे।
कांफ्रेंस में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 50 से अधिक न्यायाधीश, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के कार्यकारी अध्यक्ष, ख्यात विधिवेत्ता एवं विषय विशेषज्ञ शामिल हुए हैं।
यह कांफ्रेंस ‘एकजुट आवाजें, सशक्त कल- संवाद, गरिमा एवं समावेशन के माध्यम से न्याय तक पहुंच को आगे बढ़ाना’ विषय पर हो रही है। दूसरे दिन रविवार को भी मध्यस्थता, आदिवासी समुदायों के विधिक सशक्तिकरण, बंदियों के लिए न्याय और बाल अनुकूल न्याय जैसे विषयों पर मंथन होगा।
न्याय नागरिकों तक पहुंचे, उन्हें न्याय तक पहुंचने के लिए मजबूर न होना पड़े : सीजेआइ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्याय को नागरिकों तक पहुंचना चाहिए, न कि नागरिकों को न्याय तक पहुंचने के लिए मजबूर होना चाहिए।
कानूनी सहायता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब लोगों से केवल बात न की जाए, बल्कि उनकी बात सुनी भी जाए। कानूनी सहायता के लिए आवेदन करने वाला अपनी समस्या लेकर आता है और हमें उसकी वास्तविक स्थिति को समझना होगा।
संवाद, गरिमा और समावेशन नारे नहीं
- न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि संवाद, गरिमा और समावेशन सिर्फ नारे नहीं, बल्कि कानूनी सहायता व्यवस्था की वास्तविक पहचान हैं।
- संस्थाओं का दायित्व केवल नागरिकों को उनके अधिकारों की जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जिन समुदायों की वे सेवा कर रही हैं, उनसे सीखना भी है।
- मध्य प्रदेश के आदिवासी परिवार, गोवा के मछुआरा समुदाय, गुजरात के प्रवासी श्रमिक और मुंबई में कानूनी सहायता चाहने वाली महिलाओं की आवश्यकता एक जैसी नहीं हो सकतीं।
- इसलिए कानूनी समाधान भी एक नहीं हो सकता। कानूनी समाधान स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने दिया अहिल्याबाई का उदाहरण
- मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि इंदौर की नगरी माता अहिल्याबाई होल्कर के न्याय के लिए जानी जाती है। न्याय के लिए उन्होंने अपने पुत्र और प्रजा में भेद नहीं किया।
- उन्होंने अपने पुत्र को भी वही दंड दिया, जो उस अपराध के लिए किसी सामान्य व्यक्ति को दिया जाता। ऐसा करके उन्होंने समाज को न्याय की सही परिभाषा दी।
- भारत की पुरातन संस्कृति और सभ्यता न्याय आधारित रही है। पंच परमेश्वर से लेकर राजा-महाराजा तक प्रजा को सही तरह से न्याय दिलाने में विश्वास रखते थे।
- भारत में न्याय सभी की पहुंच में हो और सही समय पर मिले, हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। शासन और न्यायपालिका इस दिशा में मिलकर काम कर रहे हैं।
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